विश्वास की बात

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विश्वास की बात

उन दिनों अलमोड़ा में था। 'ताला बाज़ार की लोहे के शेरवाली सीढ़ियों से माल-रोड पर उतरते समय सामने सूर्यास्त का दृश्य दिखाई दे रहा था। सूर्य की विदा लेती सिन्दूरी किरणों में क्षितिज काँपता सा, अस्थिर सा जान पड़ रहा था और नीलंगू पहाड़ियाँ बड़े-बड़े अजगरों की भाँति तंग नगइ में दूसरों के नीचे दबने से बचने के लिये किलकिला कर ऊपर चढ़ी श्राती-सी जान पड़ती थीं। गुलाबी झलक लिये श्राकाश के पट पर त्रिशुल की बर्फानी चोटियाँ ऐसे उभरी हुई थीं कि श्राग की लपटों का चित्र बनाकर लगा दिया हो। बहुत दूर तक रंग की पिघली हुई आग की यह होली दिखाई दे रही थी।

उस संघया वकील साहब के यहाँ दावत थी। वकील साहब साथ ही थे । सम्भवतः इस आशंका में कि दूर 'हीराडु' गरी में उनके मकान तक चलने से कतरा कर मैं दावत की बात भूल ही न जाऊँ ।

अलमोड़ियों को अपने नगर और पहाड़ के प्राकृतिक सौन्दर्य का उतना ही गर्व है जितना किसी युवती को अपने रूप का हो सकता है। अलमोड़ा की शोभा के प्रति दूसरों का आदर देखकर उन्हें सन्तोष होता है। अलमोस के इस स्वाभाविक सौन्दर्य वैभव की तुलना में मैंने नैनीताल की चर्चा छेड़ी .....गढ़े में छिपी झील को सूर्योदय और सूर्यास्त से कोई सरोकार नहीं" बिजली की तेज रोशनी में रसिक की कल्पना र आवश्यकता के अनुरूप 'मेकअप' से मोहक और सुन्दर बनी निशाचरी सौन्दर्य व्यवसायिनी के समान अपने गर्व को छिपाने की शालीनता में वकील साहब ने मोचना की विनय से कहा- "पर एक बात बुरी है अलमोड़ा में सवारी यहाँ किसी मी तरह की नहीं मिल सकती। नैनीताल, मसूरी में मोटर, ताँगा न सही

रिक्शा, घोड़ा और बांडी तो हर समय मिल सकते हैं । " मैंने वकील साहब की बात का विरोध किया— “यही तो अलमोड़ा की खूबी है कि सवारियों के लिये काफी पैसा खर्च न कर सकने की अपनी आर्थिक क्षुद्रता यहाँ खलती नहीं।"

बात वकील साहब को जँची और समर्थन में बोले इससे बड़ी बात यह है कि राहचलतों में समता का एक भाव स्वयम् ही बन जाता है। "


जब दावत के बाद रात साढ़े दस बजे के अंधेरे में 'हीराडु गरी' से 'देवदार' तक पैदल जाने की विवशता की स्थिति सामने आई तो अलमोड़ा में सवारियों के प्रभाव की खूबी' खल गई । परन्तु इस 'खूबी' को तो सराह चुका था। अब क्या कहता १ मन ही मन सोचा–परिस्थितियां और आवश्य कतायें मनुष्य के विचार किस प्रकार बदल देती है। मनुष्य के विचार परि स्थितियों से स्वतंत्र नहीं हो सकते"

वकील साहब अंधेरे और विषम मार्ग का ख्याल कर बिजली की बत्ती का प्रकाश रास्ते पर डालते हुए साथ-साथ चल रहे थे। उनकी इस सज्जनता के प्रति कृतज्ञता प्रकाश के लिये उनके हाथ में थमी बिजली की बत्ती की ही सराहना की – "विज्ञान ने जहाँ संसार का रूप बदल देने वाले बड़े-बड़े साधन बनाये हैं, वहाँ वैज्ञानिक विकास के परिणाम में बनी छोटी-मोटी चीज़ों का भी महत्व हमारे जीवन में कम नहीं देखिये, इस समय यह टार्च न होती तो दिया या मशाल लेकर इस रास्ते पर चलना क्या आसान होता ?"

