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| छवि श्रेय: गूगल |
बापू के प्रति
तुम नवजीवन के नव विधान।
युग युग बंधन के मुक्ति गान।
तुम आशा के स्वर्णिम प्रकाश,
मानव मन के मधुमय विकाश।
तुम नवयुग के नूतन विहान,
तुम नवचेतन के नव विधान।
तुम हो अतीत के अमर गीत
भावी की मधु-छाया पुनीत,
तुम वर्तमान के कर्मगान।
तुम नवजीवन के नव विधान।
दुर्बल दलितों के क्रान्ति घोष,
तुम पददलितों के शक्तिकोश।
मृत जीवन के तुम जन्मप्राण !
तुम नव संस्कृति के नव विधान !
तुम करुणा के पावन प्रवाह
तुम अमर सत्य के गंधवाह
समता ममता के नववितान
तुम नव संस्कृति के नव विधान
माहुति के अनुप्रयोग
नूतन दधीचि के नवल योग
वलिदान-गीत, बलिदान -गान
तुम नव सस्कृति के नव विधान |
रेखाचित्र
उन्नत ललाट पर चिंता की
कतिपय रेखायें लिए हुए,
विस्तृत भौंहें, विशाल नेत्रों में
ममता को मधु पिए हुए,
नासा सुदीर्घ, श्रुतिपुट सुदीर्घ,
सौमाग्य बुद्धि सकेत बने,
नित नमित देखते धरणी को
करुणामय विनय-निकेत बने ।
प्राजानुबाहु फैली दोनो
वक्षस्थल सघन रोम वेष्ठित
कटि-तट पर खादी की कछनी
अपनी कगाली की प्रतिनिधि
शिर पर छोटी सी चोटी के
अनियंत्रित केश छहरते से,
दृढ अंग और प्रत्यंग खुले
मलयज के सग लहरते से ।
अनमोल सृष्टि की रचना यह
दो अक्षर में हो गई बद्ध
'बापू' के लघु सबोधन में
सारा रहस्य युग का निबद्ध !
सोहन लाल द्विवेदी (22 फरवरी 1906 - 1 मार्च 1988) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे। ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के इस रचयिता को राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया गया। महात्मा गांधी के दर्शन से प्रभावित, द्विवेदी जी ने बालोपयोगी रचनाएँ भी लिखीं। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था।

