कोहरे में शायद न भी दीखे

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कोहरे में शायद न भी दीखे

वो गया
बिल्कुल ही चला गया
पहाड़ की ओट में

लाल-लाल गोला सूरज का
शायद सुबह-सुबह
दीख जाए पूरब में
शायद कोहरे में न भी दीखे !
फ़िलहाल वो
डूबता-डूबता दीख गया !
दिनान्त का आरक्त भास्कर
जेठ के उजले पाख की नौवीं साँझ
पसारेगी अपना आँचल अभी-अभी
हिम्मत न होगी तमिस्रा को
धरती पर झाँकने की !
सहमी-सहमी-सी वो प्रतीक्षा करेगी
उधर, उस ओर
खण्डहर की ओट में !
जी हाँ, परित्यक्त राजधानी के
खण्डहरोंवाले उन उदास झुरमुटों में
तमिस्रा करेगी इन्तज़ार
दो बजे रात तक
यानि तिथिक्रम के हिसाब से,
आधी धुली चाँदनी
तब तक खिली रहेगी
फिर, तमिस्रा का नम्बर आएगा !
यानि अन्धकार का !


चलते-फिरते पहाड़

तुम्हारी आँखें छोटी हैं
दाँत बड़े-बड़े हैं—
बाहर निकले हुए, झक सफेद
डील-डौल भारी है
तुम काले हो
शाकाहारी जीव
लम्बी सूँड़ ही तुम्हारी नाक है
अपनी सूँड़ से
आप कई काम लेते हो
धीर प्रकृति के
ओ चलते-फिरते पहाड़ !
अजी, तुम्हें छोटी-छोटी बातों पर
गुस्सा नहीं आता
कभी आ भी जाए तो
अपने क्रोध पर
तुम्हारा नियन्त्रण जग जाहिर है
तुम्हारा सेवक (महावत) ही
सच्चा सखा होता है तुम्हारा
तुम भुलक्कड़ कतई नहीं हो !

केरल के ‘गुरूवायूर’ देवस्थान के परिसर में
चालीस है तुम्हारी तादाद
सुना है, वहाँ तुम्हारे महानायक की
अर्धांगिनी का प्राणान्त हुआ
तब आपने कई दिनों तक
अन्न-जल त्याग दिया था
तुम्हारा ‘महाशोक’ तब कैसे कम हुआ ?
बतलाओ भी तो जरा !
ओर धीर प्रकृति के चलते-फिरते पहाड़ ?


नागार्जुन (30जून 1911- 5 नवम्बर 1998) का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। वह हिन्दी और मैथिली के लेखक और कवि थे। वह अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार थे । उन्होंने संस्कृत एवं बाङ्ला में भी मौलिक रचनाएँ कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया