अभिशप्त


अभिशप्त


कँटीली झाड़ी को

कौन-सा अभिशाप

देंगे आप?


सूअर को, चींटी को

ढाल को, आँसुओं को

आप

देंगे कौन-सा अभिशाप?


बिजली के तार को

राख को

मिट्टी के तेल को

तितहे बेल को

हिजड़े को

पिंजड़े को

कौन-सा अभिशाप

देंगे आप?


केंचुए को

कौए को

रंक को

मुर्दे को

कौन-सा अभिशाप

देंगे आप?


वरदान तो

ये आप से

मांग ही नहीं सकते, ऋषिवर्य!



अभी कहां मानुष बन पाया

अभी कहाँ मानुष बन पाया

गढ़ने वाला कहाँ चाक को अन्तिम बार घुमाया


कितने साँचे बने और टूटी कितनी छवि-छाया

हुई कहाँ चुम्बन की इति या इति प्रवेश परकाया

रति का अहका जस का तैसा कामदेव छुछुवाया

अहं का कुत्ता हर ऊँचे पर पिछली टाँग उठाया


मिली कहाँ वह खुशी कि जिसमें सद्यजात शिशु गाए

रुकी कहाँ वेदना प्रसव की कि कुतिया मुसकाये

अभी झुकेंगी डालें कितनी कितने तने तनेंगे

आने वाले कल को कितने दर्पन अभी बनेंगे


टूट चुकीं कितनी तलवारें कितने लोथ गिरे

जल में जल की तरह कहाँ दो लोग अभेद मिले

मन का मानुष बनने में कितने हो गए सफाया

एक अदद यह अष्टभुजा भी इसी दौर में आया




कलाकार

जाने दो जड़ों को

तनों को जाने दो

जाने दो कण्टकों को भी

लेकिन कम से कम

पत्तियाँ तो

सबकी कोमल होती हैं


पर हे खजूर !

