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| छवि श्रेय: गूगल |
कविता की मौत
लाद कर ये आज किसका शव चले
और उस छतनार बरगद के तले
किस अभागिन का जनाज़ा है रुका
बैठ इसके पाँयते गर्दन झुका
कौन कहता है कि कविता मर गई?
मर गई कविता नहीं तुमने सुना?
हाँ वही कविता, कि जिसकी आग से
सूरज बना
धरती जमी
बरसात लहराई
और जिसकी गोद में बेहोश पुरवाई
पँखुरियों पर जमी,
वही कविता,
विष्णुपद से जो निकल
और ब्रह्मा के कमंडल से उबल
बादलों की तहों को झकझोरती
चाँदनी के रजतफूल बटोरती
शंभु के कैलाश पर्वत को हिला
उतर आई आदमी की ज़मीं पर
चल पड़ी फिर मुस्कुराती
शस्य श्यामल फूल-फल फ़सलें खिलाती
स्वर्ग से पाताल तक जो एक धारा बन बही
पर न आख़िर एक दिन वह भी रही
मर गई कविता वहीं
एक तुलसी पत्र औ’ दो बूँद गंगा-जल बिना
मर गई कविता नहीं तुमने सुना?
भूख ने उसकी जवानी तोड़ दी
उस अभागिन की अछूती माँग का सिंदूर
मर गया बन कर तपेदिक का मरीज़
और सितारों से कहीं मासूम संतानें
माँगने को भीख हैं मजबूर!
या पटरियों के किनारे से उठा
बेचती हैं अधजले
कोयले।
याद आती है मुझे
भागवत की वह बड़ी मशहूर बात
जब कि ब्रज की एक गोपी
बेचने को दही निकली
औ' कन्हैया की रसीली याद में
बिसर कर सब सुध
बन गई थी ख़ुद दही;
और ये मासूम-बच्चे भी
बेचने को कोयला निकले
बन गए ख़ुद कोयले!
श्याम की माया!
और अब वे कोयले भी हैं अनाथ
क्योंकि उनका भी सहारा चल बसा
भूख ने उसकी जवानी तोड़ दी
यों बड़ी ही नेक थी कविता
मगर धनहीन थी, कमज़ोर थी;
और बेचारी ग़रीबन मर गई।
मर गई कविता
जवानी मर गई
मर गया सूरज सितारे मर गए
मर गए सौंदर्य सारे मर गए
सृष्टि के आरंभ से चलती हुई
प्यार की हर साँस पर पलती हुई
आदमीयत की कहानी मर गई।
झूठ है यह
आदमी इतना नहीं कमज़ोर है
पलक के जल और माथे के पसीने से
सींचता आया सदा जो स्वर्ग की भी नींव
ये परिस्थितियाँ बना देंगी उसे निर्जीव?
झूठ है यह
फिर उठेगा आदमी
और सूरज की मिलेगी रोशनी
सितारों की जगमगाहट मिलेगी!
कफ़न में लिपटे हुए सौंदर्य को
फिर किरन की नरम आहट मिलेगी!
फिर उठेगा वह,
और बिखरे हुए सारे स्वर समेट
पोंछ उनसे ख़ून,
फिर बुनेगा नई कविता का वितान
नए मनु के नए युग का जगमगाता गान!
भूख, ख़ूँरेज़ी, ग़रीबी हो मगर
आदमी के सृजन की ताक़त
इन सबों की शक्ति के ऊपर
और कविता सृजन कीआवाज़ है
फिर उभरकर कहेगी कविता
क्या हुआ दुनिया अगर मरघट बनी,
अभी मेरी आख़िरी आवाज़ बाक़ी है,
हो चुकी हैवानियत की इंतेहा,
आदमीयत का अभी आग़ाज़ बाक़ी है !
लो तुम्हें मैं फिर नया विश्वास देती हूँ,
नया इतिहास देती हूँ!''
कौन कहता है कि कविता मर गई?
तुम्हारे पाँव मेरी गोद में
ये शरद के चाँद से उजले धुले-से पाँव,
मेरी गोद में!
ये लहर पर नाचते ताज़े कमल की छाँव,
मेरी गोद में!
दो बड़े मासूम बादल, देवताओं से लगाते दाँव,
मेरी गोद में!
रसमसाती धूप का ढलता पहर,
ये हवाएँ शाम की
झुक झूम कर बिखरा गईं
रोशनी के फूल हरसिंगार से
प्यार घायल साँप-सा लेता लहर,
अर्चना की धूप-सी
तुम गोद में लहरा गईं,
ज्यों झरे केसर
तितलियों के परों की मार से,
सोन-जूही की पंखुरियों पर पले ये दो मदन के बान
मेरी गोद में!
हो गए बेहोश दो नाज़ुक मृदुल तूफ़ान
मेरी गोद में!
ज्यों प्रणय की लोरियों की बाँह में
झिलमिला कर,
औ जला कर तन, शमाएँ दो
अब शलभ की गोद में आराम से सोई हुई,
या फ़रिश्तों के परों की छाँह में
दुबकी हुई, सहमी हुई
हों पूर्णिमाएँ दो
देवता के अश्रु से धोई हुईं
चुंबनों की पाँखुरी के दो जवान गुलाब
मेरी गोद में!
सात रंगों की महावर से रचे महताब
मेरी गोद में!
ये बड़े सुकुमार,
इनसे प्यार क्या?
ये महज़ आराधना के वास्ते
जिस तरह भटकी सुबह को रास्ते
हरदम बताए शुक्र के नभ फूल ने
ये चरण मुझको न दें
अपनी दिशाएँ भूलने।
ये खँडहरों में सिसकते, स्वर्ग के दो गान
मेरी गोद में!
रश्मि-पंखों पर अभी उतरे हुए वरदान
मेरी गोद में!
धर्मवीर भारती (२५ दिसंबर, १९२६- ४ सितंबर, १९९७) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। वे एक समय की प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रधान संपादक भी थे।

