लेटिंग गो

लेटिंग गो

मैंने एकत्र की हैं
मेरी आँखों के वर्तमान में
जगी हुई नींदों की बलाएँ
निश्चय ही मेरे विचारों के सरोवर में
तुम प्रस्फुटित होते रहे

मेरे ओष्ठ कुँवारे शब्दों के बंधक हो गए हैं
जो प्रतीक्षारत हैं अलंकारों के प्रीत में
कविताओं के जन्म हेतु

ओ स्वप्नों के इंद्रधनुष को भेदते लड़के!
तुम्हारे देहगन्ध को वस्त्रों की भाँति ओढ़ती हूँ मैं
दर्पण सहेजता है तुम्हारे चुम्बनों को
लजाती पीले पुष्पों की भाँति

इस समय मेरी हथेली में एकाकार हैं
बारिश, किरण, कविता और तुम
जो लौट रहे हैं महासागर की नग्न चट्टानों की ओर
वसुधा के तट पर लिए अभागों सा नेपथ्य
काल की गरिमा में परिवर्तन का आँचल समेटे
लौट रहे हैं वृक्षों से समुद्री पक्षियों के भाँति

मैं गोपनीय बुद्धत्व की इच्छुक
एक अनुभवहीन दार्शनिक
मैंने जाना
छोड़ देना स्वयं को गले लगाने जैसा है।


तुम्हारी नन्दिनी

इठलाकर बहती हुई एक नदी
ने वादा किया था
एक अनछुए जंगल की कलाई पर
गोद आएगी हमारा नाम

शाम को शंखों की पुकार में
जन्म होगा हमारा
जब वसन्त उड़ने लगेगा फाहों की भाँति
तितलियाँ लिखेंगी हमारे लिए प्रेम कविताएँ

मेरे हाथों में जागेगी
एक चमकीली सुबह
सुख के सफ़ेद पंक्षी
अपने कलनाद में गूथेंगे हमारी पुकार

प्रेम की परिभाषा प्रकृति से पूछो
झरने की नदियों से
मुरझाए पत्तों पर असमय आयी वर्षा
प्रेम की श्रेष्ठतम कलाओं में माहिर होती है

एक दिन मिट्टी के असंख्य बीज़ों से उगेंगे हम
लिपटे रहेंगे एक-दूजे से
वनलताओं की तरह
एक मूर्तिकार गढ़ेगा भवनों में हमारी आकृति

मधुरतम गंगा में मीलों चलने के पश्चात
प्रेम की शीतलता कण्ठ में लपेटे
तुम बनोगे साक्षात अनीश्वर
और मैं तुम्हारी नन्दिनी।


सूर्य-पुष्प के प्रेम में

सूर्य-पुष्प के प्रेम में
मैंने ओस होना स्वीकार किया
उसकी छुअन में समाविष्ट पीली गर्माहट में
मैं वाष्पित होने को थी
कि तुम्हारा आना सम्भव हुआ

मेरी मुरझाई सी शांत शामों में
तुमने वसन्त के घण्टाघर फैलाएँ
मेरे सुनहरे बालों के अरण्य को
तुमने केसर की लड़ियों से सुलझाया

हम दिनारम्भ करते हैं
काँपते झरने के नीचे
सोए रहते हैं पृथ्वी की कोख में
शंखों की तरह
आलिंगनबद्ध होते हैं सुनामी के मध्य
वनलताओं के भेष में

मैं एक चमकीले सीप की आँख में जागती हूँ
सारा समुद्र अपनी शिराओं में भर
दौड़ पड़ती हूँ वृक्षों और पहाड़ों के ऊपर
नौ करोड़ मील की दूरी चलकर
सूरज बुझाने का पाप सर पर लिए
जीवित लौटती हूँ अपवादस्वरूप

मेरी त्वचा चमकती है भस्म की तरह
मैं तुमसे बात नहीं करती
एक लम्बी नींद के लिए
तुम्हारे मज़बूत सीने पर निष्प्राण गिरती हूँ
मेरे सुनहरे केशों से रक्त की चाँदनी झरती है।


एक प्रवासी का गीत

पहाड़ों पर लौटना चाहती हूँ
देखना चाहती हूँ
निर्भीक पुच्छल तारों की सुरमई रोशनी
चाँदी के झरने की चादर की ओट से

लौटना चाहती हूँ पहाड़ों पर
खुलकर हँसती हुई वनमाला से
जीवंत से भरपूर
नृत्य की कलाएँ सीखने

इससे पहले कि मैं
आदी हो जाऊँ
इन इमारतों और गुम्बदों के
खुरदुरे वाष्प की

लौटना चाहती हूँ घर अपने
क्योंकि इस तपती धूप में
फ़ीकी पड़ रही है
मेरी हथेलियों की हिना।


