कल सुनना मुझे

कल सुनना मुझे


सुबह जब अंधकार कहीं नहीं होगा,

हम बुझी हुई बत्तियों को

इकट्ठा करेंगे और

आपस में बाँट लेंगे।


दुपहर जब कहीं बर्फ नहीं होगी

और न झड़ती हुई पत्तियाँ

आकाश नीला और स्वच्छ होगा

नगर क्रेन के पट्टे में झूलता हुआ

हम मोड़ पर मिलेंगे और

एक दूसरे से ईर्ष्या करेंगे।


रात जब युद्ध एक गीत पंक्ति की तरह

प्रिय होगा हम वायलिन को

रोते हुए सुनेंगे

अपने टूटे संबंधों पर सोचेंगे

दुःखी होंगे।



घर में वापसी

मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं

माँ की आँखें

पड़ाव से पहले ही

तीर्थ-यात्रा की बस के

दो पंचर पहिये हैं।


पिता की आँखें...

लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं।

बेटी की आँखें... मंदिर में दीवट पर

जलते घी के

दो दिये हैं।


पत्नी की आँखें, आँखें नहीं

हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं।

वैसे हम स्वजन हैं,

करीब हैं

बीच की दीवार के दोनों ओर

क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं।

रिश्ते हैं,

लेकिन खुलते नहीं हैं।

और हम अपने खून में इतना भी लोहा

नहीं पाते

कि हम उससे एक ताली बनाते

और भाषा के भुन्नासी ताले को खोलते

रिश्तों को सोचते हुए

आपस मे प्यार से बोलते।


कहते कि ये पिता हैं

यह प्यारी माँ है,

यह मेरी बेटी है

पत्नी को थोड़ा अलग

करते...तू मेरी

हमबिस्तर नहीं...मेरी

हमसफ़र है।


हम थोड़ा जोखिम उठाते

दीवार पर हाथ रखते और कहते...

यह मेरा घर है।



सिलसिला 

हवा गरम है

और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का

इंतज़ार कर रहा है

कठुआये हुए चेहरों की रौनक

वापस लाने के लिए

उठो और हरियाली पर हमला करो

जड़ों से कहो कि अंधेरे में

बेहिसाब दौड़ने के बजाय

पेड़ों की तरफदारी के लिए

ज़मीन से बाहर निकल पड़े

बिना इस डर के कि जंगल

सूख जाएगा

यह सही है कि नारों को

नयी शाख नहीं मिलेगी

और न आरा मशीन को

नींद की फुरसत

लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं

इससे इतना तो होगा ही

कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर

तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा

और मेज़ को

अपनी मेज कह सकोगे।



गांव

मूत और गोबर की सारी गंध उठाए

हवा बैल के सूजे कंधे से टकराए

खाल उतारी हुई भेड़-सी

पसरी छाया नीम पेड़ की।

डॉय-डॉय करते डॉगर के सींगों में

आकाश फँसा है।


दरवाज़े पर बँधी बुढ़िया

ताला जैसी लटक रही है।

(कोई था जो चला गया है)

किसी बाज पंजों से छूटा ज़मीन पर

पड़ा झोपड़ा जैसे सहमा हुआ कबूतर

दीवारों पर आएँ-जाएँ

चमड़ा जलने की नीली, निर्जल छायाएँ।


चीखों के दायरे समेटे

ये अकाल के चिह्न अकेले

मनहूसी के साथ खड़े हैं

खेतों में चाकू के ढेले।

अब क्या हो, जैसी लाचारी

अंदर ही अंदर घुन कर दे वह बीमारी।


इस उदास गुमशुदा जगह में

जो सफ़ेद है, मृत्युग्रस्त है


जो छाया है, सिर्फ़ रात है

जीवित है वह - जो बूढ़ा है या अधेड़ है

और हरा है - हरा यहाँ पर सिर्फ़ पेड़ है


चेहरा-चेहरा डर लगता है

घर बाहर अवसाद है

लगता है यह गाँव नरक का

भोजपुरी अनुवाद है।



उसके बारे में

पता नहीं कितनी रिक्तता थी-

जो भी मुझमें होकर गुज़रा -रीत गया

पता नहीं कितना अन्धकार था मुझमें

मैं सारी उम्र चमकने की कोशिश में

बीत गया।


भलमनसाहत

और मानसून के बीच खड़ा मैं

ऑक्सीजन का कर्ज़दार हूँ

मैं अपनी व्यवस्थाओं में

बीमार हूँ।



रोटी और संसद

एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ--

'यह तीसरा आदमी कौन है ?'

