◆ मैंने उन सबसे प्रेम किया
मैं उन सीढ़ियों से भी प्रेम करता हूँ जिन पर चलकर उससे मिलने जाया करता था और उस खिड़की से भी जिसके बाहर देखती थीं उसकी उदास आँखें मुझे अब भी उस अँधेरे से प्रेम है जिसके उजालों में चलकर पहुँचा था उसके पास मैंने उन सारी चीज़ों से प्रेम किया जो उसके हाथों से छुई गई थीं— कभी न कभी जैसे दीवार काजल लगा आईना कपड़े सुखाने की रस्सियाँ कमरे की चाबियाँ और कमरे की सारी खूँटियाँ— जहाँ हमने अपनी प्रार्थनाएँ लटकाई थीं कभी मैंने अलमारी में लटके उन सारे हैंगर्स से भी प्रेम किया जिनमें सफ़ेद झाग वाले सर्फ़ की तरह महकते थे उसके हाथ मैंने उन सारी चीज़ों से प्रेम किया जिन्हें उसके तलवों ने छुआ था जैसे पृथ्वी जैसे यह सारा संसार इस तरह मैंने दुनिया की हर एक चीज़ से प्रेम किया— उसके प्रेम में।
एक कविता लिखना चाहता हूँ तुम्हारे नाम की तरह जिसकी शुरुआत में ‘अ’ की मात्रा और आख़िर में छोटी ‘इ’ की मात्रा आए जब तुम्हारा नाम पुकारा जाए तो आरोह के ‘सा’ की ध्वनि उच्चारित हो कंठ में जहाँ ख़त्म हो तुम्हारा नाम वहाँ शुद्ध और कोमल ‘नि’ की तरह सुनाई आए नाम का अंतिम अक्षर और फिर किसी कविता के अंत के बाद सभा में पसरी हुई ख़ामोशी की तरह सन्नाटा छा जाए जीवन में तुम्हारा पूरा नाम ख़त्म होने के ठीक बाद
ज़्यादातर दोष आँखों का है घूम-फिरकर सारी दुनिया वहीं लौटती है। आँख किनारे तुम्हारे आईलाइनर की हद पर हल्की नमी में काजल घुलकर तिर जाता है जहाँ वहीं घट और घाट हैं। गहरे-काले-कत्थई डॉर्क सर्कल में जहाँ पूरे साल के रतजगे जमा हैं वहाँ भी एक दुनिया मौजूद है। तन की ख़ुशबू और मांसल आकांक्षा से परे प्रेम की अज्ञात खोह में भी एक दुनिया रवाँ है। तुम्हारी दोनों हथेलियों को जोड़ने पर त्रिभुज के बाज़ू में जो बीज है वहाँ भी दुनिया संभव है। कुछ नुक़्स उस पहली कविता के हैं और तुम्हारे हेयर ड्रायर के भी जो तुम्हारे बालों की हिदायत नहीं सुनते और मेरे कंधों पर उलझते रहे हर शाम। मैं डूबने के लिए डूबकर मरने के लिए तुम्हारी आँखों के किनारे चुनता हूँ।
मृत्यु मेरा प्रिय विषय है
लेकिन
मैंने कभी नहीं चाहा
कि मैं मर जाऊं
इतनी छोटी वजह से
जहाँ
केवल दिल ही टूटा हो
और
शेष
पूरी देह
सलामत हो।
न चाहते हुए भी मुझे घोषित कर दिया गया
फिफ्थ जनरेशन का आदमी
जबकि मैंने चाहा नहीं था कि मैं इतनी जल्दी-जल्दी गुजार दूँ अपने साल
मुझे चाहिए थी एक बहुत धीमी दुनिया
तुमसे मिलने के लिए चाहिए था एक लम्बा इंतजार
और एक रुका हुआ दिन
मैं बहुत धीमे धीमे जीना चाहता था तुम्हारे साथ
इसलिए कि देर तक तुम्हारे साथ चल सकूं
इतना कि तुम्हारा हाथ पकड़ने में
कई साल लग जाए मुझे
देर तलक टिका रहे तुम्हारा सिर मेरे कांधों पर
और तुम्हारी नींद लग जाए
मैंने कभी नहीं चाहा
कि दुनिया इतनी विराट हो जाए
कि उसकी महानता में गुम हो जाए हमारा सुख
जब तक उठकर बिस्तर की सलवटें ठीक करता हूँ
दुनिया थोड़ी सी और बदल चुकी होती है
मुझे तुमसे अलग करने में इस दुनिया का भी हाथ है
यह जितनी तेज रफ्तार से भागती है
मैं उतना तुमसे दूर हो जाता हूँ
जबकि मैं चाहता था इस जन्म तुमसे प्यार करूं
और अगले जन्म में करूं तुम्हारी प्रतीक्षा
पिछली शाम बैठा था तुम्हारे साथ
तो देख रहा था
घड़ी में कांटों की रफ्तार भी कितनी बढ़ा दी गई है
कितनी जल्दी कट रहे हैं जनवरी फरवरी
कितनी जल्दी आ रहे हैं दिसंबर
किसी भी दुनिया को इतना भूखा नहीं होना चाहिए
कि वह वक्त को भी खा जाए
और उस प्यार को भी
जिसे कह देने का वक्त अभी आया ही नहीं था।
◆ स्त्री और आग
कुओं से बाल्टियाँ खींचते-खींचते वे रस्सियों में तब्दील हो गईं
और कपड़ों का पानी निचोड़ते-निचोड़ते पानी के हो गए स्त्रियों के हाथ
मैं गर्म दुपहरों में उन्हें अपनी आँखों पर रख लेता था—
नीम की ठंडी पत्तियों की तरह
पानी में रहते हुए जब गलने लगे उनके हाथ
तो उन्हें चूल्हे जलाने का काम सौंप दिया गया
इसलिए नहीं कि उनकी आत्मा को गर्माहट मिलती रहे
इसलिए कि आग से स्त्रियों की घनिष्टता बनी रहे
और जब उन्हें फूँका जाए
तो वे आसानी से जल जाएँ
मैं जब भी आग देखता हूँ
तब मुझे स्त्रियों के हाथ याद आ जाते हैं—
लपट की तरह झिलमिलाते हुए
उनकी आँखों के नीचे इकट्ठा हो चुकी कालिख से पता चला
कितने सालों से चूल्हे जला रही हैं स्त्रियाँ
स्त्री दुनिया की भट्टी के लिए कोयला है
वह घर भर के लिए बदल गई दाल-चावल और रोटी के गर्म फुलकों में
वह मन के लिए बन गई हरा धनिया
देह के लिए बन गई नमक
और रातों के लिए उसने एकत्र कर लिया—
बहुत सारा सुख और आराम
लंबी यात्राओं में वह अचार की तरह साथ रही
जितनी रोटियाँ उसने बेलीं
उससे समझ आया कि यह दुनिया—
कितनी भूखी थी स्त्रियों की
जितने छौंक कढ़ाइयों में मारे स्त्रियों ने
उससे पता चला कितना नमक चाहिए था पुरुषों को
सूख चुके कुओं से पता चला
कितनी ठंडक है स्त्री की गर्म हथेलियों में
उसने दुनिया की भूख मिटाई और प्यास भी
उसने दुनिया को गर्म रखा और ठंडा भी किया
इसके ठीक उल्टा जो आग और पानी स्त्रियों को मिला अब तक
उसे फूल की तरह स्त्री ने उगाया अपने पेट में
और बेहद वात्सल्य से लौटा दिया दुनिया को!
◆ पिता
मैं तुम्हारे दिए हुए सारे काम ख़ुशी से करना चाहता था
लेकिन पता नहीं क्या सोचकर तुमने मुझे ज़्यादा काम दिए नहीं
ज़्यादातर रातों में
तुमने मुझे शराब की बोतलें लेने ही भेजा था
बहुत साल पहले
एक दिन जब तुमने अपनी क़मीज़
मेरे हाथों में थमा दी थी
तो बहुत ख़ुशी से मैंने उसे
तुम्हारे कमरे में खूँटी पर टाँग दिया था
उस दिन मैंने धीमे-से उसे सूँघ लिया था
तब से एक गंध मेरे ज़ेहन में रहने लगी
फिर माँ के कहने पर
वह क़मीज़ मैंने किसी को दे दी
भादों के उन दिनों में
मैं देर तक उस आदमी को खोजता रहा
जिसे तुम्हारी क़मीज़ पहनने में आ जाए
इसके बाद मैं जब भी
किसी को गले मिलते हुए देखता हूँ
तो मुझे तुम्हारी क़मीज़ याद आ जाती है
फिर जब मैं इस तरफ़ अकेला रह गया
तब मैं सोचता था कि
मुझे तुम्हारे लिए एक कविता लिखनी चाहिए
लेकिन इस नंगी भावुकता के प्रदर्शन से मैं डर गया
मेरे पास कोई विकल्प नहीं था—
तुम्हें गले लगाने का
तो मैं सिगरेट को उँगलियों से छूकर सूँघ लिया करता था
फिर एक दिन मैंने बोतल से थोड़ी-सी शराब अपनी कॉलर के पास उड़ेल ली
माँ जब मुझे चिट्ठियाँ लिखती थी
तो मैं उन्हें पढ़ने से पहले सूँघता था
मुझे पता था उन चिट्ठियों को
तुम ही मेरे हॉस्टल के पते पर पोस्ट करते थे
तुम्हारे जाने के बाद
जब मैं थोड़ा और बड़ा हो गया
मैं तुम्हारी तरह जीने के सारे तरीक़े सीख चुका था
अपनी मूँछों पर हाथ फेरने के तरीक़ों
और पैर हिलाने की बेचैनियों में तुम थोड़ा-सा रह गए
अब भी जब किसी रात को मैं करवट बदलता हूँ
तो दीवार पर एक खूँटी गड़ी देखता हूँ
और उस पर लटकती हुई एक तस्वीर
बहुत सालों बाद अब जाकर मैं समझ पाया
कि वक़्त के साथ तुमने अपनी गंध बदल ली थी
अब तुम मेरे पसीने में नहीं
गुड़ और घी से लिपटी हुई गंध के साथ महकते हो!
◆ भाषा
पहले कुछ नहीं था
न बोलना
और न ही चुप रहना
फिर धीरे-धीरे
दुनिया में व्याकरण आया
और फिर पूरी दुनिया की भाषा
ख़राब हो गई
हम फिर लौटेंगे
उसी आरंभ की तरफ़
जिसे दुनिया अंत कहेगी
तब न कुछ कहा जाएगा
और न ही सुना जाएगा कुछ
वही अ-व्याकरण वाली शुरुआत
जिसे लोग अंत कहेंगे
एक सुंदर कविता होगी।
◆ ख़तरा
इन दिनों सबसे ज़्यादा ख़तरा दो ही चीज़ों से है—
ज़बान और रीढ़ से
इसलिए
सबसे पहले ज़बान काटी जाती है
सबसे पहले रीढ़ तोड़ी जाती है
फिर चाहे वह किसी आदमी की हो
या हाथरस की किसी लड़की की हो
इसलिए
इन दिनों कोई ज़बान नहीं रखता
कोई रीढ़ नहीं रखता!

