आत्मदया के क्षण

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आत्मदया का क्षण

शहर रहते हुए 
मैं मर जाऊँगा 
दिन गिन रही होगी बीसवीं शताब्दी 
न प्राविडेंट फंड 
न परिवार 
कोई नहीं आएगा बचाने 
बचना भी कहाँ चाहूँगा 
शहर रहेगा मैं मर जाऊँगा 
लोग : जिन्हें लगता हूँ शत्रु 
कुछ तब भी होंगे 
मूर्ख अनुभव करते हुए 
कुछ सगे मेरे 
नाटक करेंगे दु:ख का 
ढँक कर कहेंगे मेरी कमज़ोरियाँ 
मैं भी था भला आदमी! 

आज के मेरे विक्षोभ 
हो चुके होंगे तब शिलाभूत 
आहत हो चुकी होंगी पीढ़ियाँ 
सभ्यता चढ़ गई होगी 
और कई सीढ़ियाँ 
जबकि मैं लपटों में 
पता नहीं किसकी तरह खो जाऊँगा! 

मेरे शरीर पर कहीं नहीं लिखा मेरा नाम 
फिर भी अँधेरा, 
मेरी कविताओं का 
कौंधेगा मेरे आस-पास 
कोई नहीं होगा उदास 
प्रतिबद्धता विद्रोह प्यार मूर्खता 
सबके होते हुए मैं बिखर जाऊँगा 

शहर फिर भी होगा 
मैं मर जाऊँगा! 


रचना के जन्म पर

सारी रात बीती प्रसव-पीड़ा में 
कब उसका जन्म हुआ—नहीं याद 
बेहोशी में 
समय का चंद्रमा 
स्याह पड़ जाता है। 
दुपहर बाद जब आँख खुली 
आवाज़ आई—बधाई! 
यह मेरी अपनी ही 
जनी कविता की 
काकली रही होगी 
बेसुधी में ही याद पड़ा 

मेरे आने के पाँच वर्ष बाद 
घर में जन्मी थी नन्ही कलिका 
सहोदरा 
तब भी कहा था आकर 
धाय माँ ने 
बधाई! और फिर 
मुझे विलग कर दिया गया 
उस दिन के बाद से 
कहीं भी जब, देता है कोई बधाई 
बड़ा डर लगता है 
बधाई के साथ मैं अलगाया गया 
माँ से 
फिर मिली बधाई 
पदक मिलने पर 
तब भी सहपाठी 
उदासीन हो गए 
बन गए ईर्ष्या के अनाम घेरे 
हर प्रशस्ति के साथ 
मित्र अस्त हो गए 
अब जागा हूँ 
साफ़ दिख रहा है 
बधाई विलगाव है। 
मेरी प्रसव-पीड़ा का बिना ज़िक्र हुए 
यह कविता भुगतेगी 
यश और भर्त्सना 
कसाई के हाथों पड़कर 
माँगेगी जीवनदान 
अथवा फिर मेरी अनिच्छा के बावजूद 
झेलेगी 
सत्कार या बलात्कार 
ग़लत सही किसी जौहरी का। 
पारखी-मेज़ पर जो भी होगा 
इस नवजात का 
मैं कानों से अंधा सिर्फ़ 
आगे की सोचूँगा। 
हो सकता है उस पर विमर्श करें 
कुछ नए दल्ले 
जिनका धंधा नवशोचनीय है 
गोपनीय तो कुछ रहता नहीं 
फिर ग़म क्या! 


कैलाश वाजपेयी (11 नवंबर 1936-01 अप्रैल, 2015) हिन्दी साहित्यकार थे। उनका जन्म हमीरपुर उत्तर-प्रदेश में हुआ। उनके कविता संग्रह ‘हवा में हस्ताक्षर’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया था।