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| छवि श्रेय: गूगल |
मणिकर्णिका का डोम
डोम मणिकर्णिका से अक्सर कहता है,
दु:खी मत होओ
मणिकर्णिका
दु:ख तुम्हें शोभा नहीं देता
ऐसे भी श्मशान हैं
जहाँ एक भी शव नहीं आता
आता भी है,
तो गंगा में
नहलाया नहीं जाता
डोम इसके सिवा कह भी
क्या सकता है
एक अकेला
डोम ही तो है
मणिकर्णिका में अकेले
रह सकता है
दु:खी मत होओ, मणिकर्णिका,
दु:ख मणिकर्णिका के
विधान में नहीं
दु:ख उनके माथे है
जो पहुँचाने आते हैं
दु:ख उसके माथे था
जिसे वे छोड़ चले जाते हैं
भाग्यशाली हैं, वे
जो लदकर या लादकर
काशी आते हैं
दु:ख
मणिकर्णिका को सौंप जाते हैं
दु:खी मत होओ
मणिकर्णिका,
दु:ख हमें शोभा नहीं देता
ऐसे भी डोम हैं
शव की बाट जोहते
पथरा जाती हैं जिनकी आँखें,
शव नहीं आता—
इसके सिवा डोम कह भी क्या सकता है!
एक और ढंग
भागकर अकेलेपन से अपने
तुममें मैं गया।
सुविधा के कई वर्ष
तुममें व्यतीत किए।
कैसे?
कुछ स्मरण नहीं।
मैं और तुम! अपनी दिनचर्या के
पृष्ठ पर
अंकित थे
एक संयुक्ताक्षर!
क्या कहूँ! लिपि की नियति
केवल निधि की नियति
थी—
तुममें से होकर भी,
बसकर भी,
संग-संग रहकर भी
बिल्कुल असंग हूँ।
सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है।
—लेकिन! क्यों लगता है मुझे
प्रेम
अकेले होने का ही
एक और ढंग है।
▪️श्रीकांत वर्मा