" अभ्यास की बात है" - वकील साहब ने अपने स्वर को स्पष्ट करने के लिये मुह में भर गयी पान की पीक निगल कर कहा- "यहाँ के लोग अंधेरे में भी धड़ाधड़ाते हुए चले जाते हैं। "

"परन्तु अंधेरे में, ऊबदलावद राह पर ठोकर लग जाने की आशंका तो बहुत रहती होगी ।”

"ॐ, ठोकर नहीं लगती; पॉब सध जाते है |" पान के रस से ढीले स्वर में वकील साहब बोले – “इस इलाके में डर रहता है, अकसर सांप का - 'डु' गरी' के आस-पास, सांप काफ़ी निकलते हैं। लोगों का ख़याल है कि ऊंची और ठंडी जगह में साँप कसर नहीं होता। लेकिन, जाने क्या कारण; यहाँ तो बहुत हैं ।"

निश्चय न कर पाया कि सांपों की उपस्थिति और अधिकता मी वकील साहब के लिये गर्व का कारण है या इसके लिये समवेदना प्रकट करना उचित होगा। बात चालू रखने के लिये उत्तर दिया- “ऊंची जगह में सांप नहीं होते १ 'हीरादुंगरी' की समुद्रतल से ऊंचाई पाँच हजार फुट से अधिक न होगी ?" मैने प्रश्नात्मक दृष्टि से वकील साहब की ओर देखा और समर्थन में हुंकारा पाकर बोला – “मैंने समुद्रतल से दस-ग्यारह हज़ार फुट की ऊंचाई - पर 'नारकंडा' के समीप 'हटू के टिब्बे' की पगडण्डी पर सन् १६४६ में ताज़ा मरा हुआ सौंप देखा था साँप वहाँ होता होगा तभी किसी ने मारा होगा। मरा हुआ साँप मैदान से भला वहाँ कोई क्यों ले गया होगा ??

"किस किस्म का सौंप था ?" बकौल साहब की अँधेरे में खूब फैल गई। उनके स्वर से भी मालूम हुआ कि इस विषय में उन्हें उत्सुकता और अधिकार भी है।

सर्पविद्या का कुछ भी ज्ञान न होने के कारण सतर्कता से उत्तर दिया- "मैं तो इस विषय में कुछ भी नहीं जानता। वह साँप प्रायः हाथ भर लम्बा होगा, रंग भूरा चमकीला था और पीठ पर काले काले धब्बे थे।"

कुछ पल-पान के रसास्वादन में या सर्पविद्या के विवेचन में मौन रह कर वकील साहब ने मत प्रकट किया – “हूँ शायद छोटा क्रेटर होगा। लेकिन - यहां तो ख़ासी लम्बाई के विषैले क्रेटर और बड़े-बड़े को ( फनियर ) भ बहुत होते हैं महाभारत में जिस नागदेश का वर्णन है, वह इलाका भी यहां से दूर नहीं है और मुझे तो यहाँ सांपों से कुछ कुछ क्या; बहुत काफ़ी सम्पर्क पड़ता रहता है। "

उस अँधेरे और बी रास्ते पर सांपों की चर्चा उत्साहवर्धक न थी परन्तु वकील साहब की बात में अरुचि प्रकट करना भी, जब कि वे अंधेरे में राह दिखाने चले आ रहे थे, अशिष्टता होती सतर्कता से हुँकार भरता आ रहा था और वकील साहब इसे प्रस्तुत प्रसंग में मेरी रुचि का प्रमाण समझ कर कहते गये

"मेरी अपेक्षा मेरी 'वाइफ़' का साँपों से सामोप्य और नक्षत्र योग अधिक जान पड़ता है। चार साल पहले हम 'थपलिया' मुहल्ले में रहते थे। एक साँझ अँधेरा घना नहीं हुआ था, 'बाइक' आँगन की सीढ़ियों से ऊपर की मंजिल में जा रही थीं। दूसरी सीढ़ी पर उनका पाँव पड़ा ही था कि उन्हें चप्पल के नीचे कोई चीज़ हिलती-सी अनुभव हुई। डर कर पाँव हटा लेने के बजाय उन्होंने शरीर का पूरा बोझ उसी पाँव पर डाल दिया और नौकर को बत्ती लाने के लिये पुकारा नौकर जब तक बत्ती लेकर आया वे उस पाँव पर वैसे ही जोर दिये रहीं बल्कि रेतीले पत्थर की सीढ़ी पर उन्होंने चप्पल को खूब मसल दिया।

"रोशनी आने पर देखा कि चप्पल के नीचे एक छोटा-सा साँप ! भाग्य की बात कि साँप कुण्डली मारे बैठा था। उसका मुंह और अधिकांश शरीर कुण्डली में लिपटा होने के कारण चप्पल के नीचे आ गया। पूछ का केवल पाँच छः ॐ गली भाग चप्पल के बाहर छटपटा रहा था। 'वाइफ' डर तो बहुत गई परन्तु चिल्ला कर उछल नहीं पड़ीं पाँव पर और अधिक बोझ डाल उन्होंने सौंप को खूब कुचल दिया और तब पाँव उठाया ।

“पुकार सुन कर मैं आया और देखा हाथ भर से भी छोटा विषैला - क्रेटर कुचला पड़ा है। धूसर, भूरा-सा रंग और पीठ पर काले धब्बे |" " मिट्टी का सा भूरा रंग होने से तो ऐसे साप का अँधेरे में दिखाई देना

भी कठिन है । इसलिये सतर्कता से भी कुछ लाभ नहीं ।" मैंने कहा प्रसंग बदलने की मेरी इच्छा की ओर ध्यान न देकर वकील साहब ने आश्वासन दिया – “उसकी चाल और चमक से तो मालूम हो जाता है। - रात में कई बार सांप मिले हैं और मैं उन्हें मार चुका हूँ।" 'अच्छा, आपने कभी हरे रंग का सांप देखा है ?" वकील साहब ने मेरी ओर देखा -

विषम मार्ग पर नज़र गढ़ाये ही मैंने उत्तर दिया- “नहीं तो " वकील साहब दो वर्ष पूर्व की एक घटना सुनाने लगे – “दोपहर के समय बहुत भारी बरसात होने से आँगन में इतना पानी भर गया था कि घर से पानी बाहर बहाने वाली नालियों से पानी भीतर आने लगा ! रसोई में भी पानी आ रहा था। 'वाइफ' रसोई का काम समाप्त कर चुकी थीं श्रीर स्वयं चौके में जल्दी-जल्दी भात खा रही थीं। भात कच्ची रसोई होने के कारण चौके के बाहर नहीं ले जाया जा सकता। कुछ ऊँचे बने पक्के चौके के नीचे एक मूठ ऊँचाई तक पानी भर गया था। नौकर भी चौके के बाहर एक अटाली पर भात खा रहा था ।

“हम लोग साथ के कमरे में भीगती हुई चीजें सँभाल रहे थे । 'साँप साँप – रसोई से नौकर की पुकार सुनाई दी। हम लोग लाठियाँ लेकर तुरन्त - पहुँचे। नौकर अटाली पर और 'वाइफ़' ऊँचे चौके में पटड़े पर घबढ़ाये हुये सिमटे बैठे थे ।

हम लोगों के पूछने पर 'वाइफ़' ने उत्तर दिया- “मैंने तो नहीं देखा । "

नौकर ने उत्तर दिया- "हरे रंग का बहुत बड़ा सौंप रसोई की नाली से श्राया है। वराणज्यू ( बहूजी ) के पटड़े के नीचे गया फिर निकलते नहीं देखा ।

“वाइफ़ घबरा कर पटरे से कूद चौके से बाहर हो गई। नौकर भी बाहर कूद आया । लाठियाँ सँभाल, सतर्क हो एक बाँस से चौके में पड़ा पड़ा उलट दिया गया ।

"सचमुच एक बहुत बड़ा साँप कुण्डली मारे बैठा था। पटड़ा उलटते ही और लाठियाँ ऊपर उठते-उठते साँप तेजी से, रसोई में भरे पानी में तैरता हुआ, नाली की श्रोर भाग चला ।

