प्यार के बहुत चेहरे हैं

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प्यार के बहुत चेहरे हैं

मैं उसे प्यार करता 
यदि वह 
ख़ुद वह होती 

मैं अपना हृदय खोल देता 
यदि वह 
अपने भीतर खुल जाती 

मैं उसे छूता 
यदि वह देह होती 
और मेरे हाथ होते मेरे भाव! 

मैं उसे प्यार करता 
यदि मैं पत्ता या हवा होता 
या मैं ख़ुद को नहीं जानता 
मैं जब डूब रहा था 
वह उभर रही थी 
जिस पल उसकी झलक दिखी 

मैं कभी-कभी डूब रहा हूँ 
वह अभी-अभी अपने भीतर उभर रही है 

मैं उसे प्यार करता 
यदि वह जानती 
मैं ख़ामोशी की लय में अकेला उसे प्यार करता हूँ 
प्यार के बहुत चेहरे हैं। 


यह सम्पूर्ण की खामोशी है

तुम्हें अचरज होगा 
मैं अगर पेड़ों और फूलों के पीछे 
अपना ही सूर्यास्त हूँ 
न सिर्फ़ वह 
जो कहा नहीं जा सकता 
बल्कि वह सब कुछ जो कहा गया 
कुछ भी नहीं है 
एक घेरा है जिसके हर बिंदु पर 
रुकी हुई स्मृति अकेली है 
जो तुम्हें कहीं से बुला रहे हैं 
उन्हें नहीं पता वे कहाँ हैं 
तुम अपनी ख़ाली जगह में 
अपना इंतज़ार कर रहे हो 
शब्द अपने भीतर निःशब्द 
डूब रहा है 
यह संपूर्ण की ख़ामोशी है।


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