आवृत्ति

काली रात की स्याही ने
पृथ्वी पर आकृति बनायी एक नाव की
समुद्र से नीला सोखने की अदम्य चेष्टा में
बह गयी दक्षिण की तरफ
अनमने ढंग से लड़ते कबूतरों की भाषा
में छिपी हो सकती हैं
बादलों के पार की कहानियाँ
काले रंग के पेड़ों से टकरा कर
गिरती है मेरी पीठ पर एक जोरदार हवा

मेरी पीठ बंधक है
पिछले जन्म के कर्ज़ों की
जिन्हें रङ्ग भाता है पके जामुनों का
मेरी अनदेखी परिकल्पनाएँ
खिलती हैं नीले-हरे काग़ज़ों पर
सफ़ेद लिली के फूलों की तरह
पौराणिक कथाओं में कहा गया है
लिली को मृत्यु का प्रतीक
मृत्यु मेरा एकमात्र प्रेमी है
जिसके कमरे में झरते हैं
मेरी कल्पनाओं से ओतप्रोत काग़ज़ी टुकड़ें

मेरे वक्षों के तहख़ाने में रिसती हैं
मेरी जिज्ञासाओं से भरी शिराएँ
दूर दक्षिण से लौटती है एक नाव
देखते ही देखते जिसका काला रंग
ढक लेता है पूरा संसार
मेरे मस्तिष्क के अंतिम कोष्ठक में
सो जाती है एक रात।


अनुपस्थिति का शोर

महसूस करो उस प्रेम को
जो भावस्थ मनमुटाव के बाद
तुम्हारे ललाट पर उकेर दे
पद्म रंजित कुमकुम
वो जो चूम ले तो
जादुई सिम्फ़नी गूँज उठे
जलपरियों के कंठ से

महसूस करो उस प्रेम को
जिसके धरातल पर युगों से
उगते रहें हो शिउली और अमलतास
और जिसकी छाँव में सोये हो
दो परिणय में प्रीत श्वेत हंस

महसूस करो उस प्रेम को
जिसकी मनोस्थिति में अलंकृत हो रही हो
तुम्हारे महावर से रक्तिम अड़हुल
जिसके सौहार्दकुंड में चलता हो
तितलियों का यज्ञ अनवरत

यकीन करो उस प्रेम में
जिसके गर्भ में पल रही हो क्रांति
परन्तु अपना अंतिम स्पर्श दे
तुम्हारे माथे पर सुकोमल
भविष्य के आशीर्वाद स्वरूप
जो तुम्हें सामर्थ्य दे
उस भविष्य के भार से लड़ने हेतु
जहाँ उसकी अनुपस्थिति
शोर करे वर्षा में
और तुम्हारा अंतर्मन खो जाना चाहे
एक श्वेतवर्णित पक्षी के टूटे हुए पँख में।


स्त्री तुम आग हो उदास नहीं

पृथ्वी फ़टी तो प्रकृति अग्नि रूप में उजागर हुई
ध्यान से देखो तो दिखते हैं अनगिनत स्त्रियों के चेहरे
होंठों के दिखते हैं कई आकार
भींचे हुये, खिंचे हुये, चुप्पी समेटे और खिलखिलाते हुये
भौंहों में धनुष रखे हुए
नेत्रों में महासागर की गहराई
जिसका उचित नाप कहीं अंकित नहीं

जबकि अंकित होते रहें
हड़बड़ी में
जल्दी-जल्दी सुबह की चाय
से शाम की बत्ती का हिसाब-किताब
अंकित होता है
रसोईघर के नल और
रात्रि में आँखों के पानी का अंतर
तथा पीठ के बल लेटकर
स्वयं की बेहतरी के नाम से
जीवन में कद्र की उम्मीद

ज़हन के भीतर की इमारतों की चाबी पर
जमी जंग खुरचते हुए
आँख बचाकर फेंक आती है वे सारी
अँधेरी देह पर उगा एक-एक काँटा
और चुपके से लाड़ जताती हैं अपने पैरों पर
जिसे कभी होंठों से पहले चूमा था
उस भूरे आँखों वाले लड़के ने

अपने अनुक्षेत्रों के इर्दगिर्द बरपी
नाउम्मीदी की चौखट पर
दम तोड़ती हुई इच्छाओं को
स्वयं से विलग करने में सफल होती कायाओं को
एक शाम इस लेखा-जोखा से मुक्त पृथ्वी पर
तने हुये एक पेड़ ने कहा था
"स्त्री तुम आग हो उदास नहीं"।


नन्दिता सरकार हिंदी की नई पीढ़ी की कवयित्री हैं। साहित्य, कला तथा सिनेमा में विशेष रुचि है।
विभिन्न ब्लॉग्स तथा संकलन में कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।
प्रथम कविता संग्रह "चाँद का स्वाद" इसी वर्ष प्रकाशित।
सम्पर्क : letterstonandita@gmail.com