अब जुनूँ कब किसी के बस में है

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अब जुनूँ कब किसी के बस में है

अब जुनूँ कब किसी के बस में है
उसकी ख़ुशबू नफ़स-नफ़स में है

हाल उस सैद का सुनाईए क्या
जिसका सैयाद ख़ुद क़फ़स में है

क्या है गर ज़िन्दगी का बस न चला
ज़िन्दगी कब किसी के बस में है

ग़ैर से रहियो तू ज़रा होशियार
वो तेरे जिस्म की हवस में है

बाशिकस्ता बड़ा हुआ हूँ मगर
दिल किसी नग़्मा-ए-जरस में है

'जॉन' हम सबकी दस्त-रस में है
वो भला किसकी दस्त-रस में है


कोई दम भी मैं कब अंदर रहा हूँ

कोई दम भी मैं कब अंदर रहा हूँ
लिए हैं साँस और बाहर रहा हूँ

धुएँ में साँस हैं साँसों में पल हैं
मैं रौशन-दान तक बस मर रहा हूँ

फ़ना हर दम मुझे गिनती रही है
मैं इक दम का था और दिन भर रहा हूँ

ज़रा इक साँस रोका तो लगा यूँ
कि इतनी देर अपने घर रहा हूँ

ब-जुज़ अपने मयस्सर है मुझे क्या
सो ख़ुद से अपनी जेबें भर रहा हूँ

हमेशा ज़ख़्म पहुँचे हैं मुझी को
हमेशा मैं पस-ए-लश्कर रहा हूँ

लिटा दे नींद के बिस्तर पे ऐ रात
मैं दिन भर अपनी पलकों पर रहा हूँ

▪️ जौन एलिया