◆ नदी
इस तरह देखता रहा बहती हुई नदी को जैसे तुम्हें देखता हूँ मैं रेगिस्तान का आदमी और किस तरह देखता बहती हुई नदी को!
इस उम्मीद में हर रोज़ निकलता हूँ घर से कि आज तो मारा जाऊँगा लेकिन जिस गोली से मुझे मरना था वह किसी और के सीने में धँस जाती है वह दिन ज़रूर आएगा जब मुझे मार गिराया जाएगा मेरा जीवन हत्यारों का चूका हुआ निशाना है!
जब छीन ली जाएगी हमसे एक-एक स्मृति जब किसी के पास कुछ नहीं बचेगा पीतल के तमग़ों के सिवा जब सब कुछ ठहर जाएगा एक-एक पत्ता झर जाएगा सब पत्थर हो जाएगा ठोस और खुरदुरा नदी में नहीं दिखाई देगी चाँद की परछाईं किसी आँख में नहीं बचेगा सपना हम सब कुछ भूल जाएँगे घर का रास्ता गाँव का नाम दस का पहाड़ा सब कुछ तब कौन जान पाएगा छब्बीस अगस्त उन्नीस सौ पिचासी तक मुझे एक-एक झुर्री समेत याद था अपनी माँ का चेहरा।
अभी नहीं गिरेगी यह दीवार तुम उसकी ओट में जाकर एक स्त्री को चूम सकते हो अभी कहीं नहीं जाएगी यह धूप उसे चमकने दो बहने दो हवा हिलने दो पत्तों को उसे मत खोजो जो अभी नहीं है क्या बहुत नहीं है इस वक़्त एक स्त्री का साथ!
स्त्रियों के साथ कम अधिकतर मैं अपनी बरबादियों के साथ सोया एक दिन मुझे हँसते-हँसते नींद आ गई एक दिन मैं रोते-रोते सो गया थोड़ी दूर साथ चलने के बाद सब चले गए पर दुर्भाग्य ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा एक दिन जब मैं सोकर उठा तो देखा एक किताब मेरे सीने से लिपटी हुई है एक दिन मैं भूखा सो गया एक दिन किसी ने खाना खिला दिया तो नींद आ गई एक दिन मैं रेलवे-स्टेशन की बेंच पर बैठे-बैठे सो गया एक दिन मैं डी.टी.सी. की बस में खड़े-खड़े सो गया एक दिन जब मैं नींद के सागर में डूब रहा था तो कोई मुझे हल्के-हल्के थपकियाँ दे रहा था मैं जागा रहा या सोता मेरा चश्मा और क़लम मेरे आस-पास रहे एक दिन रात को जब भारतीय हॉकी टीम मध्यांतर तक 3-1 से आगे थी तो मुझे नींद आ गई और जब सुबह जागा तो पता चला भारत जर्मनी से 4-3 से हार गया है जब भी सोया किसी के साथ सोया मैं अकेला कभी नहीं सोया एक अदृश्य चादर मुझ पर हमेशा तनी रही!
आलोकधन्वा के लिए
कुछ कवि हो गए मशहूर कुछ काल कवलित कुछ ने ढूँढ़ लिए दूसरे धंधे मसलन शेयर बाज़ार कुछ डूबे हुए हैं प्रेम में कुछ घृणा में कुछ ने ले लिया संन्यास कुछ ने गाड़ी कुछ लिखने लगे कहानी कुछ फलादेश इनके बीच एक कवि हैं जिसे अभी याद है पिछली लड़ाई में मारे गए साथियों के नाम उसके पास अभी है एक नक़्शा!
◆ पावों के निशान
वहाँ पर ज़रूर होंगे हमारे पाँवों के निशान धूल-धक्कड़ में दब गए होंगे या उग आई होगी घास उड़ी होगी रेत तो उड़े होंगे पाँवों के निशान भी बरसा होगा पानी तो बह गए होंगे थोड़ी दूर तक फिर लौट आए होंगे वहीं पर जैसे सभी लौट आते हैं शाम को अपने-अपने घर कितना सुनसान और अकेला है यह रास्ता जैसे धूप में चमकता हुआ पत्थर यह कितना अजीब है कि जूतों के मोटे तलों के बाद भी छूट जाते हैं रास्तों पर पाँव के निशान।
◆ यह रेगिस्तान
अब भी चलती हैं धूल भरी आँधियाँ दृश्य को अस्त-व्यस्त करती जगह बदलती है रेत अब भी टहलती है भेड़ सबसे ऊँचे धोरे पर हिलती है उसकी पूँछ चाँद को छूती हुई तपते सूरज को अपने वक्ष पर झेलती है एक औरत यह रेगिस्तान अब भी एक औरत की तरह प्यार करने के क़ाबिल है।
◆ बरसात
हम बरसात के थमने का इंतज़ार करते हैं कई बार भीग जाते हैं हमारे कंधे हम चल देते हैं पानी की परवाह किए बग़ैर हम घर से बहुत दूर होते हैं जब बरसात शुरू होती है कई दिनों तक बरसता है पानी घरों की छतों पर टपकता किसी लंबे शोकगीत की तरह धूप गुज़रे ज़माने की बात लगती है हम बहकर चले जाते हैं बहुत दूर अपने बचपन के दिनों में जहाँ तक पहुँचने के सारे रास्ते सिर्फ़ छतरी का एक छेद बचा है जहाँ से दिखाई पड़ता है आसमान जो शायद अब खुलने ही वाला है।
कविता, कहानियों के अंग्रेज़ी समेत कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद। ‘निरंजननाथ आचार्य सम्मान’ और ‘मेजर रामप्रसाद पोद्दार सम्मान’ सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित।

