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| छवि श्रेय: गूगल |
कन्याकुमारी
सागर-तीर तरंगाकुल भाषा में सूख रहा हूँ।
खजूर वन की रभस-छायाओं में ईर्ष्या-कृशकाय
पवन-वन्या के हहास में अस्थिर
लहर-लहर में टटोल रहा हूँ—
खुले केश, भागती, चहकती
कन्याकुमारी।
जल का एकांत बुलाता है।
कहीं बनबासिन माँ की उत्तर-हीन साँझ—
प्रातःविदा की गूँगी श्रुतिलिपि
अपनी ही छाँहीं में डूब रही है।
कन्याकुमारी माँ, जल में जनती है
तृषाकुल पुत्रों की ममता-नावें
यश की फेन-पताकाएँ।
भरती है कितनी पिपासा जन-जन में
कि लोग टूटी पीठ पर लादे फिरते हैं
सागर का नीला-नीला बोझ,
और कितना विरह जल की छाती में बिछा कर
उड़ जाती है सागर पार।
जल के एकांत में पालों की फुनगियाँ...
नावें बुझती हैं—क्षितिज में डूब रही हैं।
सागर-तीर तरंगाकुल भाषा में जोह रहा हूँ
बनबासिन माँ को मिलन-बेला पर।
माँ है कि नहीं आती...
खुले केश, भागती, चहकती कन्याकुमारी
सागर में डूब गई है—
तृषाकुल, हाँफती
नावों के संग।
आंखों में आँखें नहीं हैं
सभी आवाज़ें मिलकर—गड्डमगड्ड सुबक रही हैं...
मेरे सिरहाने, टप-टप अकेली एक बूँद टपक रही है।
आँखों में आँखें नहीं हैं, दर्पण में
दर्पण नहीं है, चुप में चुप नहीं है,
फिर भी तुम्हारे लिए आँसू बहते हैं, दर्पण लहकते हैं,
आँधी में कई-कई स्वर मेरे होंठों में बहते हैं।
मुँह अँधेरे ही तुम मेरे पहलू में करवट बदल रही हो
तुम मेरी बाँहों में सरक रही हो, क़दम-क़दम पर
अपना संगीत छोड़, दरवाज़ा लाँघ रही हो...
निर्णय ले रही हो—लौट रही हो—
सहसा लिपट कर सिसक रही हो।
आँखों में आँखें नहीं हैं
फिर भी मैं देख रहा हूँ—तुम्हें नखशिख।
दर्पण में दर्पण, चुप में
चुप नहीं है।
दूधनाथ सिंह (जन्म:१७ अक्टूबर, १९३६ एवं निधन १२ जनवरी, २०१८) हिन्दी के आलोचक, सम्पादक एवं कथाकार थे। उन्होने अपनी कहानियों के माध्यम से साठोत्तरी भारत के पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक एवं मानसिक सभी क्षेत्रों में उत्पन्न विसंगतियों को चुनौती दी।

