कराह
उसके दृश्य का अंधेरा
मेरे दृश्य पर उतर रहा था
जब मैंने उससे कहा : कहो
मेरे हिस्से की रोशनी उतर रही थी उसके दृश्य पर
उसकी चुप्पी में
अब शामिल थी मेरी भी चुप्पी
मेरी भी सहमति
और शामिल थी मेरी भी ढकी-दबी दुर्बलताएँ
यह साँझ का वक्त था
और दोनों तरफ से दिख रहा था
एक ही जैसा दृश्य
और कुछ भी कहने की अनिवार्यता से मुक्त
एक कराह"
"यह साँझ का वक्त था और दोनों तरफ से दिख रहा था एक ही जैसा दृश्य और कुछ भी कहने की अनिवार्यता से मुक्त 'एक कराह'!"
महाशून्य, मैं और मंगलेश डबराल
हम दोनों भिन्न थे
पर शहर हमें एक करता था
जहाँ से वह भाग जाना चाहते थे पहाड़ की ओर
मैं इस मायने में उनसे अलग था
कि भागने के लिए कोई पहाड़, गाँव या बाबा-दादा का घर नहीं था मेरे पास.
बस एक शहर था
जो मेरी समूची स्मृति में
एक कानफोड़ू शोर की तरह दर्ज था.
मेरे सारे सच पर वह शोर भारी था
मंगलेश डबराल और मैं जब भी मिलते तो इस तरह मिलते कि हमारे मिलने की कोई स्मृति तक कहीं दर्ज न होती.
अपनी जगहों से बने हमारे संदेह ही आपस मे मिलते थे
और हाथ मिलाते थे.
हम शहरी न होने की लड़ाई में शामिल थे
पर हमारे तरीके और परिणाम हमे अलग करते थे.
उनके पहाड़ छोड़ने के दुख से ज्यादा बड़ी थी मेरी कहीं भी न भाग पाने की विकल्पहीनता.
हम एक ही वक्त में थे एक ही निर्वात को रचते हुए
वहाँ ध्वनि नहीं घुस सकती थी
न ही संवाद
न अराजक
न विदूषक
दुख से उपजा एकांत वहाँ रचता था एक अभेद दीवार
हम वाष्प की तरह अपनी-अपनी सतहों से ऊपर उठते थे और कठोर दीवार से टकरा कर गिर जाते थे नीचे.
हम इसी भिन्न प्रक्रिया से बदलते थे अपनी गैसीय अवस्था
और पानी-पानी हो जाते थे.
विस्थापन या पलायन का दुख
हमें कठोर तो करता था पर ठोस नहीं
हल्की सी भी चोट लगने पर सबको सुनाई देती थी हमारे भीतर से उठती वह ठकठकाहट
जिससे पहचान में आती थी
कठोरता के भीतर बची हुई एक खोखली जगह!
एक-दूसरे की ओर महाशून्य रचते हुए
हम लिख रहे थे अपने-अपने शहरों पर कविताएँ
और एक अदद इसी सुकून में हम सो जाते थे शहरों की कड़ी धूप को पी कर
शहरों की पीठ और चिकनी हुई जाती थी
हम बार-बार फिसलते थे
पर एक-दूसरे को घूरने की बेधकता में बचे भी रहते थे.
"विस्थापन या पलायन का दुख हमें कठोर तो करता था पर ठोस नहीं। हल्की सी भी चोट लगने पर सबको सुनाई देती थी, हमारे भीतर से उठती वह ठकठकाहट जिससे पहचान में आती थी, कठोरता के भीतर बची हुई एक खोखली जगह!"
संपूर्णता
संपूर्णता कतई सफलता नही होती
वह होती है एक तरह की मृत्यु
जो ऊपर से चमकदार पर भीतर से एक खोखले मौन से भरी हुई
उसकी दीवारों पर प्रश्न के पत्थर नही मारे जा सकते
बहुत बार एक अश्लील अनुत्पादकता से भरी हुई
जिसे कई बार मुँह चिढ़ा सकता है
खेत की आशंकाओं को ढोता उसके भीतर फटे बांस के सहारे टिका
एक फूटे मटके के सिर वाला बिजूका.
संपूर्णता अक्सर खड़ी मिलती है चौराहे पर
दिशाभ्रम से लकवाग्रस्त हो कर
वह सफलता नही होती
जो एक पड़ाव पार करने के बाद दूर से ही देख लेती है
एक चमकदार और आकर्षित करता
लैंप-पोस्ट
वह एक पेड़ के जितनी विनम्र नही होती
जो वर्ष में एक बार अपनी बूढ़ी पत्तियों को बहुत हिचकते हुए दे देता है
विस्थापन का आदेश!
वह एक आक्रांता की तरह तेज़ तलवार के साथ आती है
और उपलब्ध सभी विकल्पों की गर्दन काट देती है.
वह जहाँ होती है अपनी तरह की अकेली चीज होती है.
वह संपूर्णता ही होती है जिस पता होता है कि यहाँ से अब आगे नही जाया जा सकता है.
जिसके चेहरे पर जीवन की घिसी हुई सिलवटे नही दिखती
दिखती है असंदिग्ध रूप से एक खूबसूरत पॉलिश!
'अपूर्णता' के चेहरे पर एक सुंदर मृत्यु सोती है
संपूर्णता की आहट भर से वह जाग उठती है
एक अलार्म की तरह होती है संपूर्णता
एक आदमी को चाहिए कि वह हर बार उस अलार्म के बजने से पहले उठ जाए
और मूड जाए
एक 'सुंदर अपूर्णता' के साथ उस ओर
जहाँ एक नए पड़ाव पर खड़ा कोई लैम्पपोस्ट
उसे हाथ हिला रहा हो.
"संपूर्णता कतई सफलता नहीं होती, वह होती है एक तरह की मृत्यु जो ऊपर से चमकदार पर भीतर से एक खोखले मौन से भरी हुई। उसकी दीवारों पर प्रश्न के पत्थर नहीं मारे जा सकते"
अनिष्ट
मेरी नींद में आधी जाग घुली है
पूरी जाग में घुली है एक अश्लील धुँध
यह सिर्फ कहने की बात है कि संसार मे नहीं है कुछ भी अश्लील
फिर भी आधी रात मेरी उंगलियों को याद आता है
कितने दिन हुए मिट्टी के स्वप्न नहीं आये!
नहीं आये बादल
नहीं मिले संकेत
आद्रता किसी पुकार पर अब नहीं आती दौड़ी हुई
करुणा-ग्रस्त चेहरे बदल गए हैं पथरीली कलाकृतियों में.
अब दिखते हैं रगड़ खाई नग्न देहों के चेहरे
दृश्य से किसी चित्रकार ने वापस खींच लिए हैं उदासी के तमाम रंग
मैं चमकदार रंगों को आधी रात में नहीं देखता
मैं आधी जाग को छोड़ता हूँ बीत गई तिथियों के हवाले
और मृत्यु से कहता हूँ
मुझे सुबह तक की नींद दो
संकेतों में मिलता है मृत्यु का पता
संगीत के सभी उत्सव मौन में बदलते हैं
वृक्ष की पत्तियों में बनने लगी हैं घूरने वाली आँखें
हवा में घुले हैं जहरीले डंक
दीवार पारदर्शी हो चुकी हैं
यह दिन का दृश्य है जब मैंने ढूंढ ली है एक नदी
जिसे नहीं पता है कि किनारे कैसे तोड़ते हैं
मैं मिट्टी पर कदम रखता हूँ कोई शीतलता हड्डियों में नहीं दौड़ती है.
चारो तरफ से घिरा आदमी जब भूलने लगता है शील और अश्लील के मायने
तो वह घबरा जाता है.
फिर सारे आरोप लगते हैं एक ताज़ा उतरी धुँध पर
जिसने घेर लिया है
आहटों से भरा एक पूरा इलाका
अब हर चीज को देखने का मतलब हो गया है घूरना
अग्नि से नहीं बन रही अब कोई छाया
ईश्वर का नाम किसी को याद नहीं
अब एक शब्द आता है और फुसफुसाहट में बदल जाता है.
