◆ आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न
वृक्ष एक शरीर है
पृथ्वी के शरीर से उगता हुआ और अटूट
फूल तभी तक फूल है जब तक वह एक अंग है वृक्ष का
और पत्तियाँ तभी तक पत्तियाँ जब तक वे वृक्ष से ही लगी हैं
जब तक तुम साधे हो उसके शरीर को
तभी तक
उसकी आत्मा भी तुमसे अटूट है
आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न देखती है।
◆ प्रार्थना और चीख के बीच
जहाँ तुम थीं
अपने नाचते शरीर से
अंतरिक्ष को प्रेम जैसे
एक संक्षिप्त अनंत में ढालते हुए
वहाँ क्या मैं रख सकता हूँ शब्द—
उनका कोई संयोजन जो काव्य हो सके?
तुम्हारा मुक्त अकेलापन
आलोकित आकाश है
जिसे मेरी कोई कामना, कोई चीख़
छू भी नहीं सकती!
वहाँ अतीत एक किरण है
और भविष्य एक अचानक फूल :
शाखाएँ कुसुमित होती हैं मुद्राओं में
मुद्राएँ एक नीरव प्रार्थना हैं
और संगीत एक अकेलापन,
चट्टानें फूल हैं और फूल चट्टानें,
शरीर एक समुद्र
और समुद्र एक आकाश
और आकाश एक अकेली चीख़
और चीख़ एक संपूर्ण प्रार्थना।
मैं देखता हूँ
धीरे-धीरे पास आते अंत को :
नदी एकाकार होती है समुद्र से अनजाने
जल लौट आता है
समय और कामना में—
पहली बार मैं पहचानता हूँ;
शब्दों के अवसाद में
प्रार्थना और चीख़ के बीच स्थगित
कविता
जो कहीं नहीं रखी जा सकती।
◆ वहीं से आऊंगा
मैं वहीं से आऊँगा
जहाँ से वे आए थे :
जहाँ पानी और नमक का उद्गम है,
नदी को छूती न छूती वृक्षों की शाखाएँ हैं,
बूढ़ों के चेहरों पर तकलीफ़ और सपने दोनों चमकते हैं,
जहाँ बच्चों को प्रतीक्षा रहती है ताज़े फलों और गर्म रोटियों की सुगंध की।
सपनों पर नाम या पता नहीं लिखा होता,
फिर भी मुझे पता है कि उन पुरखों के हैं,
जिन्होंने किसी झील के किनारे सुस्ताते हुए सोचा था
कि राहत, हिम्मत और आकांक्षा पर सबका हक़ है
और सच में, जैसे जल में, सबका हिस्सा है।
मैं वहीं से आऊँगा :
जहाँ से वे आए थे—
मैं याद करूँगा वे बहसें जो चौक-चौबारों में हुई थीं
जीवन, आचरण और मर्यादा के बारे में
और उस अंत:करण को, जो सच बोलने की ज़िद पर अड़ा रहा
अकेले पड़ते और घोड़े की पूँछ से बाँधकर घिसटे जाने के बावजूद।
मैं वहीं जाऊँगा
जहाँ माना जाता है कि सच अकेले का भी होता है और सबका भी
और उसे जितना पाया जाता है उतना ही रचा।
मैं वहीं जाऊँगा जहाँ एक समय गढ़े गए देवता,
स्वर्ग और नरक,
अंतरिक्ष में गूँजते अहरह गान।
वहीं सहायता और करुणा के गलियारे और उम्मीद के कंगूरे।
मैं जाऊँगा वहाँ जहाँ
लोग दूसरों को अँधेरी सरहदों के पार उजालों में छोड़कर
अपनी घुप्प रात में गुम हो जाते हैं।
मैं वहीं से आऊँगा
जहाँ से वे आए थे :
खुदे जाने के लिए पत्थर की तरह,
सुलगने के लिए कोयले की तरह,
राख हो जाने के लिए आग की तरह।
मैं वहीं से आऊँगा
जहाँ प्रार्थना में डूबे लोग
अत्याचार के विरुद्ध उठी चीख़ को अनसुना नहीं करते,
जहाँ कोई भी पुकारे दु:खी या कोयल या राह भूल गई बुढ़िया
उसे उत्तर मिलता है
मैं वहीं से...
◆ प्रेम खो जाएगा
जैसे प्रार्थना के शब्दों की शुद्धता में ईश्वर
जैसे खिली धूप में पिछली बादल-घिरी शाम का अवसाद
वैसे ही अपनी चाहत से बिलमकर
प्रेम खो जाएगा
हम छीलते रहेंगे मेज़ पर चुपचाप बैठे नारंगियाँ और यादें
न सपने काफ़ी होंगे न शब्द
अंत में नहीं बचेगी कोई मांगलिकता
प्रेम खो जाएगा
आकाश को अपनी बाँहों में भरने की कोशिश रह जाएगी
रह जाएगी पृथ्वी के शस्य की तरह समृद्ध होने की इच्छा
कविता जैसा निश्छल होने का उपक्रम
गली पहले ही ख़त्म हो जाएगी
दरवाज़े बंद
धूप आने में असमर्थ
बीतने के भय के अलावा कोई नहीं होगा साथ
प्रेम खो जाएगा
जीर्णोद्धार के लिए नहीं मिलेंगे औज़ार
रफ़ू करने वाला धागा नहीं सूझेगा आँख को
दृश्यालेख से हरियाली, पक्षी
और बेंच पर हर दिन किसी देवता की तरह बैठा बूढ़ा
ओझल हो जाएँगे
प्रेम खो जाएगा...