तैरते हुए साँप पर लाठी का बार करना व्यर्थ था। चोट पूरी न पड़ती और वह उलट कर वार करता। हम लोगों के देखते-देखते साँप भाग गया। रसोई के बाहर तो उसे खोजा ही क्या जा सकता था साँप का रंग पकी घास की तरह बिलकुल हरा था। हरे रंग के साँप यहाँ काफी होते हैं। "

मेरे निरन्तर हुँकारा भरते रहने से सर्पविद्या में मेरी जिज्ञासा अनुमान कर वकील साहब बोले- "इससे बढ़ कर श्रद्भुत एक घटना मैं आपको सुनाता हूँ । आपने स्याल किया होगा, जिस कमरे में हम लोग बैठे थे, उसके बरामदे के नीचे खुली जगह है। बरसात बीत जाने पर वहाँ बैडमिंटन का कोर्ट बना लेते हैं। उसके बायीं ओर नीची-सी जगह में सील रहने के कारण फूलों के बीज फेंक देने से फूलों की झाड़ियाँ खूब पनप आती हैं।

“पिछले वर्ष अप्रैल के शुरू में एक सांझ बच्चे वहां खेल रहे थे कि किसी ने पुकारा, सांग सांप में बैठा मुवक्किलों से बातें कर रहा था । चिल्लाहट सुन कर उठा ही था कि लड़की ने आकर कहा- “पिताजी सांप लड़ रहे हैं।

“बाहर जाकर देखा, बैडमिंटन के कोर्ट की बायीं ओर फूलों से गंजी क्यारी में दो काले फनियर ( कोपरे ) सांप नीचे दुशाखी टहनी की तरह जुड़े हुए और जमीन से डेढ़ हाथ ऊपर अलग-अलग उठे हुए हैं। सांप नीचे आपस में बल खाये हुए ये परन्तु ऊपर दोनों के सिर एक बालिस्त से भी दूर, अलग-अलग थे। वे भूम-झूम कर, लचक तचक कर अपने फन पल भर के लिये मिला लेते; जैसे चूम रहे हो और फिर अलग हो एक दूसरे से आँख मिलाये लहराने और लचकने लगते। दोनों हवा में ऐसे लहरा रहे थे जैसे बीन के स्वर पर मुग्ध सांप भूमता है। श्रङ्गभङ्गी र लोच के उस सौन्दर्य की बराबरी कोई भी नृत्य नहीं कर सकता और न उसका पूरा बखान करना ही सम्भव है। आप उसे काल्पनिक सौन्दर्य ही कह सकते हैं। सब लोग देख कर स्तब्ध थे और दोनों सांप अपने में भूले हुए। उन्होंने अपने चुम्बन कई बार दोहराये । अपने देखा होगा, सांप बहुत सतर्क होता है | ज़रा से खटके और श्राइट से भाग जाता है। परन्तु ये साँप काम-क्रीड़ा में इतने आत्म-विस्मृत थे कि भीड़ की उपस्थिति और शोर से भी बेखबर।

“अब समस्या थी कि इन्हें मारा कैसे जाय १ सांप को मारने का कायदा है कि चोट फन पर पड़े और सिर कुचल दिया जाय। साँप का सिर धरती पर रहने से उस पर चोट कर उसे कुचला जा सकता है। इन दोनों के सिर ऊंचे हवा उठे हुए थे। फिर एक नहीं दो ! अगर एक बार में एक का में सिर टूट भी जाता तो दूसरा अवश्य हमला करता।

"प जानते हैं, सांप बदला लेने के लिये मशहूर है। मीलों पीछा करता है। महाभारत में परीक्षित और तक्षक की कहानी है ही और फिर इस भोगातुर जोड़े में से जो भी एक बच जाता, वह कितनी बुरी तरह पीछा करता ?