●2020
"मैं चमकदार रंगों को आधी रात में नहीं देखता, मैं आधी जाग को छोड़ता हूँ, बीत गई तिथियों के हवाले और मृत्यु से कहता हूँ, मुझे सुबह तक की नींद दो"
ठीक-ठाक देश सा
जिसे आप देश कहते हैं
वह एक देह है.
उसके सिर पर बैठ कर कभी
पतंजलि घोट रहे थे सभ्यता के जख्मो का मरहम
जिसके बाएं हाथ पर सात बहनें बाट जोह रही थी
अपनी घर-वापसी की.
तो दाहिना हाथ बना रहा था
हल्दी घाटी के युद्ध की अदम्य योजना
पैरों में जिसके किसी पत्नी-वियोगी ने बांधे थे पहले इंसानी पुल के हाथ
चल कर लौटना था जहां से, एक स्त्री को वापस अपने देश
उठ खड़े होना था जहाँ फिर से बिरसा मुंडा को
जहाँ बार-बार लौटते थे
नेता-ठग-डाकू और मुगल.
जहाँ चरखे संग घूम गयी थीं साम्राज्यवाद की चूलें
जहाँ किसी ने मांगा था खून, और कहा था मैं तुम्हे आजादी दूँगा.
जहाँ रोज घट रही है
उस देह को काटने की साजिशें,
मैं उसके मुँह से बस्तर की आवाज सा कराहता हूँ
ऋचाएं और आयतें सुन-सुन कर
मैं एक कान से बहरा हूँ
मैं विकास की दौड़ में पीछे रह गया डेढ़ पैर का धावक हूँ.
मैं सन्नाटे में मिल गयी एक अकेली स्त्री का भय हूँ.
नक्शे की शक्ल में बहुत दूर तक फैली एक राष्ट्रीय असुरक्षा हूँ
तीन युद्ध जीतने, और एक युद्ध हारने का सीधा-सपाट बयान हूँ
मैं सबसे पीछे खड़े आदमी की शक्ल पर हर रात उतर आया
एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह हूँ.
मेरा उपचार एक सौ चवालीस खंभों पर टिका एक सवाल है
मैं गांवों का हाथ पकड़े खड़ी, एक चिढ़ी हुई 'राष्ट्रीय-प्रतीक्षा' भी हूँ.
अगर सहमत हों आप सब,
तो मैं उस देह से पूछना चाहता हूं
क्या मैं तुममे किसी ठीक-ठाक देश सा घट जाऊं ?
●2017
"जहाँ रोज घट रही है उस देह को काटने की साजिशें, मैं उसके मुँह से बस्तर की आवाज सा कराहता हूँ, ऋचाएं और आयतें सुन-सुन कर, मैं एक कान से बहरा हूँ, मैं विकास की दौड़ में पीछे रह गया डेढ़ पैर का धावक हूँ."
सिगरेट
सिगरेट आपको यह मानने की सुविधा देती है
कि आप इसे पीते हुए भीतर का सारा कालापन धुंए की शक्ल में बाहर उगल रहे हैं
जब आप सोचते हैं और एक कश खींचते हैं
आपको लग सकता है
कि यह विचार जो अभी-अभी बाहर से भीतर आया है
वह आपके इस कश की प्रतीक्षा में
पता नही कब से पर्यावरण में एकदम बेकार पड़ा था
एक सिगरेट आपको दिन भर में
कई बार शुक्रगुजार होने का मौका देती है
●कविता संग्रह : मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है
"सिगरेट आपको यह मानने की सुविधा देती है कि आप इसे पीते हुए भीतर का सारा कालापन धुंए की शक्ल में बाहर उगल रहे हैं"
आदमी
एक आदमी
बिना किसी नक्शे के
हमारे समय की भूल-भुलैया में भटक रहा है
सभ्यता उसे घोषित कर सकती है पागल.
पागल
घोषित कर सकते हैं उसे
सभ्यता का सबसे जरूरी आदमी
और
कर सकते हैं वह उम्मीद उससे
कि योजनाओं से बाहर का यह आदमी
ढक लेगा एक दिन समूची पृथ्वी
और याद दिलाएगा हमें
कि भटकना
हमारी सभ्यता का सबसे प्रिय उत्सव था कभी.
●2019