दुखान्तिका

 छवि श्रेय: श्रीविलास सिंह









दुखान्तिका

मैं थक कर बैठा हूँ
बूढ़े बरगद के नीचे
साँझ के साथ ही उतर रहीं हैं सदियां
मेरे सामने का बंजर मैदान लाल होने लगा है
उनकी घायल देह से टपकते रक्त से,
सदियों के चिथड़े हो चुके विचार
असफल हैं छिपा पाने में
भीतर की दरिद्रता और नंगापन
विचार 
संपत्ति के, साम्राज्यों के विचार
विचार समानता के, स्वतंत्रता के, अधिकार के,
विचार इस दुनिया के बाद की दुनिया के
सही और गलत के विचार
पाप और पुण्य के विचार
स्वर्ग और नर्क के 
देवदूतों और शैतानों के 
और अपने अपने ईश्वर के विचार
विचारों की इस रेलमपेल में
धक्के खाती मानवता का विचार 
पड़ा है समय के गले में
किसी मृतक के गले में तावीज की तरह।

तमाम विचार जिनका एक ही था घोषित उद्देश्य
मनुष्यता का वही अभागा हित
जो डूब चुका है युद्धलिप्सा और रक्त की कीचड़ में
जीवन को सुंदर बनाने के नाम पर
हर विचार, हर दर्शन ने
जीवन की राह में कांटे ही बोए।
ईश्वरों और उनके चेलों को बहुत भाती है
रक्त की गंध
और तमाम ईश्वरों के महलों के विस्तीर्ण गलियारों में
चिपचिपाहट पसरी है सड़ रहे मानव रक्त की
जिनकी बलि दी गयी है सदियों से
ताकि सुरक्षित रहे ईश्वर का साम्राज्य।
किसी इतिहास में नहीं कि
कभी किया हो युद्ध इन ईश्वरों ने
स्थापित करने को अपना साम्राज्य, अपनी सार्वभौमिकता, 
अपने सर्वशक्तिमान होने का मिथ।
बस इनकी उन्मत्त सेनाओं ने काट डाले
वे तमाम सिर 
जिन पर सवार था किसी दूसरे विचार, 
किसी दूसरे ईश्वर का जुनून
कुछ ऐसे भी थे अभागे
जो मानते नहीं थे 
किसी भी ईश्वर का अस्तित्व और
जिन्होंने इंकार कर दिया था 
शामिल होने से इस उन्माद में
उनके भी सिर लटके हैं सदियों से
आस्था की गंधाती प्राचीरों के बाहर।
अंधेरा घना होने लगा है और
बूढ़े बरगद के सामने के बंजर मैदान में
नाचने लगे हैं इतिहास की स्मृतियों के प्रेत
चीखों, कराहों और विलाप का असहनीय प्राचीन शोर
जिसके बीच से आ रही हैं आवाज़ें
किसी अदृश्य की प्रार्थना के मंत्रों की
अबूझ भाषाओं में 
मैं चुप थका बैठा हूँ
और मेरी ही तरह थक चुका बूढ़ा बरगद
अभिशप्त है देखने को यह दुखान्तिका
खड़ा हुआ समय के अंतहीन विस्तार में।

"विचार संपत्ति के, साम्राज्यों के विचार, विचार समानता के, स्वतंत्रता के, अधिकार के, विचार इस दुनिया के बाद की दुनिया के, सही और गलत के विचार, पाप और पुण्य के विचार, स्वर्ग और नर्क के, देवदूतों और शैतानों के, और अपने अपने ईश्वर के विचार, विचारों की इस रेलमपेल में, धक्के खाती मानवता का विचार, पड़ा है समय के गले में किसी मृतक के गले में तावीज की तरह।"

इति सिद्धम

तुम्हारी देहरी तक 
जा कर लौट आती हैं मेरी यात्राएं
और खिड़कियों में कैद आसमान में
बादल का एक टुकड़ा
भीग रहा होता है अपनी ही आर्द्रता में
क्यारियों में उगे हुए रंग
आँखों में बस जाते हैं आँसू की सी कोमलता से
प्रकाश के प्रतिबिम्ब शेष बचे रहते हैं
सूरज के डूब जाने के बाद भी
फूलों के मुरझा जाने के बाद भी
हवा में शेष होती है गंध,
तुम्हारे और मेरे बीच
स्थित संसार का यह विस्तार
देह की स्फीति से होता
सिमट जाता है मन की गहराइयों में
प्रेम की ज्यामिति के प्रमेय
पुस्तकों में नहीं,
सिद्ध होते हैं हृदय के पृष्ठों पर।