मेरे देश की संसद मौन है।



कुछ सूचनाएं


सबसे अधिक हत्याएँ

समन्वयवादियों ने की।

दार्शनिकों ने

सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।

भीड़ ने कल बहुत पीटा

उस आदमी को

जिस का मुख ईसा से मिलता था।


वह कोई और महीना था।

जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,

किंतु इस बार तो

मौसम बिना बरसे ही चला गया

न कहीं घटा घिरी

न बूँद गिरी

फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु

कई प्रतिशत बढ़ गए


कई बौखलाए हुए मेंढक

कुएँ की काई लगी दीवाल पर

चढ़ गए,

और सूरज को धिक्कारने लगे

--व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है

सूरज कितना मजबूर है

कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।


हवा बुदबुदाती है

बात कई पर्तों से आती है—

एक बहुत बारीक पीला कीड़ा

आकाश छू रहा था,

और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर

शौचालयों के सामने

पँक्तिबद्ध खड़े हैं।


आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं

लोग खोई हुई आवाज़ों में

एक दूसरे की सेहत पूछते हैं

और बेहद डर गए हैं।


सब के सब

रोशनी की आँच से

कुछ ऐसे बचते हैं

कि सूरज को पानी से

रचते हैं।


बुद्ध की आँख से खून चू रहा था

नगर के मुख्य चौरस्ते पर

शोकप्रस्ताव पारित हुए,

हिजड़ो ने भाषण दिए

लिंग-बोध पर,

वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं

आत्म-शोध पर

प्रेम में असफल छात्राएँ

अध्यापिकाएँ बन गई हैं

और रिटायर्ड बूढ़े

सर्वोदयी-

आदमी की सबसे अच्छी नस्ल

युद्धों में नष्ट हो गई,

देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य

विद्यालयों में

संक्रामक रोगों से ग्रस्त है


(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को

सड़को पर

किश्तियों की खोज में

भटकते हुए देखा है)


संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ

भीतर ही भीतर

एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है


पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ

प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं

सबसे अच्छे मस्तिष्क,

आरामकुर्सी पर

चित्त पड़े हैं।



नाम : धूमिल: हिन्दी कविता का एंग्री यंगमैन

जन्म स्थान : खेवली, जिला वाराणसी, उत्तरप्रदेश, 9 नवम्बर 1936

निधन: 10 फरवरी 1975

काव्य संग्रह-


1. संसद से सड़क तक(1972)-


इस संग्रह की सभी रचनाएं तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य का गहराई से परिचय कराती हैं। इस संग्रह में भय, भूख, अकाल, सत्तालोलुपता, अकर्मण्यता और भटकाव पर आक्रमकता से प्रहार किया गया है।


2. कल सुनना मुझे(1976)-


यह काव्य संग्रह धूमिल के देहांत के बाद प्रकाश में आयी दूसरी सशक्त रचना है।


3. सुदामा पांडेय का प्रजातंत्र(1983)-


यह काव्य संग्रह तत्कालीन साम्राज्यवादी ताकतों की षड्यंत्रकारी नीतियों को बेनक़ाब करता है।

-कविताओं के अतिरिक्त धूमिल ने गीत, कहानी और लेख भी लिखा तथा अनुवाद भी किया।

सम्मान-

1975 में मध्य प्रदेश शासन साहित्य परिषद द्वारा मुक्तिबोध पुरस्कार

1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार