लौटता हूँ
मैं अपनी आदतों में
ठीक उसी तरह
लौटता हूँ
जैसे पत्तों के बीच लौट आता है पतझड़
अपने समय में लौटते हुए
याद आती है
बारिश के बाद की उमस
अपने एकांत में लौटता हूँ
जैसे किनारों से टकराकर
लौट जाती हैं लहरें
नदी की गोद में
लौटता हूँ अपने विचारों में
जैसे सवारियों को गंतव्य पर छोड़
लौट आते हैं खाली रिक्शे
परंतु इन सबसे अलग
जब कभी लौटता हूँ तुमसे होकर
तो लगता है जैसे कोई बच्चा
लौट रहा हो
अपनी दुनिया में वापस।
इंतज़ार को एक ज़रूरी काम की तरह करता हूँ
कैसा रहे यदि
कैसे हो? के जवाब में
सच कहूँ कि "वाहियात किस्म का..."
कहाँ रहते हो? का उत्तर
"स्मृतियों में" कहकर दूं
क्या करते हो? के बदले
क्षितिज की ओर देखते हुए कहूँ
"इंतज़ार करता हूँ..."
तो क्या तुम मेरा यकीन करोगे...!
यकीन करोगे
कि हर बार किसी से मिलते हुए
अच्छा कम, बुरा अधिक क्यों होता हूँ
अपने भीतर, अपनी भीत में
दीमक की तरह लगता हूँ
यकीन करोगे
जब खिड़कियाँ खोलता हूँ तो
"प्रतीक्षाएँ ही आती हैं कमरों के भीतर"
हर रात दिमाग किसी फोकस लेंस सा सक्रिय हो
छोड़ता रहता है दीवारों पर एक दृश्य
और जलती हैं आँखे
स्मृतियों को बटुए में नगद की तरह रखता हूँ
यकीन करोगे
कि जैसे करता हूँ यात्राएँ
करता हूँ प्रेम
पकड़ता हूँ हाथ
वैसे ही करता हूँ इंतज़ार
इंतज़ार को
एक ज़रूरी काम की तरह करता हूँ।
मेरा ईश्वर
मंदिर के मुहाने पर ही
अलग हो जाते हैं हमारे रास्ते
माँ चली जाती है अपने आराध्य के पास
और मैं मुड़ जाता हूँ
रंगों से भरे, झींसी से भीगे बगीचे में
माँ तीन चार बार जल चढ़ाने को बोल
बढ़ जाती है आगे
मेरी मनाही से हिलता रहता है लोटे का जल
मैं टहलने लगता हूँ प्रकृति की भौंहों सी कोमल घास पर
फूलों को उतारता हूँ अपनी चेतना में
सुगंध से आत्मा को सींचता हूँ
चिड़ियों से पूछता हूँ बूढ़े पेड़ों का हाल
आकाश से माँगता हूँ विस्तार
जाता हूँ इस दुनिया के पार
माँ को देखता हूँ
जब वो धोती रहती है अपने ईश्वर के जड़ पाँव
तभी मेरा ईश्वर चूमता है मेरी उँगलियाँ
भरता है मेरे घाव।
बंटवारा
सोयी हुई छत
उठकर खड़ी हो जाती है
आँगन के बीच दीवार बनकर
अम्मा की देह में
बढ़ जाता है नमक
बाबा की थाली से
घट जाती हैं रोटियां
बच्चे समझ नहीं पाते
कौन से मंतर से
जागकर उठ गयी हैं छतें
और गिरकर
सो गये हैं लोग।
तुम ही थी न
मैं इलाके के आखिरी छोर पर
झंखाड़ की तरह उगा था
तुम मेरी आस्तीन में
नीला फूल बनकर खिली थी
तुम ही थी
जिसने तितली की शक्ल में
डुबोया था मुझे रंगों में
आम मैना के रूप में
तुम ही फुदक फुदक कर
बिखरा गयी थी मेरे बाल
चींटियों की कतार में भी
तुमने ही बनाया था
मेरी जड़ों में अपना घर
तुम ही थी जिसने
एक बच्ची की गेंद खो जाने पर
हिलाए थे मेरे कंधे
और सहलाई थी मेरी गोद
तुम ही थी उस शाम
बादल बनकर गिरी थी मेरे ऊपर
और भिगा गयी थी रोम-रोम
तुम ही आयी थी न
एक दिन मालिन बनकर
छाँटने के लिये मेरा अतिरिक्त
देने के लिये एक आकार
तुम ही थी न
जिसने अलग-अलग रूपों में आकर
सजाया था मुझे
दिया था अपना स्पर्श
बस यही सोचते हुए
हर आहट पर उचक-उचक कर खोजता हूँ
और तुम्हारे न मिलने पर
लिखने लगता हूँ भूरी मिट्टी पर
कोई अनचीन्ही कविता।
मेसोपोटामिया की औरतें
वे चुनार से आयीं थीं
और वापस वहीं जा रही थीं
इसी बीच वे मुझे मिलीं
पहले उन्होंने वक्त पूछा जो वाकई खराब था
फिर परिचय जो अधूरा रहा!