तुम्हारी तो पत्तियाँ भी

इतनी नुकीली हैं

और गजब की चोखार

फिर हम भी तो ठहरे कलाकार


उन्हीं से बनाएँगे झाड़ू

और बुनेंगे चटाइयाँ

बैठकर रमजान में

चुभलाएँगे तुम्हारे फल

बूँद बूँद चुवाएँगे तुम्हें

तुम्हीं से बुहारकर

तुम्हीं पर बैठाएँगे

अपने थके - माँदे अतिथियों को

घूँट - घूँट पिलाएँगे

तुम्हारा ही आसव।



यह बनारस है 

सभ्यता का जल

यहीं से जाता है

सभ्यता की राख

यहीं आती है

लेकिन यहाँ से

सभ्यता का कोई चक्रवात नहीं उठता

और न ही यहाँ

सभ्यता की कोई

आँधी आती है

यह बनारस है


चाहे सारनाथ की

ओर से आओ

या लहरतारा की ओर से

वरुणा की ओर से आओ

या गंगा की ओर से

इलाहाबाद की ओर से आओ या

मुगलसराय की ओर से

डमरू वाले की सौगन्ध

यह बनारस यहीं

और इसी तरह मिलेगा


ठगों से ठगड़ी में

सन्तों से सधुक्कड़ी में

अँग्रेज़ों से अँग्रेज़ी और

पण्डितों से संस्कृत में

बौद्धों से पालि

पण्डों से पण्डई और

गुण्डई में

लेकिन आपस में भोजपुरी में बतियाता हुआ यह

बहुभाषाभाषी बनारस है


गुरु से सम्बोधन करके

किसी गाली पर

ले जाकर पटक देनेवाले बनारस में

सब सबके गुरू हैं


रिक्शेवाले गुरू हैं

पानवाले गुरू हैं

पण्डे,मल्लाह, मुल्ले, माली और डोम गुरू हैं

नाई गुरू है, भाई गुरू है

कसाई गुरू हैं कामरेड गुरू हैं

शिष्य गुरू हैं और

गुरू तो गुरू हैं ही

फिर भी गुरु के बारे में

सबके अनुभव

अलग अलग हैं

किसी के लेखे

गंगा ही गुरु है

किसी के लेखे

ज्ञान ही गुरु है

किसी के लेखे

स्त्री गुरू है

किसी के लेखे

सीढ़ियाँ ही गुरू हैं

किसी के लेखे गाइड गुरू हैं

किसी के लेखे विभागाध्यक्ष सत्गुरु हैं

किसी के लेखे

ठेस ही गुरू है


बनारस में

बनारसी बाघ हैं

बनारसी माघ हैं

बनारसी घाघ हैं

बनारसी जगन्नाथ हैं

शैव हैं, वैष्णव हैं, सिद्ध हैं कबीरपंथी नाथ हैं

जगह जगह लगती हैं

यहाँ लोक अदालतें

कहने को तो कचहरी भी है बनारस में

लेकिन यहाँ

सबकी गवाह गंगा और

न्यायाधीश विश्वनाथ हैं


बनारस में मल्ल हैं

अखाड़े हैं,मठ हैं, आश्रम हैं

व्यायाम, प्राणायाम है

यहाँ सबका

बदन गीला है

लेकिन जाने क्यों

हर कोई

थोड़ा - थोड़ा ढीला है

किसी बनारसी को

परिचय - पत्र की जरूरत नहीं

लगता है समूचा बनारस

सिर्फ़ गंगा की

एक बूँद से बना है

मूल है बनारस

गंगा तना है


किसी को जोगी, किसी को जती,किसी को औघड़, किसी को स्कालर,

किसी को कवि, किसी को भाँड़, किसी को गँजेड़ी-भँगेड़ी, किसी को सांड़

बना देता है बनारस


शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी

चंद्रघण्टा, सिद्धिदात्री आदि नवदुर्गा, भैरव, संकटमोचन आदि

बज्रहृदय पत्थर के देवी

देवता खड़े हैं यहाँ

ताक रहे हैं टुकुर टुकुर

गंगा भी खड़ी हैं यहाँ

पानी की भी प्रतिमा

बनी है बनारस में


जो भी बनारस जाता है

कोई सिर के बाल

कोई जेब,कोई मन, कोई तन अर्थात्

कुछ न कुछ खोकर ही जाता है

और जब कोई

बनारस से जाता है

हरी झण्डी की तरह बनारस अपने दोनों हाथ

हिलाता है।



◆ अकेला नहीं सोया

स्त्रियों के साथ कम अधिकतर मैं अपनी बरबादियों के साथ सोया एक दिन मुझे हँसते-हँसते नींद आ गई एक दिन मैं रोते-रोते सो गया थोड़ी दूर साथ चलने के बाद सब चले गए पर दुर्भाग्य ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा एक दिन जब मैं सोकर उठा तो देखा एक किताब मेरे सीने से लिपटी हुई है एक दिन मैं भूखा सो गया एक दिन किसी ने खाना खिला दिया तो नींद आ गई एक दिन मैं रेलवे-स्टेशन की बेंच पर बैठे-बैठे सो गया एक दिन मैं डी.टी.सी. की बस में खड़े-खड़े सो गया एक दिन जब मैं नींद के सागर में डूब रहा था तो कोई मुझे हल्के-हल्के थपकियाँ दे रहा था मैं जागा रहा या सोता मेरा चश्मा और क़लम मेरे आस-पास रहे एक दिन रात को जब भारतीय हॉकी टीम मध्यांतर तक 3-1 से आगे थी तो मुझे नींद आ गई और जब सुबह जागा तो पता चला भारत जर्मनी से 4-3 से हार गया है जब भी सोया किसी के साथ सोया मैं अकेला कभी नहीं सोया एक अदृश्य चादर मुझ पर हमेशा तनी रही!



