एक भ्रम यह है कि
हमें लगता है हम प्रेम में है
लेकिन हम प्रेम करने से ज्यादा
प्रेम पाना पसन्द करते हैं।
एक मिथ्या यह भी है कि
मैंने तुमसे प्रेम किया,
नशे-मन की दीर्घ कामेच्छा में
मुझे कभी अहसास ही नहीं हुआ
मैं तो समुद्र की पानी पी रही थी
जहाँ प्यास कभी बुझनी ही नहीं थी।
हमारा दिल केवल सद्भाव से नहीं जुड़ा
हमने घावों की नाज़ुकता को समझा,
दर्द को दर्द से जोड़ा,
शोक में मौन रुदन किया
और क्रोध को बिना रक्तपात क्षमा किया,
सिवाय अलविदा के उस
अन्तिम परिरम्भन के।
आज कोई नशा नहीं है
लेकिन प्यास में
अब भी वही ताज़गी है,
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने असंख्य कविताएँ लिखी,
कविता वह तरीका है
जहाँ मैं तुमसे सम्बन्ध बनाकर
प्यास की तृप्ति कर सकती हूँ।
मैंने संवेशन के किये सारे सीत्कार दंश -
नखक्षत, दन्तक्षत, बिन्दुमाला
जिह्वायुद्ध, मयूरपदकों को
पुरुषायित मुद्रा में क्रियाशील होकर
कविताओं में जगह दी, मेरा
कविता लिखना कोई मरीचिका नहीं है।
● नियति
एक तरफ तुम्हारा शहर
कोहरे से घिर चुका है,
दूसरी तरफ दिसम्बर
सावन ला चुका है,
हम मिलने की बेचैनी में
एक-दूसरे की ओर भाग रहे हैं,
नियति प्रकृति के साथ
नई मुसीबतें ला रही हैं,
वर्त्तमान ने अभागा बना
हमें अपने ही शहर में
ठिठुरता पाषाण बना दिया हैं,
कोहरे की नियति है
प्रेम की तलाश में
ओस हो जाना,
प्रेम की नियति है
मिलने की प्रतीक्षा में
पेड़ हो जाना,
नियति के विपरीत एक दिन
तुम पेड़ से दूब बन जाना,
मैं ओस बनकर तुमपे ठहर जाऊँगा
और हमारा प्रेम
नंगे पाँव विचरण करके
हमारे मिलन को स्थायित्व कर देगा।
● देह सन्धि
प्रेम में काम की इच्छा जागृत
करना भी अनुशासन है,
संवेशन में अंग ना केवल
एक दूसरे में प्रवेश करते हैं
बल्कि रतिक्षण उपरान्त
अग्नि की ज्वाला लेकर लौटते हैं,
परवाना भले जलके मर जाए
शम'अ तो जलती रहती है
देह से मिली अग्नि
अक्सर सहवास को ढूँढ़ती है,
प्रेमास्पद की चिन्ता में
नींद उड़ जाने से
देह दुर्बल हो जाती है,
प्रणययुद्ध के बाद
शरीर ही जानता है
स्वयं के जूनून के आग में
धीरे-धीरे भस्म होना कैसा होता है?
मुख से लगी कामना
अनियंत्रित वासनाएँ जगाती हैं,
जब आप लौ होते हैं
तो आग को बुझाने का एक ही तरीका है -
कामसूत्र रूप में प्रेममयी देह की सन्धि।
● मञ्जरी
सुनो! मेरी शिउली
उस पहर की सारी घड़ियाँ,
वो सारा स्पर्श,
मेरी रजनीगन्धा कलियों ने
तुम्हारी पंखुड़ियाँ को खिलाया था
याद है?
हमने श्रावण की बारिश में
शरद की ओस की बूँदों को
अपने महासागरीय ज्वार-भाटों से
मिलावाया था
याद है?
ओ री साँवरी!
तुम्हारे अधरों का भीगापन
गले को सूखा कर रहे थे,
मैंने उस घड़ी जाना
गला सूखने पर
पानी की एक बूँद
तृप्ति नहीं करती,
प्यास को बढ़ा देती है,
हस्त तुम्हारी उपवन के देहलताओं में
सैर सपाटा कर रहे थे,
तुम्हारी गुलाबी वृहद शृंखलाएँ
जिसके शिखर पर
मुख शिशु बन जाता है,
आह! तुम कितनी सुगन्धित
बाह्य और आन्तरिक
देह में तुम्हारे केवल
महक है! महक है! महक है!
एक सीधा राह
तुम्हारे सुकोमल पगडण्डियों से होते हुए
पनघट तक ले जाता है,
उँगलियों की परिक्रमा
सुख के क्षणों को
आकर्षित करती हैं,
तुम चञ्चल हो,
तुम्हारे सीत्कार में
मर्म पुकार है,
तुम शर्म से मेरे चन्दनमयी
भुजाओं के मध्य
स्वयं को ढँक लेती हो,
तुम्हारा भय, सन्देह, वेदना, उदासी
पृथक हो
समर्पण का भाव उत्पन्न कर देते हैं,
तुमने नयनों को मूँद
स्वयं को न्योछावर किया
हे प्रिये!
मुझे ज्ञात हुआ -
स्त्री का समर्पण
प्रणय की मार्ग की
प्रथम सीढ़ी है!
