बिछड़ा है जो इक बार: परवीन शाकिर

परवीन शाकिर

















बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा 

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा 
इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा 

इक बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश 
फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा 

यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं 
जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा 

काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन 
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा 

किस तरह मिरी रूह हरी कर गया आख़िर 
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा 



कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी 

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी 
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी 

बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की 
चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी 

सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता 
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी 

दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लें 
शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी 

उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था 
अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी 

मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर 
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी 

उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं 
उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी 

गाह क़रीब-ए-शाह-रग गाह बईद-ए-वहम-ओ-ख़्वाब 
उस की रफ़ाक़तों में रात हिज्र भी था विसाल भी 

उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे 
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी 

शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता 
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी 


सैयदा परवीन शाकिर (नवंबर 1952-26 दिसंबर 1994) एक उर्दू कवयित्री, शिक्षक और पाकिस्तान की सरकार की सिविल सेवा में एक अधिकारी थीं। इनकी प्रमुख कृतियाँ खुली आँखों में सपना, ख़ुशबू, सदबर्ग, इन्कार, रहमतों की बारिश, ख़ुद-कलामी, इंकार(१९९०), माह-ए-तमाम (१९९४) आदि हैं।