सहानुभूति 

जब
दो लोगों के सुख
एकसमान होंगे
तो दोनों ही
खोल खोलकर दिखाएंगे
एक दूसरे को
अपना अपना सुख

लेकिन जब
दो लोगों की परेशानियाँ
एकसमान होंगी
तो उनमें से
किसी एक को
छिपानी ही पड़ेगी
अपनी तकलीफ़
अगले को
थामने के लिए।



आज की रात


कल जो जो कहोगे
वो वो बना दूँगी
प्याज, लहसुन, नमक और हरी मिर्च मिलाकर
सेंक दूँगी खरी खरी गुदगर रोटी

मजूरी के बदले उस दिन
बडे़ बाबू ने जो
पुरानी नीली वाली कमीज दी थी
फींच दूँगी उसे लकालक

अपनी भूख में से
आधी भूख मुझे दे दो
मेरी खटिया में से
आधी खटिया ले लो
मेरी कथरी से
दो तिहाई कथरी चाहो तो
पूरी चादर ले लो
या ओढ़ लो
मेरी आधी साड़ी ही
जहाँ मन हो वहाँ
रख लो मेरे बदन पर
अपना हाथ
मेरी नींद में से
आधी नींद ले लो
लेकिन हाथ जोड़ती हूँ
बगल में सोए
बिट्टू की कसम
आज रहने दो।



जवान होते बेटे


जवान होते बेटो !
इतना झुकना
इतना
कि समतल भी ख़ुद को तुमसे ऊँचा समझे
कि चींटी भी तुम्हारे पेट के नीचे से निकल जाए
लेकिन झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े होना घाटी में
कि ऊपर से बरसने के लिए कृपा हँसती रहे

इस उमर में
इच्छाएँ कंचे की गोलियाँ होती हैं
कोई कंचा फूट जाए तो विलाप मत करना
और कोई आगे निकल जाए तो
तालियाँ बजाते हुए चहकना कि फूल झरने लगें

किसी को भीख न देना पाना तो कोई बात नहीं
लेकिन किसी की तुमड़ी मत फोडऩा
किसी परेशानी में पड़े हुए की तरह मत दिखाई देना
किसी परेशानी से निकल कर आते हुए की तरह दिखना
कोई लड़की तुमसे प्रेम करने को तैयार न हो
तो कोई लड़की तुमसे प्रेम कर सके
इसके लायक ख़ुद को तैयार करना
जवान होते बेटो !

इस उमर में संभव हो तो
घंटे दो घंटे मोबाइल का स्विच ऑफ रखने का संयम बरतना
और इतनी चिकनी होती जा रही दुनिया में
कुछ ख़ुरदुरे बने रहने की कोशिश करना

जवान होते बेटो !
जवानी में न बूढ़ा बन जाना शोभा देता है
न शिशु बन जाना
यद्यपि बेटो
यह उपदेश देने का ही मौसम है
और तुम्हारा फर्ज है कोई भी उपदेश न मानना...



फसल



पकी फ़सल
काट ले गए होते
दिन दहाड़े
आँखों के सामने
तो भी
उतना दुख नहीं होता
जितना कि
कच्ची फ़सल काटकर
छोड़ गए खेतों में
रातों रात




नाम : अष्टभुज शुक्ल 

जन्म स्थान : 10 अक्टूबर 1957, बस्ती, उत्तर प्रदेश 

कुछ प्रमुख कृतियाँ-


पद-कुपद, चैत के बादल, दुःस्वप्न भी आते हैं (तीनों कविता-संग्रह) कुल सात कविता – संग्रह और दो ललित निबंध संग्रह।

केदार सम्मान (2009), श्रीलाल शुक्ल इफको स्मृति सम्मान (2016), परिवेश सम्मान , माटी रतन
अशफाकुल्ला खाँ सम्मान , चक्रधर सम्मान