◆ क्षमा करो
क्षमा करो स्वच्छ लोकतंत्र के निर्मल नागरिको,
तुम्हारे स्वच्छता अभियान में तुम्हारे साथ नहीं हूँ
और अपनी आत्मा की असह्य अपवित्रता और गंदगी में
ऊभ-चूभ हो रहा हूँ।
मुझे पता है कि मैं तुम्हारी गिनती में नहीं हूँ :
मच्छर मारने का धुआँ नगरपालिकाएँ बिना चूके
फैलाती रहती हैं।
क्षमा करो नागरिको
कि नृशंसता, निरपराध को मारने की तुम्हारी अद्भुत वीरता में
मैं अपनी कायरता के कारण शामिल नहीं हूँ।
क्षमा करो लोकतंत्र के मुखर पहरेदारो,
कि तुम्हारे वाग्वैभव, असत्य के गौरवगान में
मैं अपनी कायर बेसुरी आवाज़ से सुर लगाकर
उसको दूषित न करने की चालाकी बरत रहा हूँ :
मेरी चुप्पी मानीख़ेज़ भले हो, बेअसर है!
क्षमा करो भले बिराजे देवताओ,
तुम्हारे आस-पास बढ़ते कचरे के ढेर में
मैं एक अधकचरा कवि अपना कचरा नहीं मिला पा रहा हूँ :
बेसुरी प्रार्थनाओं और बेरहमी से तोड़े गए फूलों से घिरे होने के कारण
तुम ऊँचा सुनने लगे हो
और हम जैसे अपनी अछूती बात तुम तक पहुँचा सकने की जुगत
और अवसर गँवा चुके हैं।
क्षमा करो
इससे पहले कि क्षमा माँगने और करने का सिलसिला भी ख़त्म कर दिया जाए!
नाम : अशोक वाजपेयी
जन्म स्थान : छत्तीसगढ़ 16 जनवरी 1941
प्रकाशन:
कविता संग्रह : शहर अब भी संभावना है, एक पतंग अनंत में, अगर इतने से, जो नहीं हैं, तत्पुरुष, कहीं नहीं वहीं, घास में दुबका आकाश, तिनका तिनका, दु:ख चिट्ठीरसा है, विवक्षा, कुछ रफू कुछ थिगड़े, इबारत से गिरी मात्राएँ, उम्मीद का दूसरा नाम, समय के पास समय, अभी कुछ और, पुरखों की परछी में धूप, उजाला एक मंदिर बनाता है आलोचना : फिलहाल, कुछ पूर्वग्रह, समय से बाहर, कविता का गल्प, सीढ़ियाँ शुरू हो गई हैं, पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज, कभी कभार, बहुरि अकेला संपादन : बहुबचन, समास, पूर्वग्रह, कविता एशिया (सभी पत्रिकाएँ), तीसरा साक्ष्य, कुमार गंधर्व, प्रतिनिधि कविताएँ (मुक्तिबोध), पुनर्वसु, निर्मल वर्मा, टूटी हुई बिखरी हुई (शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं का एक चयन), कविता का जनपद, जैनेंद्र की आवाज, परंपरा की आधुनिकता, शब्द और सत्य, सन्नाटे का छंद (अज्ञेय की कविताएँ), पंत सहचर, मेरे युवजन मेरे परिजन, संशय के साए (कृष्ण बलदेव वैद संचयन) अनुवाद : जीवन के बीचोंबीच (पोलिश कवि तादेऊष रूजेविच की कविताओं का अनुवाद), अंत:करण का आयतन (पोलिश कवि ज्बीग्न्येव हर्बेर्त की कविताओं का अनुवाद), खुला घर (चेश्वाव मीवोष की कविताओं का अनुवाद),
उल्लेखनीय गतिविधियाँ/ उपलब्धियाँ/ प्रतिभागिता:
ललित कला अकादेमी के पूर्व चेयरमैन।
मान्यता/ पुरस्कार/ सम्मान:
साहित्य अकादेमी पुरस्कार (असहमति के अधिकार के पक्ष में 1915 में लौटा दिया), दयावती मोदी कवि शिखर सम्मान, कबीर सम्मान, आफ़िसर ऑव द आर्डर आव आर्ट्स एंड लेटर्स (फ्रांस सरकार), आफ़िसर ऑफ द ऑर्डर ऑव क्रॉस (पोलिश सरकार), भारत भारती सम्मान
उल्लेखनीय सूचनाएँ:
भोपाल स्थित भारत भवन के स्थापनाकार महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व उपकुलपति
विशेषज्ञता/ प्रवीणता/ रुचि के क्षेत्र:
कविता, समीक्षा, कहानी, निबंध, वैचारिकी, आलोचना