बातें हुई तो एक ने बताया
'मनगढ़ गइल रहली, दवाई लेवे'
उनके कष्ट के लिए जितनी दवाएं थीं, उससे कहीं ज्यादा दवाओं के लिए कष्ट!
वे बिना मर्दों के समूह में थीं लेकिन बिना मालिक के भेड़ें नहीं थीं वे।
उनका रंग इतना गाढ़ा था कि अँधेरा उनकी झुर्रियों में पैठा था
आँखें इतनी व्यस्त कि उन्हें कुछ देखने की फुर्सत नहीं थी
उनके हाथ पत्थर जितने कठोर थे और चमड़ी मिट्टी जितनी खुरदुरी।
वे मेसोपोटामिया की औरतें थीं जो भूलकर हमारी सभ्यता में आ गईं थीं
और नष्ट होने की प्रक्रिया में शामिल थीं।
वे इतनी निर्भीक थीं कि बिना टिकट सेकंड क्लास में चढ़ आयी और
अपनी उम्र से ज्यादा जगह घेर कर बतियाने लगीं
उनकी बातें सर्दियों की रात जितनी लम्बी थी और उनके कपड़ों ने सदियों की धूल फांकी थी
उन्हें बस इतना पता था कि पहाड़ शुरू होते ही उन्हें उतर जाना है
और रात तीन बजे के गाढ़े अँधेरे में गाँव की तरफ सरक जाना है!
पहाड़ उनके लिए उसी तरह थे जैसे अनजान रास्तों पर छोटे बच्चों के लिए पिता।
पिता के मरते ही वे घर से निकलना बंद कर देंगीं लेकिन वे निर्भीक थीं!
वे अभी भी अपनी परंपराओं में जीती थीं
वे घर बनाती थीं, चूल्हा चौका करती थीं, निर्भीक तो थीं लेकिन प्रकृति से डरती थीं
खेतों में फसलों को लोरियां सुना कर जवान करती थीं
हवाओं से मानता मानती और नदियों का धन्यवाद करती थीं
वे बच्चे पैदा करतीं और उन्हें इंसान बनाये रखने को हमारी सभ्यता से टकराती रहतीं।
वे युगों युगों से जीवित थीं परंतु अब जब हमारी परंपराओं ने उन्हें ठुकरा दिया है, वे बीमार पड़ गयी हैं।
और अब जब वे मरेंगी तब उनकी राख हवाओं में मिलकर संसार की तमाम नदियों में घुल जायेगी
और मैं किसी पुल से गुजरते हुए याद करूँगा
कि वे मेसोपोटामिया की औरतें थीं जो हमारी सभ्यता में भटक आयी थीं
जिनका रंग रात जितना गाढ़ा था और जो वाकई निर्भीक थीं।
बंदूकें
◆
जिसके भी हाथ में जातीं
बदल देती उसकी पहचान
दुनिया की कहानियों में
बदल देतीं उसकी जगह
बंदूकें जो बनने से नष्ट होने तक
पड़ी रहीं हाथों में ही
कितना कुछ बदल दिया उन्होंने
वहीं पड़े पड़े!
◆
बच्चों के हाथ रहीं
तो खिलौना बन गयीं
सयानों के हाथ पड़ीं
तो मृत्यु साबित हुईं
मजलूमों के हाथों में गयीं
तो जंगल, नदी, खेत
और घर बन गयीं
आतताइयों के हाथ जाते ही
अफवाहों की तरह
निगल गयीं पूरा का पूरा शहर!
◆
बच्चे मेले से लाए उन्हें
और बना लिया उन्हें अपना दोस्त
फिर एक दिन जब
तड़तड़ाहट की असंख्य आवाजों के साथ
हिल गया पूरा क़स्बा
चिड़िया छोड़ के उड़ गयीं अपना पेड़
ठीक उसी वक्त बच्चे
अपने पिताओं की टूटी रक्ताभ घड़ियाँ उठाये
चीखकर धिक्कार रहे थे खुद को
बंदूकों का दोस्त बन जाने के लिए!
◆
लोहार ने ही दी उन्हें कठोरता
लोहार ने ही दिया अपना रंग
लोहार ने ही दी अपने हिस्से की निर्भीकता
अपने हिस्से की टंकार भरी उनमें
और अपने हिस्से का संघर्ष भी सौंप दिया उनको
लेकिन! लोहार ने तो नहीं दिया उन्हें
गरीब भूखे लोगों की जान लेने का प्रशिक्षण
शायद बिक जाने के बाद बन्दूकों ने सीख लिया
बहुत कुछ...!
◆
मामा! मामा! बन्दूक दिलाओ न...
मामा ने उसे दिला दी बन्दूक
उसके किर्र...किर्र...और फट...फट... से
बच्चा भगाता था बन्दर और उड़ जाते थे पंक्षी
आज पच्चीस साल बाद
लड़का भगाता है आदमी और उड़ जाते हैं उसके परखच्चे।
शिवम चौबे
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में परास्नातक
(वागर्थ, पाखी, बहुमत में कविताएँ प्रकाशित)
पता- झूंसी, इलाहाबाद