"तुम्हारे और मेरे बीच स्थित संसार का यह विस्तार, देह की स्फीति से होता सिमट जाता है मन की गहराइयों में, प्रेम की ज्यामिति के प्रमेय पुस्तकों में नहीं, सिद्ध होते हैं हृदय के पृष्ठों पर।"

किसी साँझ 

शाल वृक्षों की फुनगियों पर पाँव रखती धूप
उतर रही है धीरे धीरे 
उनकी बढ़ती हुई छायाओं के साथ 
दूर पहाड़ों के उस पार से आकर
यहीं ठहर जाएँगी पूरब की हवाएँ 
भोर के तमाम स्वप्न 
वापस लौट जाएँगे इन्हीं हवाओं के साथ
और धूप की ऊष्मा के साथ ही
बढ़ जाएगी ज़िंदा रहने की ज़िद्दों-जेहद।

तोते न जाने कैसे जान लेंगे 
मीठे अमरूदों के स्वाद का पता 
और नीम की ऊँची टहनी के किनारे से लटकते
बया के घोंसले शायद होंगे 
जीवन की सब से गझिन बुनावट 
और अपनी चोंच का नन्हा दाना 
अपने बच्चों के उत्कंठित मुँह में डालती चिड़िया 
होगी सबसे बड़ी आश्वस्ति जीवन की ।

नदी की बची रह गयी कलकल धार में 
शिकारियों की बंसी के धागे से बंधा निशान 
अभी डूबा नहीं है पानी में 
और लाखों बार ठगी जाने के बावजूद 
चले आना मछलियों का काँटे तक 
प्रेम में छले जाने की है शाश्वत कथा 
और उस विश्वास की भी जो बचा रहेगा 
इस सुबह और ना जाने कितनी अनजान सुबहों तक ।

सारे जादुई व्यापार के बीच
शेष रहेंगी इच्छायें खंडहर में पीछे छूट गयी 
किसी पूर्वज की आत्मा की भाँति 
आँगन में प्राचीन वृक्ष की डाल पर लटकी 
किसी राजकुमार की प्रतीक्षा में 
जो उन्हें कंधे पर उठाए सुनाएगा कहानी 
और करेगा संधान उनकी मुक्ति का
पर दिन ढलने के साथ ही 
ये लौट जाएंगी
फिर से वृक्ष की डाल पर।

दिन फिर चल कर पहुँच जाएगा गोधूली के द्वार 
पार करके अग्निपथ
तितलियाँ जब लौट जाएँगी अपने अनजाने घरों को 
और फूल कुम्हला जाएँगे अपनी प्रेमिकाओं के वियोग में 
चिड़ियाँ फिर लौटेंगी अपने घोसलों तक 
धूप फिर से ओढ़ लेगी अलकतरे की चादर 
तब जब सब कुछ को आ जाएगा विश्राम
पीड़ा की गोद में, 
फिर जलेंगे स्वप्नों के दीप आँखों की चौखट पर और 
ऐसी ही किसी साँझ शायद 
एक बार फिर मैं लौट कर आऊँगा 
तुम्हारे हृदय के द्वार तक ।

"फिर जलेंगे स्वप्नों के दीप आँखों की चौखट पर और ऐसी ही किसी साँझ शायद  एक बार फिर मैं लौट कर आऊँगा, तुम्हारे हृदय के द्वार तक।"

सनद रहे 

यह लहूलुहान समय
उपस्थित है मेरे हर क्षण में
सांस की तरह
और मेरे अस्तित्व का रेशा रेशा
बोझिल है
एक पीली उदासी से।

मैंने अपनी ख्वाहिशों को
लपेट लिया है अपने दुखते हुए माथे पर
यात्रा की सारी थकान उतर आई है
पैरों में और
उनके नीचे की ज़मीन 
दरकने लगी है रोज ब रोज।

