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गुलों में रंग भरे
सफर में धूप तो होगी
वो एक शख़्स अगर
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
बिछड़ा है जो इक बार: परवीन शाकिर
 कहाँ तो तय था चिराग़ाँ
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
अब जुनूँ कब किसी के बस में है
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