पता नहीं क्यों
पता नहीं क्यों होता है मेरे साथ ऐसा कि
मैं लिखना चाहता हूँ प्रेम और
राजनीति लिख जाता है मेरी कलम से मैं
लोकतंत्र लिखना चाहता हूँ तो
महामारी से मरते हुये लोग लिख जाते हैं
कि धर्म लिखना चाहता हूँ जब
आपस में दंगा करने लगते हैं तमाम शब्द
और न्याय लिखने की कोशिश
न्यायाधीश की हत्या लिखी जाती है कहीं
कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य है
कि जैसे ही मैं लिखना चाहता हूँ पाखण्ड
और प्रधानमंत्री लिखा जाता है
दब्बूपना लिखने की पूरी-पूरी कोशिश में
रक्षा मंत्री लिख जाता है स्वत:
कई बार लोकपाल लिखने की कोशिश की
और अन्ना लिखा गया मेरे द्वारा
कि कालाधन लिखने की कोशिश में लिखा
गया सरकारी दल का भ्रष्टाचार
जैसे कि परसों मैंने लिखना चाहा हत्यारा
और मुझ से गृह मंत्री लिख गया
कल ही मैं लिखना तो चाहता था
डकैतों का गिरोह और सरकार लिख गया
मैं निर्मल गंगा लिखने का प्रयत्न करता हूँ
तो बहते हुये शव लिख जाते हैं
अभी अभी मैं राम लिखना चाहता हूँ यहाँ
किन्तु चंपत लिखा जाता है हाय!
"जैसे कि परसों मैंने लिखना चाहा हत्यारा और मुझ से गृह मंत्री लिख गया, कल ही मैं लिखना तो चाहता था, डकैतों का गिरोह और सरकार लिख गया"
सभ्य आदमी
झाड़ियों के झुरमुट में बेर तोड़ते हुये
अचानक निकले सर्प को
पूँछ पकड़ कर फेंक दिया उस लड़की ने दूर और
पके-पके मीठे बेरों से भर ली अपनी झोली
बकरियों पर
घात लगा कर बाड़े में कूदे
दोगले बघेरे की आँखों में घुसेड़ कर
जेळी के नुकीले सींग
भगा दिया पहाड़ की ओर
किन्तु चमचमाती गाड़ी से उतरे
महँगे कपड़ों में सजे
गले में सोने की चैन और अँगुलियों में अँगूठियाँ पहने
उस सभ्य आदमी से नहीं बचा सकी
स्वयं को वह लड़की
असहनीय पीड़ा से चीखती
विक्षिप्तावस्था में पिछले पन्द्रह दिन से
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी
और माता-पिता उसके
कितने अभागे कि
कुछ भी नहीं कर सकते थे उसके लिये
तलाश
मैं किसी ऐसे आदमी की तलाश में हूँ
जो मृत्यु से मिलता हो प्रतिदिन
किन्तु लौट आता हो जीवन के पास
जो पतझड़ को झेलने के बाद
अचानक वसंत की मस्ती में झूमने लगे
मैं किसी ऐसे आदमी की तलाश में हूँ
जो चिन्तायें करते हुये भी लगे निश्चिन्त
सपने देखने की आदत हो जिसे खुली आँखों
अपने सपनों को साकार करने की हिम्मत हो
और झेल सके जो सूरज की कड़ी धूप
पुरवाई की उम्मीद में बहा सके अपना पसीना
मैं किसी ऐसे आदमी की तलाश में हूँ
जो मरुस्थल में भटकते हुये गाता हो नदियों के गीत
और भौंथरे हथियारों को धार दे सके
अपने ही सवालों में खोया हुआ जो
जानना चाहे मानव-मुक्ति के सवालों कै जवाब और
दुर्गम यात्राओं को सुगम बना सके
मैं किसी कवि की तलाश में हूँ वाक़ई
क्या मैं स्वयं की तलाश में ही हूँ ?
"मैं किसी ऐसे आदमी की तलाश में हूँ, जो मरुस्थल में भटकते हुये गाता हो नदियों के गीत और भौंथरे हथियारों को धार दे सके."
