तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

छवि श्रेय: गूगल











तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो 

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो 
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो 

आँखों में नमी हँसी लबों पर 
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो 

बन जाएँगे ज़हर पीते पीते 
ये अश्क जो पीते जा रहे हो 

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है 
तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो 

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर 
रेखाओं से मात खा रहे हो 


झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं 

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं 

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता 
मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं 

वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है 
उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं 

तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को 
तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं 


क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं 

क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं 
इस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईं 

दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार 
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं 

अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ 
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं 

पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझे 
ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईं 

पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी हो रहे 
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं 


हाथ आ कर लगा गया कोई 

हाथ आ कर लगा गया कोई 
मेरा छप्पर उठा गया कोई 

लग गया इक मशीन में मैं भी 
शहर में ले के आ गया कोई 

मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी 
इश्तिहार इक लगा गया कोई 

ये सदी धूप को तरसती है 
जैसे सूरज को खा गया कोई 

ऐसी महँगाई है कि चेहरा भी 
बेच के अपना खा गया कोई 

अब वो अरमान हैं न वो सपने 
सब कबूतर उड़ा गया कोई 

वो गए जब से ऐसा लगता है 
छोटा मोटा ख़ुदा गया कोई 

मेरा बचपन भी साथ ले आया 
गाँव से जब भी आ गया कोई 


कैफ़ी आज़मी, तरक्कीपसंद तहरीक के अगुआ और उर्दू अदब के अज़ीम शायर थे। कैफ़ी आज़मी का जन्म उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के छोटे से गाँव मिजवाँ में 14 जनवरी, 1919 को एक ज़मींदार परिवार में हुआ। बचपन में ही वह शायरी करने लगे थे।