![]() |
| छवि श्रेय: राहुल बोयल |
समय के जंगल में
समय के जंगल में
सबसे बड़े आखेटक
बनके उभरे हो तुम कवि!
तुम्हारे निशाने पर स्त्रियाँ हैं
मासूम बच्चे हैं
चाँद हैं, तारे हैं
तितलियाँ हैं, सपने हैं
पराये हैं, तेरे अपने हैं
कितने ही अन्तर्द्वन्द्वों से गुज़रकर
एक आदमी थामता है प्रेम की पतवार
तुम प्रेम की देकर विविध परिभाषाएँ
कर देते हो उसे दिग्भ्रमित
अन्तत: जिस दिशा में जाता है उसका मन
उधर ही रख देते हो तुम कविता का तन
रूपक, उपमा, अनुप्रास, अतिशय
न जाने कितने तीर हैं तुम्हारे तरकश में
न जाने कितनी चौड़ी है तुम्हारी पीठ
तुम्हारे सीने का माप सकुचाया हुआ है
क्या एक चोट खा सकते हो तुम?
तुम्हारा दिल मछली की वही आँख है
जिस पर साधना है तुम्हे लक्ष्य
क्या तुम्हारी भी आँखों पर पट्टी बँधी है?
कवि! तुम किस ज़द में लिखते हो
या बस यूँ ही किसी ज़िद में लिखते हो?
#कविताई_की_फ़ज़ीहत
"कितने ही अन्तर्द्वन्द्वों से गुज़रकर, एक आदमी थामता है प्रेम की पतवार, तुम प्रेम की देकर विविध परिभाषाएँ, कर देते हो उसे दिग्भ्रमित"
तुम्हारे पास आने के लिए
तुम्हारे पास आने के लिए
मुझे शहर को नदी की तरह पार करना होगा
मैं केवल देह लेकर पानी में उतरा
तो यकीनन डूब जाऊँगा।
नदी मेरी देह को केवल मिट्टी नहीं मानती
उसकी बुनावट वो मेरी आँखों से तय करती है
जो प्रतीक्षा में पहले से ही पथरायीं हुईं हैं
और पत्थर की नाव का मुस्तकबिल
कागज़ की नाव से भी बदतर होता है।
तेरे शहर की नदी में जितनी भी मछलियाँ हैं
वो सब मुझे वैसे तो बिल्कुल नहीं देखेंगी
जैसे तुम देखते हो कभी-कभार
पिछली बार सफ़ेद फूल लेकर आया था मैं
तुम तक पहुँचने तक वो मुझ सा श्यामल हो गया था।
इस नदी का पानी इतना खारा है
कि चेहरे पर तेज़ाब की तरह लगता है
इस नदी का बहाव इतना तेज़ है
कि समय की चाल भी धीमी मालूम होती है।
तुम्हारे पूर्वजों ने जो किनारों पर पेड़ लगाये थे
वो अब धुएँ की चिमनियों में तब्दील हो गये हैं
मैं जब भी कहीं छांव में आराम करना चाहता हूँ
तो मुझे बचे-खुचे परिन्दे भी उड़ाने पड़ते हैं।
तुम्हारे पास आने के लिए
मुझे शहर को नदी की तरह पार करना होगा
जो कुछ बचा है मुझमें, उसके पथराने से पहले।
#नष्ट_नहीं_होगा_प्रेम संग्रह से
"तुम्हारे पास आने के लिए मुझे शहर को नदी की तरह पार करना होगा, मैं केवल देह लेकर पानी में उतरा तो यकीनन डूब जाऊँगा।"
पहली दफ़ा उसने जागने की बात की
पहली दफ़ा उसने जागने की बात की
और देर तक लेटा रहा।
एक ऐसा द्वन्द्व
जैसे वर्षों से भीतर धूनी रमाये हुए की
हो गयी हो तपस्या भंग
और खुल गयी हो पाखण्ड की पोल
मगर
सब था विलोम
जो अनुलोम बनकर चलायमान था रक्त के साथ
आत्मा किसी बोझ से दबी थी।
