![]() |
| छवि श्रेय: विजय बागची |
साझी संस्कृति और विरासत
संस्कृति का विषय तो अपरिमित है। एक व्यक्ति के लिए तो यह सम्भव ही नहीं कि अपने सारे जीवन का प्रयत्न करके भी वह उसके संबंध में कुछ सम्पूर्ण लिख सके। फिर भी जब कभी सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विचारधाराओं, परम्पराओं और विरासतों की बात उठती है तो सर्वप्रथम भारत अपनी अद्भुत व अतुलनीय छवि प्रस्तुत करता है। भारतवर्ष समस्त ज्ञान, धर्म, कर्म परंपराओं, सृजन क्षमता के पुनर्जीवन, पोषण और प्रचार का एक माध्यम है, एक मूल है। यह अनेक विचारों, कौशलों और चिंतन परंपराओं को समाहित करता है। सच कहूँ तो हमारी संस्कृति और विरासत का सीधा संबंध हमारे जीवन से होता है। एक जीवन, एक समाज का उत्तम पालन पोषण किस प्रकार हो, इसके लिए संस्कृतियों का निर्माण हुआ है और यही संस्कृतियाँ नित्य निरंतर नई-नई विरासतों और परंपराओं को जन्म देती रही हैं।
मनुष्य भिन्न-भिन्न स्थानों पर रहते हुए, विशेष प्रकार के सामाजिक वातावरण, धर्म, दर्शन, लिपि, भाषाओं, प्रथाओं, व्यवस्थाओं और कलाओं का विकास करते हुए, एक विशिष्ट संस्कृति निर्मित करता है। भारतीय संस्कृति की रचना भी इसी प्रकार हुई है।
संस्कृति और विरासत का अर्थ
संस्कृति और विरासत मात्र दो शब्द नहीं, स्वयं में सब कुछ समाहित करती हुई आदि से अनन्त का विस्तार हैं। यही किसी भी देश की अमूल्य संपत्ति और संसाधन हैं जिससे उनकी प्रतिष्ठा और पहचान बनती है। संस्कृति का अर्थ अविचल हुए बिना ज्ञान व विवेक का मार्ग ढूढ़ते, प्रसस्त करते, आगे बढ़े जाना है। यह किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों का समग्र रूप है, जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने आदि के रूप में परिलक्षित होता है। संस्कृति का वर्तमान स्वरूप किसी समाज द्वारा दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम है। वहीं विरासत का अर्थ अतीत का एक अनुभव है, एक उत्तराधिकारिता है, एक विरसा है। यह अतीत का वो हिस्सा है जो हमारे साथ हमारे लिए आज भी विद्यमान है। संस्कृति और विरासत स्वयं में प्रेम, वैराग्य, धर्म, कर्म, ध्येय, अहिंसा, त्याग, संयम, ज्ञान, विवेक, कला, शिल्प, भाषा, रीति-रिवाज, आहार, वेशभूषा आदि चीजें समाहित किए हुए है।
संस्कृति विकास की एक सतत प्रक्रिया है और जो कुछ भी मानव को पीढ़ी-दर-पीढ़ी समय के साथ -साथ अपने पूर्वजों से मिलता आ रहा है वही सांस्कृतिक विरासत होती है। संस्कृति और सभ्यता लगभग समान पर्याय में प्रयुक्त होते हैं परन्तु विशिष्ट भिन्नता रखते हैं। संस्कृति का सीधा संबंध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से है, उसके निवास और मानस से है। जबकि सभ्यता का सम्बंध व्यक्ति और समाज के बाह्य स्वरूप से है और विरासत इन्हीं दोनों के मध्य विद्यमान साक्षी है।
ये विरासत कई स्तरों में बनते आए हैं। क्षेत्रीय स्तर पर जिस संस्कृति को अपनाया गया हो, उसे क्षेत्रीय संस्कृति कहते हैं। एक राष्ट्र भी संस्कृति को विरासत के रुप में इसी प्रकार स्वीकार करता है, जिसे राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत कहते हैं। ये सभी संस्कृतियाँ हमारे अतीत की मूल हैं, जो पूजी जाती हैं, संरक्षित की जाती हैं और नित्य निरंतर संवर्द्धित भी की जाती हैं। ताकि आने वाली पीढ़ी इस पर गर्व करे, इसके महत्व को समझे और सीखे।