"सोचा गया, जिस समय सांपों के फन जुड़े हुए हों, तीन चार लाठियों से एक साथ बार करके उनके फन तोड़ दिये जायं। उनके फन मिलने पर एक-दो-तीन करके लाठियों चलाने को होते कि उनके फन अलग हो लहराने लगते ।

"इतने में कोई बोल उठा- 'भोगातुर सांपों को मारना बहुत भारी अपराध है। सांप मर जाने पर भी प्रेत बन कर इसका बदला लेगा। इस बात से लोगों का साइस टूट गया । लोग कहने लगे- 'जाने दो, जाने दो। किसी का क्या बिगाड़ रहे हैं ? भगवान के जीव हैं।"

"परन्तु अपने आँगन में कोबरा सांपों के बच्चे देने की उपेक्षा करना मेरे लिये सम्भव न था। सांपनी एक बार में सैकड़ों अंडे देती है। पर अब कठिनाई यह थी कि सांपों पर लाठी चलाने के लिये कोई तैयार न हो रहा था। उससे कुछ ही दिन पहले एक घटना हो चुकी थी: -

"एक दिन रानीखेत से इधर 'मजखाली' के पास एक ड्राइवर लारी लिये चला था रहा था। उसने सड़क को पार रोके कोबरा सांपों के जोड़े को भोग करते देखा। ड्राइवर ने मारी रोक दी और सड़क तज्ञ होने के कारण बैंक करने ( उल्टे मुंह ) पीछे हट रहा था कि चौड़ी जगह देख कर लारी का मुँह घुमा ले। उसके पीछे से एक और लारी गयी। इस लारी के ड्राइवर का नाम था जमनासिंह | जमनासिंह ने पहले ड्राइवर से लारी लौटाने का । से कारण पूछा

"उत्तर सुन कर जमनासिंह ने हंस कर कहा- 'सांपों का जोड़ा तेरा क्या कर लेगा ? गाड़ी का अगला पहिया उनके सिर पर से गुजार दिया होता। डरपोक कहीं का ?.

“पहली तारी के ड्राइवर बच्चीराम ने दोनों कान छू कर उत्तर दिया 'ना भाई, न तो मैं यह पाप सिर लू और न नाग देवता से लड़ने की हिम्मत मुझ में है।"

'ऐसी-तैसी तेरे नाग देवता की जमनासिंह ने उत्तर दिया और अपनी लारी आगे बढ़ा कर चल दिया।

"साँपों का जोड़ा अब भी उसी तरह सड़क को रोके था। जमनासिंह ने

लारी को सड़क के बायें करके पहिया साँपों के सिर पर से गुज़ार दिया। दोनो साँपों के सिर और पेट बुरी तरह कुचल गये । सौंप मोटे रस्सों की तरह उलझे हुए सड़क पर उछल उछल कर छटपटाते रहे। जमनासिंह का भी नहीं। हंसता हुआ और साँपों को गाली देकर साथ के लोगों को सुनाकर चला गया— 'क्या लोग हैं, कीड़ों से डरते हैं।' -

“जमनासिंह अलमोड़ा पहुँचते-पहुँचते कुछ सुस्त और उदास हो गया । 'टोल बार' पर आकर उसने पर्ची के लिये गाड़ी रोकी पर्ची की प्रतीक्षा में खड़ा खड़ा क्लीनर से बोला- 'भाई बुरा किया सौंप अपना क्या ले रहे थे। खैर हो गया । आज नहीं तो साले कल लोगों को काटते । और " बच्चे देते तो सैकड़ों साँप और बढ़ते और मुसीबत होती

"तीन मील और चलकर अलमोड़ा पहुँचते-पहुँचते जमनासिंह बहुत उदास हो गया। गाड़ी अड्डे पर खड़ी कर देने के बाद जिस ड्राइवर से मिलता साँपों को कुचल डालने की बात पर खेद प्रकट करने लगता उसके मन की खिन्नता बढ़ती गयी। पर लौटते समय वह उदासी दूर करने के लिये ठेके की दूकान से शराब का एक श्रद्धा लेता गया | जमनासिंह ने शराब पी ली और लेट गया। आधी रात के करीब वह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा- 'सौंप ! सौंप ! मारो ! मारो !" !