श्रावण की ऋतु
शरद की बन गयी
ओ री! मेरी शिउली
सूर्यास्त के बाद
तुमने खिलना शुरू कर दिया
सुनो! तुम्हारे अधर, नाभि,
तुम्हारे कमर, बाँहें, कन्धे, चरण, केश
तुम्हारे जाँघों ने भी हामी के
सन्देश भेजे,
सब मुझे
स्मरण है! स्मरण है! स्मरण है!
सूर्योदय आगमन के साथ ही
सारे पुष्प तुम्हारे
मेरी रजनीगन्धा कलियों पर
चरम का आनन्द पाकर
गिर जाते हैं,
प्रगाड़ प्रलय की ज्वाला
शून्य हो शिथिल मौन
धारण कर लेती है,
तुम थककर अचेत
मेरे कन्धे पर सर रखकर
प्रणय-मौन को सुनती हो,
तुम्हारी तर्जनी भावशून्य होकर
मेरे सीने के रेशों मध्य
क्रीड़ा करती है,
ओ मेरी प्रियतमा!
हमने सृष्टि को अपना महक दिया,
जब-जब हमारी क्रीड़ाओं की पुनरावृत्तियाँ होगी।
● अछूत शरीर
संक्षिप्त जुड़ाव की अधिकता
शरीर में अन्दर से
ख़ालीपन ला देता है,
महसूस करने की क्षमता
अंतरङ्गता भूल जाती है,
हमेशा स्पर्श की खोज में
शरीर भ्रमित रहता है,
स्पर्श शरीर को शरीर से जोड़ता है
और केवल जोड़ नहीं रहा होता
बल्कि अवचेतन रूप से
शरीर को शरीर का
आत्मीय बन्धन बना
बांध रहा होता है,
मिलने का मतलब
स्पर्श को ज़द में लेकर
क़ैद करना होता है,
सभी के साथ बाँटना नहीं
महफूज़ करना होता है,
बँटा हुआ शरीर अक्सर
स्पर्श को भूल जाता है।
● अप्रतिम होंठ
प्रेम में होने का मतलब है
प्रिय के सारे भावों से
प्रेम हो जाना,
होठों को बख़ूबी पता है
वो केवल आनन्द के
हिस्से ही नहीं है,
प्रेम के भावों में
जब कभी बिखराव हुआ
होंठ सर्वप्रथम आगे बढ़कर
उन्हें समेटने के हिस्सेदार बनें,
होठों की ख़ुशकिस्मती रही
कि उन्हें चूमने का
अप्रतिम कार्य सौंपा गया,
प्रिय का आहट पाते ही
अधरों की धमनियों में
रक्त का सञ्चार
तीव्र हो जाता हैं,
चेहरों को संवरने के लिए
आईना चाहिए होता हैं,
होंठ प्रिय के दर्शनमात्र से ही
सँवर जाते हैं,
तुम्हारे दुःख, सुख, प्रसन्नता,
बेचैनी, अवसाद, रूष्ट, गुस्सा,
इन सारे भावों को
अपनी होठों की दुनिया में
क़ैद कर लेना चाहता हूँ,
चूमना आख़िरी रस्म है अगर
तो मैं अन्तिम श्वास तक
तुम्हें अनवरत चूमते हुए
पूरी सदियाँ बिताना चाहता हूँ।
● डर
मुझे कभी डर नहीं लगा
मैं पेड़ो पर बेधड़क चढ़कर
कूद जाया करता हूँ,
स्याह रातें कभी डरावनी नहीं लगी,
मैंने जंगलों को
भयंकर आवाज़ों के साथ
पार भी किया है,
मरणशीलता को अगर मैं छोड़ दूँ
तो मैंने बहुत ही वस्तुएँ खोई
लेकिन कभी दुःख नहीं हुआ,
श्रीकृष्ण का कथन
"तुम क्या साथ लेकर आये थे जो तुमने खो दिया?"
हमेशा से हावी रहा
और कभी अफ़सोस तक नहीं होने दिया,
परन्तु उसके आगे का कथन
"आज जो तुम्हारा है कल किसी और होगा।"
पढ़कर अब डर लगता है,
मैं असमंजस में हूँ
बचपन की निडरता
जवानी में आकर डरपोक हो गयी है?
या प्रेम में पड़कर
हृदय की सहनशीलता
कमजोर पड़ गयी है?
खोने का डर
और बिछड़ने के दुःख में मध्य
जब मैं तुमको देखता हूँ
सहम जाता हूँ,
मैं तुमपे कविता लिखते-लिखते
प्रेमी बन चुका हूँ,
सम्भाल लो मुझको
ठीक जैसे कविता को
जब पाठक नहीं मिलते
तो वो मर जाती है,
श्श्श...आगे प्रेम को खोने को
लेकर कुछ नहीं कहूँगा।
अजय यादव की अन्य कविताएँ: मौन
अजय यादव, जो ख़ुद को एक आकस्मिक रचनाकार के रूप में दावा करते हैं। यह न केवल एक प्रतिभाशाली शृङ्गार-रस के रचनाकार हैं, बल्कि शब्दों और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्यार भरे शब्दों को बुनने में भी माहिर हैं। इनके प्राथमिक रुचि में सङ्गीत और यात्रा शामिल है। इनकी प्रथम शृङ्गार की रचनाओं से सुसज्जित पुस्तक "ग्यारह तिल" प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा इनकी रचनाएँ विभिन्न वेब-पोर्टलों पर भी प्रकाशित हो चुकी हैं।