संस्कृति का सीधा संबंध हमारे मन और हृदय की पवित्रता से है। इसमें कला, विज्ञान, संगीत, नृत्य और मानव जीवन की उच्चतर गतिविधियाँ सम्मिलित हैं। यह मानव के अंतर्मन का उच्चतम स्तर है। जो भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों स्तर पर कार्य करता है।
साझे का आशय
जातिगत भिन्नताओं, धर्मों और भाषाओं का सीधा संबंध किस प्रकार हो, साझी संस्कृति और विरासत सदैव इसके लिए अग्रसर रही हैं। साझी संस्कृति विचारों के एक मत से शुरू होती है। साझे का आशय एक विशेष संस्कृति से है जो मिलती जुलती है, इसे न पूर्ण रुप से साझी कह सकते हैं न ही भिन्न। क्योंकि साझी संस्कृति उन्नति का ध्येय होती है, जो नागरिक कल्याण और सामाजिक उत्थान से जुड़ी है। हर संस्कृति में कुछ न कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो मिलते-जुलते हैं और जो थोड़ी भिन्नता उनमें विद्यमान होती हैं वही उन्हें अलग बनाती हैं। बस इसी प्रकार हमें प्रांतीय और राष्ट्रीय सांस्कृतिक भिन्नता देखने को मिलती है।
साझी संस्कृति
भारतीय संस्कृति ऐसी ही अनेकानेक संस्कृतियों का सम्मिश्रण है जिसमें ज्ञान, रीति-रिवाज, परंपरा, नैतिकता, कानून, जीवनशैली, सांस्कृतिक उत्पादों आदि क्षमताओं और योग्यताओं की बहुलता है। ये सभी आहार, वेशभूषा, रीति-रिवाज, कला, साहित्य, संगीत नृत्य आदि स्वयं में समेटे हैं। इस देश में उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक ऐसी अनेक समानताएँ देखने को मिलती हैं। जिनसे विविधता में एकता परिलक्षित होती है। उदाहरणार्थ होली, लोहड़ी, दीपावली, रक्षाबंधन, दशहरा, ईद-उल-फितर, ईद-उल-जुहा, शब-ए-बारात जैसे त्यौहार, पूरे देश में एक साथ और लगभग एक तरह से मनाए जाते हैं। स्थानीय रीति-रिवाज और आदिवासी समाजों को छोड़कर पूरे देश में विवाह संस्कार भी लगभग समान होता है। लोग समान रूप से आस्थावान भी होते हैं।
यदि संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने वाला एक विस्तृत लोक व्यवहार है तो साझी संस्कृति उसे कहा जा सकता है, जिसे बनाने में सभी का बराबर का योगदान हो, जिसमें अवसरों की समानता हो, समन्वयता हो। हिन्दू धर्म में करीब ३००० जाति समूह हैं, इस्लाम में ५००, सिक्ख मत में १५० और इसाई धर्म में में भी करीब १५० हैं, इस नज़रिए से देखा जाए तो कहा जा सकता है कि जाति सिर्फ एक हिन्दू ही नहीं बल्कि एक भारतीय संस्थान है। परन्तु भारतीय संस्कृति, भारतीय समाज जाति और धर्म के नाम पर अनेक छोटे–छोटे समूहों में बँटा है। उनके बीच ऊँच-नीच की चौड़ी खाई है। वैवाहिक संबंध, खान-पान और रहन-सहन को लेकर भांति-भांति के प्रतिबंध और नियम हैं। जिन्हें वह अतीत की धरोहर के रूप में सौंपता है। धर्म पर संप्रदायवाद का विशेष भार है। प्रत्येक मतावलम्बी अपने पंथ को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है। जबकि तत्सम्बन्धी उसका ज्ञान रूढ़ियों, आडंबरों और जड़-विश्वासों का घालमेल होता है। कुल मिलाकर जिसे हम सांझा संस्कृति कहते हैं, उसमें कहीं न कहीं अपने-अपने विश्वासों, रीति-रिवाजों, धार्मिक-सामाजिक आडंबरों यहाँ तक कि रूढ़ियों और पाखंडों के साथ जीने की बाध्यता बनी है। यदि कोई उससे अलग चलना चाहे, तो संस्कृति उसे इजाजत नहीं देती। उल्टे तरह-तरह की बाधाएँ उत्पन्न कर, जीवन को दुष्कर बना देती है।
