कवि: ली मिन-युंग
अनुवादक: देवेश पथ सारिया
प्रकाशक: कलमकार मंच
मूल्य: 150 रुपये
हकीकत के बीच दरार देश प्रेम, निर्वासन का दर्द, स्त्री मुक्ति, और प्रतिरोध की वैश्विक संवेदनाओं का दास्तावेज हैं ली मिन-युंग की कविताएँ
"हकीकत के बीच दरार" कविता संग्रह ताइवान के प्रसिद्ध कवि ली मिन-युंग की कविताओं का युवा कवि देवेश पथ सारिया द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद है. इस संग्रह को पढ़ते हुए आप पाएंगे कि कवि ली मीन-युंग की कवितायें देश की सीमाओं की परिधि में समा जाने वाली कवितायें नहीं हैं. ली की कवितायें वैश्विक संवेदनाओं दास्तावेज हैं. आप पाएंगे कि ली ताइवान के जनमानस के कवि तो हैं ही, इसके साथ-साथ वह वैश्विक सरोकारों के कवि भी हैं.
संग्रह पढ़ते हुए आप पाएंगे कि अनुवादक देवेश ने इन कविताओं का मात्र अनुवाद ही नहीं किया है, बल्कि इन्हें जिया भी है. शायद यह देवेश की अनुवाद के प्रति संजीदगी ही है कि जिसके चलते अनुवाद पढ़ते हुए भी आप भाषा की मिठास कोमलता, सहजता, गहराई, मुखरता और प्रवाह को ठीक वैसा ही महसूस कर सकते हैं, जैसा किसी हिंदी कवि के संग्रह को पढ़ते हुए करेंगे.
हम शुक्रगुजार हैं देवेश के, कि जिन्होंने ताइवान के कवि ली मिन-युंग से, और उनकी कविताओं से न केवल हमें रूबरू करवाया बल्कि यह जानने का अवसर भी दिया कि देश,भाषा, नस्ल, मजहब की भिन्नता के बावजूद मानवीय संवेदनाओं में एक समानता होती है, और दुनिया के तमाम संवेदनशील कवियों के पास इन संवेदनाओं को एक महसूस करने की एक समान दृष्टि भी.
ली की कवितायें मानव के मनोभावों को गहरे से छूती हुई वैचारिक भूमि पर उगी, दुनियावी चिंताओं को समझती हुई, संवेदनाओं की, समानुभूतियों की और मुखर प्रतिरोध की कवितायें हैं.
सोचता हूं कि अगर अनुवाद न होते तो यह जानना कितना मुश्किल होता कि सात समंदर पार के लोग भी अभी इतिहास के पन्नों में अपने पुरखों के अवशेष खोज रहे हैं, कि वहां का कवि भी दर्ज कर रहा है संवेदनाएं निर्वासन के प्रति, कि वहां का कवि भी युद्ध के विरुद्ध है, कि वहां की ज़मीन भी महसूस कर रही है सत्तारूढ़ लोगों की ज्यादतियों का ताप, कि वहां का कवि राष्ट्र की सीमा से बाहर निकलकर महसूसता है दुनिया के तमाम उपेक्षित और दमित लोगों के प्रति एक बिरादराना संबंध की जरूरत.
संग्रह की पहली कविता आपको एहसास दिला देती है कि ली उन्माद के विरुद्ध, प्रेम की मशाल जलाने वाले, एक उम्मीद के कवि हैं. वह जो चित्र रचते हैं वह कमाल है.
युद्ध सुपुर्द है इतिहास कोविध्वंस याद कोबूंदाबांदी में घुल गए हैंप्राकृतिक आपदा से मिलेघाव और आंसू.
कवि की संवेदनाएं किसी देश की सीमाओं को नहीं मानती. वह आहत है दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली ज्यादतियों से. ली मिन-युंग ऐसे कवि हैं जो यह मानने में ज़रा भी गुरेज नहीं करते कि कवि के पास भाषा के अलावा कुछ नहीं होता.
इसलिए वह कुर्दिस्तान के लिए कुछ न कर पाने की टीस को महसूस करते हैं, और भाषा को ही मरहम कह देते हैं.
"मैंने भाषा को मरहम पट्टी का रूप दिया हैऔर हमारे बीच की दूरी मिटाकरउसे भेज रहा हूंतुम्हारे घावों पर आराम देने के लिए."
