दुख ने दरवाज़ा खोल दिया

छवि श्रेय: गूगल









 दुख ने दरवाज़ा खोल दिया

मैंने तो चाहा बहुत कि अपने घर में रहूँ अकेला, पर-
सुख ने दरवाज़ा बन्द किया, दुख ने दरवाज़ा खोल दिया ।

मन पर तन की साँकल देकर
सोता था प्राणों का पाहुन
पैताने पाँव दबाते थे
बैठे चिर जागृत जन्म-मरण,
सिरहाने साँसों का पंखा
झलती थी खड़ी-आयु चंचल,
द्वारे पर पहरेदार बने
थे घूम रहे रवि, शशि, उडुगन,

फिर भी चितवन का एक चोर फेंक ही गया ऐसा जादू
अधरों ने मना किया लेकिन आँखों ने मोती रोल दिया!
सुख ने दरवाज़ा बन्द किया, दुख ने दरवाज़ा खोल दिया ।

जीवन पाने को शलभों ने
जा रोज़ मरण से किया प्यार,
चन्दा के होंठ चूमने को
दिन ने चूमे दिन-भर अंगार
निज देह गलाकर जब बादल
हो गया स्वयं अस्तित्वहीन,
आ सकी तभी धरती के घर
सावन-भादों वाली फुहार,

दुनिया दुकान वह जहाँ खड़े होने पर भी है दाम लगा
हर एक विरह ने रो-रोकर, हर एक मिलन का मोल दिया!
सुख ने दरवाज़ा बन्द किया, दुख ने दरवाज़ा खोल दिया ।

जब खाली थे यह हाथ,
हाथ था इनमें हर कठिनाई का,
जब सादा था यह वस्त्र
ज्ञान था मुझे न छूत-छुआई का,
लेकिन जब से यह पीताम्बर
मैंने ओढ़ा रेशम वाला
डर लगता है मुझको अंचल
छूने में धूप-जुन्हाई का

बस वस्त्र बदलते ही मैंने यह कैसा परिवर्तन देखा
जिस रस को दुख ने अमृत किया, उसमें सुखने विष घोल दिया!
सुख ने दरवाज़ा बन्द किया, दुख ने दरवाज़ा खोल दिया ।

चाँदनी टूट जब बनी ओस
ले गई उसे चुन धूप कहीं,
संध्या ने दिये जलाए तो
तम भी रह सका कुरूप नहीं
फूलों की धूल मले शरीर
जब पतझर बगिया से निकला
तब मिला द्वार पर खड़ा हुआ
उसको रितुराज-अनूप वहीं,

हर एक नाश के मरघट में निर्माण जलाये है दीपक
जब-जब आँगन खामोश हुआ, तब-तब उठ बचपन बोल दिया !
सुख ने दरवाज़ा बन्द किया, दुख ने दरवाज़ा खोल दिया ।


मधु पीते-पीते थके नयन, फ़िर भी प्यासे अरमान !

मधु पीते-पीते थके नयन, फिर भी प्यासे अरमान !
जीवन में मधु, मधु में गायन, गायन में स्वर, स्वर में कंपन
कंपन में साँस, साँस में रस, रस में है विष, विष मध्य जलन
जलन में आग, आग में ताप, ताप में प्यार, प्यार में पीर
पीर में प्राण, प्राण में प्यास, प्यास में त्रृप्ति, तृप्ति का नीर
और यह तृप्ति, तृप्ति ही क्षणिक, विश्व की मीठी मधुर थकान!
फिर भी प्यासे अरमान!!

जीवन पाया, पर जीवन में क्या दो क्षण सुख के बीत सके?
मन छलने वाले मिले बहुत, पर क्या मिल मन के मीत सके?
यह रेगिस्तानी प्यास मिली, मधु पाकर और मचलती है,
यह ठन्डी मीठी आग मिली, जो जीवन पीकर जलती है
सब कुछ मिल गया, मगर न मिले प्याले में डूबे प्राण!
फिर भी प्यासे अरमान!!

मणि-खचित-दया के प्याले में, मैंने न कभी पीना सीखा
जग के चरणों में नत-मस्तक होकर न कभी जीना सीखा
कितनी कोमल निर्ममता से पर तुम सपनों के चित्रकार!
क्षण भर में छल कर गये प्राण, मानव की करके मधुर हार
आँसू बन आए, चले गए, इतने पर भी एहसान!
फिर भी प्यासे अरमान!!

▪️गोपालदास नीरज