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| छवि श्रेय: गूगल |
कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा
शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे
जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा
ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से
तुम मिरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा
क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ
जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है
सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है
कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ
हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है
चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर
सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है
इतनी भी हमें बंदिश-ए-ग़म कब थी गवारा
पर्दे में तिरी काकुल-ए-पुर-ख़म तो नहीं है
अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल
ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है
सहरा में बगूला भी है 'मजरूह' सबा भी
हम सा कोई आवारा-ए-आलम तो नहीं है
मजरुह सुल्तानपुरी (१९१९-२०००) एक भारती उर्दू शायर थे। हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार और प्रगतिशील आंदोलन के उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक थे। वह २०वीं सदी के उर्दु साहिती जगत के बेहतरीन शायरों में गिना जाता है। बॉलीवुड में गीतकार के रूप में प्रसिद्ध हुवे। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए देश, समाज और साहित्य को नयी दिशा देने का काम किया।