ली बार-बार निर्वासित लोगों की बात करते हैं. उनके दर्द को महसूस करते हैं. अपनी कविताओं में उनकी घर वापसी न कर पाने के दर्द को व्यक्त करते हैं. वह जानते हैं कि निर्वासितों के लिए उनकी मातृभूमि किसी भी चाहना से ऊपर है. जो घर वापसी नहीं कर पा रहे उनके मन की टीस को व्यक्त करते हुए ली लिख रहे हैं-
“मातृभूमि एक चेतना हैदुखती हुई”
इस संग्रह में देवेश ने जो कवितायेँ शामिल की हैं वह एक विस्तृत दायरा लिए हुए हैं.
एक तरफ इसमें कवि 'ली' की वे रचनायें शामिल हैं जो इस वक्त अन्धाधुनिकता के खतरों को भांप रही हैं, तो वे रचनायें भी शामिल हैं जिनमें कवि अपने देश की आत्मा को तलाश रहा है.
जनवादी इतिहास बोध वाली रचनायें इस कृति की वह रचनाएं हैं जो इतिहास में ऐतिहासिक नायकों की शौर्यगाथाओं को ख़ारिज खारिज करती हैं और आम जनमानस की बात करतीं हैं. वह लिखते हैं-
“यदि तुम पूछोक्या था ताईवान द्वीप का बीता हुआ कलमैं तुम्हें बताऊंगाताइवान की इतिहास की परतों में दबेखून और आंसूओं के बारे में.
ली की कविताएं मुझे बार-बार अपने आसपास हो रही घटनाओं का बोध कराती हैं. मैं समझ पा रहा हूँ कि कुछ समस्याएं वैश्विक हैं. सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए तानाशाह होने में गुरेज नहीं करते. और यही चिंता कवि ली की कविताओं में बार-बार दिखती है. ली सत्ता के विरुद्ध बहुत ही मुखर स्वर रखते हुए कहते हैं-
“संसद के कांफ्रेंस कक्षों में
शासक अपने आदेश जारी करते हैं
नागरिकों की खोपड़ियों पर
कोड़े मारने की आवाज़ के साथ
देश को स्तब्ध करते हुए”
जो रूपक और बिम्ब कवि ने गढ़े हैं वह कोई भाषाई तिलिस्म तो पैदा नहीं करते किन्तु बहुत गहरे उतरते हुए आपको अपने साथ जोड़ लेते हैं.
ली को चिंता है कि बंदूकधारियों के बीच उन्मुक्त हो सांस नहीं ली जा सकती. उनकी चिंता है कि सत्ताएं आम जनता को युद्ध के मुहाने पर लेकर आ चुकी हैं. कवि युद्ध के विरुद्ध लिखते हैं, शोषण के विरुद्ध लिखते हैं और नारी मुक्ति के पक्ष में भी लिखते हैं.
वह अन्धाधुनिकता के खतरों को भांपते हैं. वह विकास के नाम पर उजाड़ी जा रही प्रकृति को लेकर चिंतित हैं. वह विकास की परिभाषा पर सवाल खड़ा करते हैं.
“रेलमार्ग बनाने की खातिरहमने पेड़ काट दिए एक महफूज द्वीप केगगनचुम्बी इमारतों कोपरदे की भाँती ढंकती दीवार परएक नंगी सड़क लेटी हैआसमान का सीना भेद रही हैएक भारी भरकम क्रेन”
मैं क्योंकि एक पाठक की दृष्टि से कविताओं को देख रहा हूं तो काव्य सौंदर्य को व्याखित करना मेरे बस में नहीं है. मैं कवि की वैचारिक प्रतिबद्धता देखता हूं और महसूस करता हूं कि कवि एक प्रतिबद्ध मानव हैं, मानवीय सरोकारों को स्वर देते हुए, भेदभाव और स्वतंत्रता के पक्ष में. वह नारी स्वतंत्रता के पक्ष में उन औरतों को चिन्हित करते हुए जो खास जीवन जीते हुए जीवन से दूर हो रही हैं.
“कुछ दूसरी औरतें हैंजिनकी छाती परसलीब लटकी हैजो बताती हैवह रहना चाहेंगीपवित्र अक्षतयोनीयही बात हैजो डाले हुए है मुझेगहरे विषाद में”
कवि इतिहास पर बार-बार लिखते हुए दीखते हैं. कवि के इतिहास को समझने की और फिर उसे कविता में बिम्ब के रूप में उतारने की क्षमता का कायल हुए बिना नहीं रहा जा सकता. कवि जानते हैं कि इतिहास में कई रहस्य दफ़न हैं. ली जानते हैं कि समय को दर्ज़ करने की क्षमता कविता में है और उसे बरतने का हुनर कवि में-
“समय के अभिलेखों मेंकविता व्यक्त करती हैहमारे दिल के निशाँकविता की जड़ों मेंतुम्हें मिलेंगेइतिहास के रहस्य.”