आशंका के बावज़ूद
अकाल की आशंका के बावज़ूद
टिटहरी ने अण्डे दिये हैं पीपल की खोह में
दुपहरी भर
वह चिड़िया गर्म धूल से नहाती रही है
सूखी ज़मीन पर भी हल जोत दिये हैं किसानों ने
गृहिणियों ने नहाना-धोना किया है नियत
समय पर
अकाल की आशंका के बावज़ूद
बाग़वान ने रोप दीं चम्पा की छह-सात क़लमें
मैनें सरिस्का जाने के बारे में सोचा
युवाओं ने गोठ का कार्यक्रम बना लिया
लड़कियों ने खरीद लिये लहरिया-वसन
अकाल की आशंका के बावज़ूद
प्रेमियों ने वादा किया है
बरसात में मिलने का और
बाग़ियों ने
नदी घाटी में डाल दिये हैं डेरे
"अकाल की आशंका के बावज़ूद प्रेमियों ने वादा किया है, बरसात में मिलने का और बाग़ियों ने नदी घाटी में डाल दिये हैं डेरे."
पानी
ऐसे ही किसी घुटन भरे दिन की दोपहर में
वह पानी माँगने आयेगा तुम्हारे घर
और मैं जानता हूँ कि
तुम उसे मना कर दोगे क्योंकि
तुम्हारे पास भी सिर्फ़ चुल्लू भर पानी होगा
सुनो
अभी यह जो पानी बेकार बहा रहे हो तुम
उसी बादल का है
यहीं कहीं जीवन
अचानक खुल गईं आँख
मझ्झ रात में और
दुबारा सो गया सोचता हुआ कि
आँसुओं की सिंचाई से
उगाऊँगा कल
स्मृतियों की बंजर भूमि में
जीवन के बचे हुये बीज
किन्तु सुबह जागते ही फिर
जरूरी-से लगे
विस्मृतियों की राह पर सक्रिय
स्वर्णिम भविष्य के प्रयत्न
और अब
जबकि शाम ढलने को है तो
मैं इसी अधरझूल में हूँ कि
बहुत कठिन और
असंभव के बीच ज़्यादा जरूरी
क्या है ?
विप्लव में बची रह गई दूब
या कि अपने ही अँधेरों में भटकते हुये
जीवन की अन्तहीन तलाश
अभी बहुत दूर है शायद मृत्यु
और जीवन
यहीं कहीं मौज़ूद है आस-पास
"अचानक खुल गईं आँख मझ्झ रात में और दुबारा सो गया सोचता हुआ कि आँसुओं की सिंचाई से उगाऊँगा कल, स्मृतियों की बंजर भूमि में, जीवन के बचे हुये बीज"
भरपूर प्रेम
पीले छींटो वाली वह भूरी तितली
हमेशा सदाबहार के फूलों पर मंडराती है और
सफ़ेद धारियों वाली वह गुलाबी तितली
अक्सर कनेर के फूलों के पास आती है जबकि
काले रंग पर लाल बिन्दुओं वाली तितली
हर शाम गुलाब के फूल पर आ बैठती है
मैं बहुत दिनों से देख रहा हूँ उनका
अपने निश्चित फूलों की ओर उड़ कर आना
मुझे अपने लिये पक्के तौर से नहीं पता
लेकिन तुम शायद इन सभी रंगों वाली तितली हो
क्या मुझ में भी तुम्हें अहसास होता है
इन सभी फूलों की खुश्बू और रंगों का
क्या इसीलिये हम भरपूर प्रेम करते हैं हमेशा
कि छूट न जाये कोई रंग या खुश्बू
"मुझे अपने लिये पक्के तौर से नहीं पता लेकिन तुम शायद इन सभी रंगों वाली तितली हो. क्या मुझ में भी तुम्हें अहसास होता है, इन सभी फूलों की खुश्बू और रंगों का"
कैलाश मनहर
जन्म: 02 अप्रेल 1954
शिक्षा: एम.ए. (बी.एड)
(1) कविता की सहयात्रा में (2) सूखी नदी (3) उदास आँखों में उम्मीद (4) अवसाद पक्ष (5) हर्फ़ दर हर्फ़ (6) अरे भानगढ़़ (7) मुरारी माहात्म्य एवं (8) मध्यरात्रि प्रलाप (कविता संग्रह) तथा मेरे सहचर : मेरे मित्र (संस्मरणात्मक रेखाचित्र) प्रकाशित
प्रगतिशील लेखक संघ, राजस्थान द्वारा कन्हैया लाल सेठिया जन्म शताब्दी सम्मान, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, श्री डूँगरगढ़ द्वारा डॉ.नन्द लाल महर्षि सम्मान एवं कथा संस्था जोधपुर का द्वारा नन्द चतुर्वेदी कविता सम्मान प्राप्त।