मेरे सपनों के दरख़्त
ठूंठ की तरह खड़े हैं
मेरे हिस्से के वसंत की प्रतीक्षा में
सूखी पत्तियों की खड़खड़ाहट के बीच,
पक्षियों के उजाड़ घोसलों में
नहीं है कहीं कोई हलचल।

मैने अपने हिस्से की सारी धूप
लिख दी है
शहर की दीवारों पर
और मेरी सारी खुशियाँ
ऊंची मीनारों में क़ैद
लिख रहीं है 
आजादी का विदागीत।

पर मौत और ध्वंश के
इस कोलाहल के बीच
मैं जीवित हूँ और
मेरे जीने की सनद स्वरूप
जीवित है अभी
मेरी कविता भी।

"मैने अपने हिस्से की सारी धूप लिख दी है शहर की दीवारों पर और मेरी सारी खुशियाँ ऊंची मीनारों में, क़ैद लिख रहीं है, आजादी का विदागीत।"

मौन के मरुस्थल में

मौन इस तरह पसरा है चारो ओर
जैसे हवा में घुल जाए
कोई गंधहीन, रंगहीन
जहरीली गैस
हम निश्चेष्ठ पड़े हैं 
चेतनाहीन।

चुप हैं सारे ऋषि, मनीषी, ज्ञानी
जिनके ज्ञान के शोर से 
बहरे हो चुके हैं
पीढ़ियों के कान और
अंतरात्मा जा चुकी है गहन निद्रा में।

चुप हैं सारे कवि और सत्य के 
स्वधोषित महान गायक
सत्य जिसपर एकाधिकार था
केवल उन्हीं का,
मिट चुका है पुरस्कार और
उत्कोच का भेद
कवि चारणों में बदल गए हैं

उठायी थी कभी आवाज़
जिन सनकी लोगों ने
इस अशुभ सन्नाटे के विरुद्ध
चुप करा दिए गए हैं सदा के लिए 
या फिर सुनिश्चित कर दिया गया है
कि उनके स्वर आ न पाएं
प्राचीरों के इस पार तक।

बोलने का हक़ है
सिर्फ चापलूसों को
और उनका एकालाप
किसी मृत्युगीत सा
सृजित कर रहा है
सन्नाटे का मरुस्थल चारो ओर।

मौन के इस मरघट में
कोई नहीं कह रहा 
बाढ़ में डूबे जनसमुदाय की व्यथा,
अनकहा है आत्महत्या के गर्त में डूबे
किसानों का दुःख,
भूख और निराशा की
दारुण गाथा।

अब जब किया जा रहा है
आत्मा से प्राणों का सौदा
और सत्य का पक्ष
नहीं है जब किसी का भी पक्ष,
कुछ सिरफिरी आवाजें 
अब भी हैं प्रश्नों को स्वर देती।

"चुप हैं सारे कवि और सत्य के स्वधोषित महान गायक, सत्य जिसपर एकाधिकार था केवल उन्हीं का, मिट चुका है पुरस्कार और उत्कोच का भेद, कवि चारणों में बदल गए हैं"

 


श्रीविलास सिंह 
A-5 आशीष रॉयल टावर 
बीसलपुर रोड 
बरेली -243006

परिचय:

जन्म 05 फरवरी, 1962 को मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश में। शिक्षा इलाहाबाद विश्व विद्यालय से। संप्रति केंद्र सरकार की सेवा में बरेली में कार्यरत। 

कविताएँ, कहानियाँ और अनुवाद हंस, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, परिन्दे, प्राची, कविकुम्भ, बहुमत, वीणा, पाठ, विभोम स्वर इत्यादि पत्रिकाओं तथा समालोचन, पहलीबार, अनुनाद और इंद्रधनुष इत्यादि ऑनलाइन पत्रिकाओं/ ब्लॉग्स पर प्रकाशित। 'कविता के बहाने' और 'रोशनी के मुहाने तक' दो कविता संग्रह प्रकाशित। 'सन्नाटे का शोर' कहानी संग्रह और 'शब्द शब्द कविता' नोबेल पुरस्कार प्राप्त कवियों की कविताओं का अनुवाद शीघ प्रकाश्य।