पहली दफ़ा उसने जागने की बात की
और देर तक लेटा रहा
अनिमेष विचारों की शमशीरें
चीरती रहीं हृदय
भरती रहीं आलिन्दों में अनिद्रा
निलयों में निठौर ही निठौर था।
जग मुआ कहने लगा
बौरा गया, बौरा गया
दिखता जो भी सौम्य था, आग्नेय हो गया
जितना जल में भीगता, उतना जलता गया
जग मुआ कहने लगा
बौरा गया, बौरा गया
उचटी हुई नींद पर विस्मय था, भय न था।
पहली दफ़ा उसने जागने की बात की
और देर तक लेटा रहा
प्रथम प्रयास था मनुष्यता की ओर
निष्फल था मगर सफल था
रीतियां उछल पड़ी,
कुण्ठित समाज ने सल भरी
उसे जागने न दिया गया।
पहली दफ़ा उसने जागने की बात की
और देर तक लेटा रहा।
"एक ऐसा द्वन्द्व जैसे वर्षों से भीतर धूनी रमाये हुए की हो गयी हो तपस्या भंग, और खुल गयी हो पाखण्ड की पोल मगर सब था विलोम। जो अनुलोम बनकर चलायमान था रक्त के साथ, आत्मा किसी बोझ से दबी थी।"
हेमन्त को देकर उलाहना
हेमन्त को देकर उलाहना
शिशिर आता है अपनी चाल में
गुरूर से इठलाता हुआ
और बताता है कि
आया हूँ मैं
तो वसन्त भी पीछे - पीछे
आ ही जायेगा।
मेरे जीवन की चौथी रुत में भी
आ जाता है वसन्त
जब हँस देती है वह
दो बलिश्त की लम्बाई जितने शिशु के समान
वह इतनी उम्मीद से देखती है आकाश
कि सिमट आता है वह भी
एक बिन्दी बनकर उसके भाल पर
कोई भी फूल उसके समक्ष
करता रहता है अनुनय- विनय
बनने के लिए उसका कर्णफूल
जबकि वह तो सर्षप के पुष्प को भी
सिन्दूर की तरह रखती है सिर - माथे पर
यदि आपका यह मानना है
कि स्वर्ण रंग पर सबसे अधिक खिलता है कुमकुम
तो यकीनन आपने उसे
पीत-हरित गणवेश में देखा नहीं है!
वह अपनी दोनों आँखों से
दो विविध ब्रह्माण्डों के ऐसे चित्र खेंचती है
कि यदि कोई उनमें झाँके
तो हवा में उड़ते हुए कल्पना करने लगे
हर बार की तरह
इस बार भी लौटा है वसन्त
मगर इस बार तो
उसकी तस्वीर ने ही
भगा दिया है शिशिर को
अरे शिशिर! तुम कितने कायर निकले
किसी की हँसी से डरकर
कोई इस तरह भागता है क्या?
"यदि आपका यह मानना है कि स्वर्ण रंग पर सबसे अधिक खिलता है कुमकुम तो यकीनन आपने उसे पीत-हरित गणवेश में देखा नहीं है! वह अपनी दोनों आँखों से दो विविध ब्रह्माण्डों के ऐसे चित्र खेंचती है कि यदि कोई उनमें झाँके तो हवा में उड़ते हुए कल्पना करने लगे।"
मुझसे पूर्व ही क्यों चाहती हो मृत्यु ?
मुझसे पूर्व ही क्यों चाहती हो मृत्यु ?
जीवन के सैंकड़ों पड़ाव देखने हैं तुम्हें
तुम उन्मत मत रहना मेरी स्मृतियों में
स्मृतियाँ करती हैं केवल अन्तस् को रिक्त ।
निष्प्राण, निश्चेत मत रहना तुम
विकल्प बहुत हैं जीवन के, जीवन्तता के
परन्तु चुनाव करना चिरायु चेतन
हो जाये मेरी तरह विलुप्त समयपूर्व
वो आनन्द काम भी क्या आयेगा तुम्हारे?