परन्तु साझी संस्कृति में अब समन्वयता और समानता पर विशेष बल दिया जा रहा है। उसके लिए अनेक कार्यक्रमों और संस्थानों का निर्माण किया गया है। जिसके उत्तम परिणाम हमें प्राप्त हो रहे हैं, सभी धीमें ही सही पर अग्रसर हैं। भाषा, बोली, त्यौहार, खान-पान या वेषभूषा में फर्क होने के बावजूद भी एक-दूसरे के साथ विभिन्न पर्वों में हम सम्मिलित हुआ करते हैं और यही हमारी साझी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। भाषा, धर्म, संस्कृति, भूगोल, इतिहास, जैव विविधता, रीति-रीवाज, खानपान आदि की विविधता ही भारत की विशिष्ट पहचान है। यही बहुलता भारत की सामाजिक एकता और विरासत की जनक भी है। लोक-कलाएँ, कथाएँ, हस्तकारी, लोक-संगीत, पर्व-त्यौहार, मेले और भी ना जाने क्या-क्या इस सूची में शामिल हो सकती हैं। हालांकि वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं परन्तु वे विलुप्त नहीं हुई हैं। साझाकरण होने पर एक प्रोत्साहन अवश्य मिलता है और उनकी उन्नति भी होती है। कुछ लोग संस्कृति को हिन्दू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति, ईसाई संस्कृति और अन्य कई संस्कृतियों से संबोधित करते हैं। जब तक हम भारतीय संस्कृति से सम्बोधित करना प्रारंभ नहीं करते साझी संस्कृति को प्राप्त कर पाना असम्भव है।
वेशभूषा के संबंध में
जैसा कि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखा है :
‘‘चीरा और पाग मुसलमानों ने हिन्दुस्तानियों से लिया और बदले में, कसे-चुस्त पायजामे राजपूतानियों ने मुस्लिम-नारियों से लिये। इस्लाम की परम्परा रेशम, मलमल और कीमती जेवरों के विरूद्ध थी, लेकिन, भारत में बस जाने पर मुसलमानों ने इन्हें भी अपना लिया। ऊंचे तबकों के हिन्दुओं ने मुसलमानी खान-पान और पोशाकें, खुशी-खुशी, अपना लीं। बाकी तबकों में भी, हिन्दुओं की पगड़ी मुसलमानों ने और मुसलमानों की अचकन हिन्दुओं ने अपनायी।’’
भाषा और संगीत के संबंध में
अमीरखुसरो साहित्यकार और संगीतज्ञ होने के साथ-साथ भाषाओं के सजग साधक थे। मनोरंजन और रसिकता के अवतार अमीरखुसरो हिन्दी साहित्य के इतिहास की निरुपमेय निधि हैं। जनजीवन के साथ घुल-मिलकर काव्य रचना करने वाले कवियों में अमीरखुसरो का विशिष्ट स्थान है। उर्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तानी अथवा खड़ीबोली का प्रथम रूप अमीरखुसरो की ही हिन्दी कविता में अभिदर्शित है। अमीरखुसरो ने अपनी मातृभाषा को ‘हिन्दवी’ कहा है। आधुनिक भारतीय भाषाओं के प्रथम उल्लेखकर्त्ता अमीरखुसरो ने अपने ग्रन्थ ‘नुह सिपहर’ में अपने समय की हिन्दुस्तानी भाषाओं की सूची इस प्रकार दी है- सिन्धी, लाहौरी, कश्मीरी, कन्नड़, धुरसमुद्री, तेलुगू , गुजराती, मावरी, पहाड़ी, बंगाली, अवधी, दिल्ली। अमीरखुसरो ने हिन्दुस्तान की उक्त बारह भाषाओं का उल्लेख करते हुए इन सबको ‘हिन्दवी’ वही खड़ीबोली कहा है। जो उस समय विशेषतः दिल्ली के मुसलमान तथा सामान्यतः दिल्ली वाले बोलते थे। इसी को आज ‘उर्दू-हिन्दी-हिन्दुस्तानी’ कहा जाता है।
साझी विरासत
भारतीय संस्कृति की साझा विरासत हमारे इतिहास और हमारी परम्पराओं की एक अनूठी उपलब्धि है। हमें यह विरासत समय की एक लंबी प्रक्रिया के पश्चात प्राप्त हुई है। इस विरासत को निर्मित करने में समकालीन शासकों और आम लोगों का विशेष योगदान रहा है। भारत की बहुरंगी विरासत और बहुलता को भारत की साम्राज्यवादी विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन से बहुत ताकत मिली। इसी बहुरंगी परंपरा से धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद का जन्म हुआ है। किसी भी देश को उपलब्धि या तो वहाँ रहने वाले लोगों के नाम से या फिर वहाँ की संस्कृति या भौतिक आयामों से प्राप्त होती है।
