क्या पूजन क्या पूजन क्या अर्चन रे

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कौन है?

कुमुद-दल से वेदना के दाग़ को,
पोंछती जब आंसुवों से रश्मियां;
चौंक उठतीं अनिल के निश्वास छू,
तारिकायें चकित सी अनजान सी;
तब बुला जाता मुझे उस पार जो,
दूर के संगीत सा वह कौन है?

शून्य नभ पर उमड़ जब दुख भार सी,
नैश तम में, सघन छा जाती घटा;
बिखर जाती जुगनुओं की पांति भी,
जब सुनहले आँसुवों के हार सी;
तब चमक जो लोचनों को मूंदता,
तड़ित की मुस्कान में वह कौन है?

अवनि-अम्बर की रुपहली सीप में,
तरल मोती सा जलधि जब काँपता;
तैरते घन मृदुल हिम के पुंज से,
ज्योत्सना के रजत पारावार में
सुरभि वन जो थपकियां देता मुझे,
नींद के उच्छवास सा, वह कौन है?

जब कपोलगुलाब पर शिशु प्रात के
सूखते नक्षत्र जल के बिन्दु से;
रश्मियों की कनक धारा में नहा,
मुकुल हँसते मोतियों का अर्घ्य दे;
स्वप्न शाला में यवनिका डाल जो
तब दृगों को खोलता वह कौन है?


 क्या पूजन क्या पूजन क्या अर्चन रे

क्या पूजन
क्या पूजन क्या अर्चन रे!

उस असीम का सुंदर मंदिर
मेरा लघुतम जीवन रे
मेरी श्वासें करती रहतीं
नित प्रिय का अभिनंदन रे

पद रज को धोने उमड़े
आते लोचन में जल कण रे
अक्षत पुलकित रोम मधुर
मेरी पीड़ा का चंदन रे

स्नेह भरा जलता है झिलमिल
मेरा यह दीपक मन रे
मेरे दृग के तारक में
नव उत्पल का उन्मीलन रे

धूप बने उड़ते जाते हैं
प्रतिपल मेरे स्पंदन रे
प्रिय प्रिय जपते अधर ताल
देता पलकों का नर्तन रे

▪️महादेवी वर्मा