निवेदन: विष्णु खरे

विष्णु खरे
















निवेदन

डॉक्टरों मुझे और सब सलाह दो 
सिर्फ़ यह न कहो कि अपने हार्ट का ख़याल रखें और 
ग़ुस्सा न किया करें आप— 
क्योंकि ग़ुस्से के कारण आई मृत्यु मुझे स्वीकार्य है 
ग़ुस्सा न करने की मौत के बजाय 

बुजुर्गो यह न बताओ मुझे
कि मेरी उम्र बढ़ रही है और मैं एक शरीफ़ आदमी हूँ 
इसलिए अपने ग़ुस्से पर क़ाबू पाऊँ 
क्योंकि जीवन की उस शाइस्ता सार्थकता का अब मैं क्या करूँगा 
जो अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर एक पीढ़ी पहले 
आपने हासिल कर ली थी 

ग्रंथो मुझे अब प्रवचन न दो 
कि मनुष्य को क्रोध नहीं करना चाहिए 
न गिनाओ मेरे सामने वे पातक और नरक 
जिन्हें क्रोधी आदमी अर्जित करता है 
क्योंकि इहलोक में जो कुछ नारकीय और पापिष्ठ है 
वह कम से कम सिर्फ़ ग़ुस्सैल लोगों ने तो नहीं रचा है 
ठंडे दिल और दिमाग़ से यह मुझे दिख चुका है
 
ताक़तवर लोगों मुझे शालीन और संयत भाषा में 
परामर्श न दो कि ग़ुस्सा न करो 
क्योंकि उससे मेरा ही नुक़सान होगा 
मैं तुम्हारे धीरोदात्त उपदेश में लिपटी चेतावनी सुन रहा हूँ 
लेकिन सब कुछ चले जाने के बाद 
यही एक चीज़ अपनी बचने दी गई है
 
डॉक्टर तो सदाशय हैं भले-बुरे से ऊपर 
लेकिन बुजुर्गो ग्रंथो ताक़तवर लोगो 
मैं जानता हूँ 
आप एक शख़्स के ग़ुस्से से उतने चिंतित नहीं हैं 
आपके सामने एक अंदेशा है सच्चा या झूठा 
चंद लोगों के एक साथ मिलकर ग़ुस्सा होने का 


अंतिम

क्या याद आता होगा मृत्यु के प्रारंभ में 
मर्मांतक वेदना की लंबी मौत 
या कृतज्ञ बेहोशी में या उससे कुछ पहले— 
एक बहुत नन्ही लड़की अँगुलियाँ पकड़ती हुई 
या पास आती हुई दो दमकती आँखें 
या बचपन और पुराना घर और धूप-भरी सुबहें और रेलगाड़ी 
या बहुत सूनी गर्मियों की उदास दुपहर अथवा 
उससे भी बोझिल शाम के एक-दो पेड़ वाले रास्ते 
या चीज़ें जो की नहीं गईं या एक घर जो कभी नहीं बना 
या दुःख जो दिए गए 
या सुख जिन्हें छुआ नहीं गया 
और इन सबके होने और न होने की व्यर्थता 
यह सब याद आता होगा और एक पक्षी का उड़ना भी 
किसी एक अनाम फूल का हवा में हिलना और 
मौसमों की संधि-वेला की गंध का स्पर्श और सूर्योदय और सूर्यास्त 
और अँधियारे आकार और रहस्यमय रात्रि 
और यह करुण एहसास 
कि यह सब अंतिम है—एक पूरे होते हुए जीवन को 
बचे हुए कुछ भयार्द्र क्षणों की 
डूबती हुई स्मृति में जीना।


विष्णु खरे (२ फरवरी 1940-19 सितम्बर २०१०) एक भारतीय कवि, अनुवादक, साहित्यकार तथा फ़िल्म समीक्षक, पत्रकार व पटकथा लेखक थे। वे हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखते थे। वे अंग्रेजी साहित्य को विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाते थे। उन्होंने साहित्य अकादमी में कार्यक्रम सचिव का भी पद सम्भाल चुके हैं तथा वे हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स के लखनऊ, जयपुर तथा नई दिल्ली में सम्पादक भी रह चुके थे।