सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा

छवि श्रेय: गूगल









सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा 

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा 
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा 

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है 
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा 

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया 
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा 

मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो 
ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा 

सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ 
मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा 


होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते 

होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते 
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते 

पलकें भी चमक उठती हैं सोने में हमारी 
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते 

दिल उजड़ी हुई एक सराए की तरह है 
अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते 

यारो नए मौसम ने ये एहसान किए हैं 
अब याद मुझे दर्द पुराने नहीं आते 

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में 
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते 


भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा 

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा 
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा 

फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम 
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा 

आँसू को कभी ओस का क़तरा न समझना 
ऐसा तुम्हें चाहत का समुंदर न मिलेगा 

इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें 
जब नींद बहुत आएगी बिस्तर न मिलेगा 

ये सोच लो अब आख़िरी साया है मोहब्बत 
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा 



डॉ॰ बशीर बद्र (जन्म १५ फ़रवरी १९३६) को उर्दू का वह शायर माना जाता है जिसने कामयाबी की बुलन्दियों को फतेह कर बहुत लम्बी दूरी तक लोगों की दिलों की धड़कनों को अपनी शायरी में उतारा है। साहित्य और नाटक आकेदमी में किए गये योगदानो के लिए उन्हें १९९९ में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।