कवि सत्ता के रवैये के प्रति शहर की खामोशी से चिंतित है. आज के दौर में जहां सत्ता भय का व्यापार कर जन को खामोश कर देने पर आमादा है, कवि बार-बार न केवल इस ख़ामोशी का अपनी कविताओं में जिक्र करते हैं बल्कि एक मुखर स्वर में आवाज़ बुलंद भी करते हैं-
“भिंची हुई खिडकियों और दरवाजों के पीछेहम स्वयं को कैद रखते हैंहम राबता रखते हैं कट-पेस्ट की प्रवृति सेहम अधिशासी पार्टी के आदेश में सर हिलाते हैंसोच-विचार का सामर्थ्य त्यागहम सोते हैं बुरे सपनें के बीच, निश्चिन्त”
कवि चिंतित है दुनिया के यथास्थितिवाद के समर्थन से, वह चिंतित है कि लोग रुढियों से चिपके रहना चाहते हैं. वह बदलाव से डरते हैं, नई सोच से डरते हैं.
यह संग्रह मूलतः चार चिंताओं के इर्द-गिर्द अपनी भाषा को बुनता है. पहला है निर्वासन का दर्द. जहाँ ली बार-बार निर्वासित कवि का जिक्र करते हैं. कवि निर्वासित लोगों के मन में मातृभूमि को एक "दुखती चेतना" की तरह देखते हैं.
दूसरी चिंता है अन्धाधुनिकता कि जहां विकास की परिभाषा को फिर से गढ़ने की जरूरत पर ली जोर देते हैं. उनकी चिंता है कि जल, जंगल और ज़मीन के एवज में हम आगे बढ़ने को उन्नति कैसे कह सकते हैं.
संग्रह का तीसरा सरोकार इतिहास में छुपे आंसूओं से होते हुए सत्तासीन लोगों के तानाशाही रवैये का मुखर प्रतिरोध है. अपने देश के प्रति अटूट प्रेम कवि की भाषा का मूलबिंदु है.
संग्रह में चौथा सरोकार है दुनिया के तमाम पीड़ित, दमित और शोषित लोगों के साथ बिरादराना संबंध की जरूरत. कवि की संवेदनाएं देश की सीमाओं को लांघकर घावों पर शब्दों के मरहम रखना चाहती हैं.
कुल मिलकर यह संग्रह पढ़ा जाना चाहिए यह जानने के लिए कि कैसे किसी दूर देश की कविता हमें अपनी सी लगने लगती है, कि कैसे कविता सरहदों की बंदिशे तोड़कर, निकल पड़ती है दुनिया भर में संवेदनाओं की पड़ताल करती हुई, दमन के विरुद्ध आवाज़ उठाती , दमितों उपेक्षितों की आवाज़ बनती, कि कैसे कविता खड़ी रहती है मानवता के पक्ष में मरहम बनकर.
आखिर में पहली कविता का अंश लिख रहा हूँ जिसके बारे में किताब की भूमिका में श्री जितेंद्र श्रीवास्तव जी लिखते हैं कि इस अंश में देवेश ने निश्चय ही फारमोसा को आर्यवर्त और ताइवान को भारत पढ़ा होगा-
“उगते हुए सूरज की रौशनीक्षितिज पर चमकती हैसपने बुनता फारमोसा(ताइवान का पुराना नाम)समुद्र के आलिंगन में रहता हैक्षितिज के ऊपरउसके वासी एक सुर में पुकारते हैंताइवान”
देवेश जी को बेहतरीन कवि की बेहतरीन कविताओं के बेहतरीन अनुवाद के लिए बधाई.
नाम: अशोक कुमार
जन्मस्थान: चम्बा हिमाचल प्रदेश
वर्तमान पता: H.N-17FF, पॉकेट-5, रोहिणी सेक्टर-21 दिल्ली
संप्रति: दिल्ली के सरकारी विद्यालय में शिक्षक
प्रकाशित पुस्तक: 'मेरे पास तुम हो' कविता संग्रह बोधि प्रकाशन से
इसके अतिरिक्त: कथा बिम्ब, प्रेरणाअंशु, नवचेतना, युवा सृजन, छत्तीगढ़मित्र, और हंस में कवितायें प्रकाशित, सहित्यिकी डॉट कॉम, हस्ताक्षर, सहित्यकुंज, समकालीन जनमत, और पोशम्पा जैसी वेबसाईट पर भी कवितायें और समीक्षा प्रकाशित.
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