![]() |
| छवि श्रेय: गूगल |
आश्वासन
बड़ी देर तक
हवा और वृक्ष बतियाते रहे।
हवा की हर बात पर
वृक्ष
पेट पकड़-पकड़ कर हँसता रहा।
और तभी
हवा को ध्यान आया अपनी यात्रा का;
और वह हड़बड़ाते हुए बोली,
—“हटो, तुम हमेशा देर करा देते हो।”
अपने धूप के वस्त्र व्यवस्थित करते हुए
वृक्ष बोला,
—“मैं देर करा देता हूँ या तुम्हीं...”
—“अच्छा, अब रहने दो,
तुम्हें तो कहीं आना-जाना है नहीं।”
हवा को जाते देख
वृक्ष उदास हो गया।
हवा—
इस उदासी को समझ तो ले गई।
पर केवल इतना ही बोली,
—“अच्छा अब मुँह मत लटकाओ
मैं तुम्हारे इन बाल-गोपालों को लिए जा रही हूँ
और हुआ तो लौटते में...
वृक्ष ने देखा, कि
सामने के मैदान में
हवा को घेरे पत्ते।
चैत्र-मेला घूमने के उत्साह में
कैसे किलकारियाँ मारते चले जा रहे हैं।
वृक्ष बोध
आज का दिन
एक वृक्ष की भाँति जिया
और प्रथम बार वैष्णवी संपूर्णता लगी।
अपने में से फूल को जन्म देना
कितना उदात्त होता है
यह केवल वृक्ष जानता है,
और फल—
वह तो जन्म-जन्मांतरों के पुण्यों का फल है।
स्तवक के लिए
जब एक शिशु ने फूल नोंचे
मुझे उन शिशु-हाथों में
देवत्व का स्पर्श लगा।
कितना अपार सुख मिला
जब किसी ने
मेरे पुण्यों को फल समझ
ढेले से तोड़ लिया।
किसी के हाथों में
पुण्य सौंप देना ही तो फल-प्राप्ति है,
सिंधु को नदी
अपने को सौंपती ही तो है।
सच आज का दिन
एक वृक्ष की भाँति जिया
और प्रथम बार वानस्पतिक समर्पणता जगी।
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के यशस्वी कवि श्री नरेश मेहता उन शीर्षस्थ लेखकों में हैं जो भारतीयता की अपनी गहरी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। नरेश मेहता ने आधुनिक कविता को नयी व्यंजना के साथ नया आयाम दिया। रागात्मकता, संवेदना और उदात्तता उनकी सर्जना के मूल तत्त्व है, जो उन्हें प्रकृति और समूची सृष्टि के प्रति पर्युत्सुक बनाते हैं। आर्ष परम्परा और साहित्य को श्रीनरेश मेहता के काव्य में नयी दृष्टि मिली।

