अंतिम ऊँचाई

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अंतिम ऊंचाई

कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब 
अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, 
हमारे चारों ओर नहीं। 
कितना आसान होता चलते चले जाना 
यदि केवल हम चलते होते 
बाक़ी सब रुका होता। 

मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को 
दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में 
अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है। 

शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं 
कि सब कुछ शुरू से शुरू हो, 
लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं। 
हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती 
कि वह सब कैसे समाप्त होता है 
जो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था 
हमारे चाहने पर। 

दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए 
जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे— 
जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब 
तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में 
जिन्हें तुमने जीता है— 
जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे 
और काँपोगे नहीं— 
तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क़ नहीं 
सब कुछ जीत लेने में 
और अंत तक हिम्मत न हारने में। 


फौजी तैयारी

हज़ारों साल से उसी एक पिटते हुए आदमी को 
उसी एक पिटे हुए सवाल की तरह 
उसी से पूछा जा रहा है 
“तुम कौन हो? 
कहाँ रहते हो? 
तुम्हारा नाम क्या है?'' 
किसी आठ अचल कोनों वाली कोठरी में 
गश्त लगाकर क़ैदी 
एक साथ तीन पहरेदारों को क़ैद किए हैं। 

बाहर 
चुंबक की अदृश्य रेखाओं की तरह फैला है 
सींकचों का पकड़िया जंगल। 

और यह एक ज़बरदस्त फ़ौजी इंतज़ाम की 
क़ामयाबी का पक्का सबूत है 
कि बंदूक हाथ में लेते ही 
हमें चारों तरफ़ दुश्मनों के सिर 
अपने आप नज़र आने लगते। 



कुँवर नारायण (१९ सितम्बर 1927-15 नवम्बर २०१७) एक हिन्दी साहित्यकार थे।नई कविता आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (१९५९) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। 2009 में उन्हें वर्ष 2005 के लिए भारत के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।