इतिहास के अलग-अलग चरणों में हमारे देश को मिली अलग-अलग विरासतें इस देश के इतिहास की बहुलता और विविधता की दर्पण हैं। इन विरासतों से अलग-अलग कालखण्ड में निर्मित शैलियों ( द्रविड़, पैगोड़ा, नागर, गांधार, संधार), विभिन्न शासकों (आर्य, बौद्ध, मुगल, मराठा, राजपूत, अंग्रेज) और समुदायों (भारतीय समुदाय) के नाना प्रयासों और देश को पहचानने के अलग-अलग मानदंडों आदि का पता चलता है। कुल मिलाकर यह सभी एक ही इकाई का प्रतिनिधित्व करते हैं जो धर्मनिरपेक्षता का भाव रखते हैं।
भारत में यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त कुल ३८ मूर्त विरासत धरोहर स्थल (३० सांस्कृतिक, ७ प्राकृतिक और १ मिश्रित) हैं और १३ अमूर्त सांस्कृतिक विरासतें हैं। इन सभी विरासतों का निर्माण किसी विशेष परिस्थितियों में ही हुआ। सभी अपने-अपने साथ कुछ संदेश और विचार रखे हुए हैं। हमें उन संदेशों और विचारों से अवगत होना होगा। विरासतों का निर्माण भी इसीलिए होता है ताकि लोग धार्मिक और जातिगत रूढिवादिताओं को भूल एक जगह एकत्र हो सकें। उनके विचारों का आदान-प्रदान हो सके, ताकि समत्व और समभाव का निर्माण हो।
आज सभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावाद के विश्वासी ताकतों की ज़िम्मेदारी है कि वे साझी विरासत के पक्ष में न सिर्फ खड़े हों बल्कि उसे सुरक्षित और संवर्धित करने में अपना सम्पूर्ण योगदान दें। एक मात्र हमारी साझी विरासत (संस्कृति) ही हमारी अक्षुण्ण एकता का प्रतीक है। ये सारी विरासतें समत्व की साक्षी हैं। हमें इनके उत्थान के लिए एक जुट होने की आवश्यकता है। जिससे इनका विस्तार हो और पूरी दुनिया इससे संदेश ले सके एकता, भाईचारे, शक्ति सद्भावना और प्रेम का, समभाव का।
इसलिए कबीर साहब ने भी अपने दोहों में ढाई आख़र प्रेम का वर्णन इतने गहरे अर्थों में किया है:
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आख़र प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
यही ढाई आख़र ही हमारी साझी विरासत और संस्कृति का मूल हैं, हमारी एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता की जननी भी।
अंत में स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों में
''यदि कोई अपने ही धर्म तथा संस्कृति का विशेष रूप से विद्यमानता का स्वप्न देखता है, तो मुझे उस व्यक्ति के प्रति दिल से सहानुभूति है और यह कहना चाहता हूँ कि बहुत जल्द प्रत्येक धर्म एवं संस्कृति के बैनर पर बिना संकोच’’ सहायता करो, संघर्ष नहीं, समावेशन करो विध्वंस नहीं; मेल-मिलाप तथा शांति रखो मतभेद नहीं’’ ही लिखा जाएगा।''
अद्भुत अतुल्य संस्कृति जिसकी, विरासतें अतिरेक।
रंग-बिरंगे पहनावे औ, भाषा विविध अनेक।।
भाँति-भाँति के ग्रंथ जहाँ पर, भाँति-भाँति के लोग।
धर्म कर्म से परिपोषित वह, भारत का भूलोक।।
:विजय बागची
विजय बागची एक विद्यार्थी एवं युवा रचनाकार हैं। अध्ययन के साथ लेखन में भी विशेष रुचि रखते हैं। पठन कार्य में स्नातक पूर्ण हो चुका है, शिक्षा-स्नातक अभी प्रगति पर है, तदुपरान्त स्नातकोत्तर को इच्छुक हैं।
विभिन्न संकलनों, साहित्यिक पेजों और वेबसाइटों में रचनाएँ प्रकाशित।
संपर्क: काजीपुर, मगहर, संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश-२७२१७३
ईमेल: imsadhak.in@gmail.com