अश्म हूँ मैं, परन्तु ढह रहा हूँ अब
तुम शिला न होना मेरे पश्चात
मारुत होके होना प्रवाहित जग में
जैसे अब हो, सदैव वैसे ही रहना ।
तुम हृदय पर कोई भार न रखना
पृष्ठ पर, स्कन्द पर ही रखना सब दायित्त्व
विस्मृत कर देना मुझे सम्पूर्ण
या कर देना समूल नष्ट ताकि
मेरे होने, न होने का औचित्य ही हो समाप्त
और केवल तुम रहो और तुम्हारी जिजीविषा रहे।
"निष्प्राण, निश्चेत मत रहना तुम, विकल्प बहुत हैं जीवन के जीवन्तता के, परन्तु चुनाव करना चिरायु चेतन हो जाये मेरी तरह विलुप्त समयपूर्व वो आनन्द काम भी क्या आयेगा तुम्हारे?"
दु:ख सदैव उन दरवाजों से आता है
दु:ख सदैव उन दरवाजों से आता है
जिनकी तरफ तुम पीठ करके बैठते हो
इसलिए
किसी द्वार
किसी खिड़की
यहाँ तक कि
किसी सुराख़ को भी
कभी पीठ मत दिखाओ
हर खुली हुई चीज़ आँख होती है
आँख नहीं तो आँख की मानिन्द तो ज़रूर होती है
हर आँख चाहती है
आँख से आँख मिलाना
तुमसे भी मुमकिन हो सकता है ऐसा कर पाना
पीठ से
दीवार को सहलाओ या मत सहलाओ
द्वार से आँख ज़रूर लगाओ
"हर खुली हुई चीज़ आँख होती है, आँख नहीं तो आँख की मानिन्द तो ज़रूर होती है। हर आँख चाहती है आँख से आँख मिलाना।"
प्यार करने के लिए
प्यार करने के लिए
मेरे पास चार शब्द थे
घर, तुम, मैं और मुल्क
और इनके भी अपने प्रारब्ध थे।
घर बचाने के लिए
तेरे शहर किराये पर रहना पड़ा
घर छूट गया
तुमसे निभाने के लिए
ख़ुद से ही लड़ना पड़ा
और मैं टूट गया
मुल्क के ऐतिहासिक सौन्दर्य पर
हमारे भविष्य स्तब्ध थे
स्वप्नों का शब्दकोश बहुत बड़ा था
पर मेरे पास चार ही शब्द थे
और इनके भी अपने ही प्रारब्ध थे।
"प्यार करने के लिए मेरे पास चार शब्द थे घर, तुम, मैं और मुल्क और इनके भी अपने प्रारब्ध थे।"
राहुल कुमार बोयल
जन्म दिनांक- 23.06.1985
जन्म स्थान- जयपहाड़ी, जिला-झुन्झुनूं( राजस्थान)
पत्र व्यवहार का पता : तहसील कार्यालय बाली
जिला पाली राजस्थान 306701
सम्प्रति- राजस्व विभाग में कार्मिक
पुस्तकें- समय की नदी पर पुल नहीं होता (कविता संग्रह)
नष्ट नहीं होगा प्रेम ( कविता संग्रह)
मैं चाबियों से नहीं खुलता( काव्य-संग्रह)
ज़र्रे-ज़र्रे की ख्वाहिश (ग़ज़ल संग्रह)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं यथा वागर्थ, पूर्वग्रह, मधुमती, आजकल, सृजन सरोकार, किस्सा कोताह, कथा, दोआबा, हिन्दी जनचेतना, नवकिरण, सरस्वती सुमन, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, परिन्दे इत्यादि में कविताएँ/ग़ज़ल प्रकाशित।
मोबाइल नम्बर- 7726060287
ई मेल पता- rahulzia23@gmail.com

