कितना बहुत है

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कितना बहुत है

कितना बहुत है 
परंतु अतिरिक्त एक भी नहीं 
एक पेड़ में कितनी सारी पत्तियाँ 
अतिरिक्त एक पत्ती नहीं 
एक कोंपल नहीं अतिरिक्त 
एक नक्षत्र अगगिन होने के बाद। 
अतिरिक्त नहीं है गंगा अकेली एक होने के बाद— 
न उसका एक कलश गंगाजल, 
बाढ़ से भरी एक ब्रह्मपुत्र 
न उसका एक अंजुलि जल 
और इतना सारा एक आकाश 
न उसकी एक छोटी अंतहीन झलक। 
कितनी कमी है 
तुम ही नहीं हो केवल बंधु 
सब ही 
परंतु अतिरिक्त एक बंधु नहीं। 


दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है 

दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है 
कहकर मैं अपने घर से चला। 
यहाँ पहुँचते तक 
लेकिन जगह-जगह मैंने यही कहा 
और यहाँ कहता हूँ 
कि दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है। 
जहाँ पहुँचता हूँ 
वहाँ से चला जाता हूँ। 

दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है— 
बार-बार यही कह रहा हूँ 
और कितना समय बीत गया है 
लौटकर मैं घर नहीं 
घर-घर पहुँचना चाहता हूँ 
और चला जाता हूँ। 


विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार हैं। 1 जनवरी 1937 को भारत के एक राज्य छत्तीसगढ़ के राजनंद गांव में जन्मे शुक्ल ने प्राध्यापन को रोज़गार के रूप में चुनकर पूरा ध्यान साहित्य सृजन में लगाया। उनकी एकदम भिन्न साहित्यिक शैली ने परिपाटी को तोड़ते हुए ताज़ा झोकें की तरह पाठकों को प्रभावित किया, जिसको 'जादुई-यथार्थ' के आसपास की शैली के रूप में महसूस किया जा सकता है। उनका पहला कविता संग्रह 1971 में 'लगभग जय हिन्द' नाम से प्रकाशित हुआ। 1979 में 'नौकर की कमीज़' नाम से उनका उपन्यास आया जिस पर फ़िल्मकार मणिकौल ने इसी से नाम से फिल्म भी बनाई।