"पड़ोस के लोगों ने आकर देखा कि उसे खूब तेज बुखार चढ़ा हुआ था। लोगों ने समझा नशे में था दिल पर बोझ आ जाने से डर गया है उसे जगाकर होश में लाने का यत्न किया परन्तु वह होश में न आ सका और सुबह होते-होते उसके प्राण निकल गये । "

वकील साहब बोले – “ठाकुर मातासिंह ने जमनासिंह का यह किस्सा कह सुनाया तो भला कोई आदमी साँपों पर लाठी चलाने में मेरा साथ क्या देता ? साँपों का जोड़ा अब भी निर्भय और निश्शंक अपनी प्रणय लीला का नृत्य कर रहा था । सब लोग विस्मय और आतंक से उस भय मिश्रित सौन्दर्य को देख रहे थे। उस संकट में सूझा कोई हिन्दू तो इस समय साथ देगा नहीं। - अपने छोटे भाई को भेजा कि तुरन्त जाकर अपने मित्र और पड़ोसी गिलबर्ट को सब बात समझा कर बन्दूक और छर्रा लेकर आने के लिये कहे ।

“गिलबर्ट हिन्दुस्तानी ईसाई है; शिकार का बहुत शौकीन निशाना भी अच्छा है। परन्तु उसने आने में काफ़ी देर कर दी। मेरे प्राण सूख रहे थे। कि यदि साँप चौंक कर घास में जा छिपे या किसी बिल में जा घुसे तो सदा के लिये श्राशंका हो जायेगी। गिलबर्ट को पहुँचने में काफी समय लगा परन्तु सौंप भी अपने में मस्त, सब कुछ भूले हुए निश्शक थे। वैसे ही धरती से डेढ़ हाथ ऊपर उठे, हवा में लहराते हुए, कभी थालिंगन में लिपट जाते, कभी अलग होते, चूमते और फिर अलग-अलग हो जाते।

“गिलबर्ट ने अपनी दुनाली में बारह नम्बर के छरें के दो कारतूस भरे और साँपों के मुइ मिलाने पर निशाना साधा गिलबर्ट निशाना ले ही पाया था कि साँपों के फन अलग हो गये और वे एक दूसरे से आँख मिलाये श्रामने-सामने लहराने लगे | गिलबर्ट दम रोके, साँपों के मुंह फिर मिलने की प्रतीक्षा में बन्दूक को साधे रहा। ज्यों ही साँपों के मुंह फिर मिले, पल भर निशाने का निश्चय कर गिलबर्ट ने लगभग एक साथ ही दोनों घोड़े दबा दिये। दोनों साँपों के सिर प्रायः बालिस्त-बालिस्त भर उड़ गये। दो ऐंडती, बलखाती नालियों से लहू के फुव्वारे उड़ने लगे। दोनों सौंपस में उलझते, उछलते, छटपटाते रहे। इन साँपों को पूंछ से पकड़ कर उठाया गया तो हाथ सिर से ऊपर तक ले जाकर लटकाने से भी उनकी टूटी हुई गर्दनें घास को छू रही थीं। दोनों साँप उठ फुट से कम न थे ।"

वकील साहब ने इस विस्मयजनक घटना का प्रभाव मुझ पर देखने के लिये मेरी आँखों में देखा । साँपों की लम्बाई के प्रति विस्मय प्रकट करने की अपेक्षा मुझे दूसरी ही उत्सुकता थी। पूछा- “गिलबर्ट का क्या हुआ ?''वह भी नाग देवता के विलास में विघ्न डालने के अपराध में छटपटा कर मर गया या नहीं ?"

वकील साहब ने दूसरा हाथ हिलाकर मुख में पान की शेष लीजि थूकते. हुए उत्तर दिया – “ कुछ भी नहीं होता क्या ? वे लोग तो यह सब कुछ - मानते नहीं। उसे क्यों कुछ होता ? यह तो विश्वास की बात है। विश्वास बड़ी भारी ताकत है, श्राप जानते ही हैं।"

"तो फिर आदमी ऐसे श्रात्मनाशी मिथ्या विश्वास में फंसे ही क्यों ?" -

मैंने प्रश्न किया । वकील साहब सांपों की एक और बात सुनाना चाहते थे परन्तु मैं बार बार मिथ्या विश्वास से आत्महत्या की बात कर रहा था इसलिये बात उखड़ गयी।


यशपाल (३ दिसम्बर 1903-26 दिसम्बर १९७६) हिन्दी साहित्य के प्रेमचंदोत्तर युगीन कथाकार हैं। ये विद्यार्थी जीवन से ही क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े थे। इन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन् १९७० में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।