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| छवि श्रेय: आलोक मिश्रा |
प्रेम में असफल रहे प्रेमी
इन्होंने संभाला खुद को
और ज़्यादा कामों में उलझाकर
गोया धरती इनके नचाने से नाच रही हो
और ये रुक जाएँ तो बस सर्वनाश हो जाए
हंसते रहे अपनी आँखों की उदासी छिपाकर
चाँद से रही इनकी कट्टी-बट्टी कई-कई दिनों तक
फिल्में देखी भी तो कुछ न देखने की तरह
विरह के गीतों में जा समाए इनके सारे प्रेम पत्र
मिली उपेक्षाओं में याद आई इन्हें बार-बार माँ
मानने लगे पहली बार ये पिता की हिदायतें
उबारा इन्होंने खुद को बार-बार डुबोकर
और फिर करने लगे सबसे ही प्यार डूबकर
शादी की तो पत्नी को पलकों पर रखा
बच्चे हुए तो संग में बच्चे बने रहे
आस-पड़ोस सबमें बनकर हवा-पानी घुल गये
इतने घुल गये कि पूरा ही घुल गये
प्रेम में असफल रहे प्रेमी
जीते रहे मुकम्मल जिंदगी
खुद को छोड़कर
उसी एक मोड़ पर।
"प्रेम में असफल रहे प्रेमी जीते रहे मुकम्मल जिंदगी, खुद को छोड़कर उसी एक मोड़ पर।"
तुम्हारी देहगंध
मेरी स्मृतियों में जमी है
तुम्हारे साथ तुम्हारी देहगंध भी
तुम्हें याद करते हुए मैं
दरअसल महसूसता हूँ खुद में
तुम्हारी देहगंध को
देहगंध जो पसीने के संग
रेंगती है देह पर
हवा के संग उतरती है फेफड़ों में
और श्रम में सन कर
उपजाती है जिंदगी की शिला पर दूब हरियल
मैं तुम्हारी पसीने से सिंचित एक फूल हूँ
टीवी पर एक ख़ूबसूरत अदाकारा
गुज़ारिश कर रही है खरीदने को
एक कंपनी का पाउडर और परफ्यूम
जो मिटाकर देहगंध महकायेंगे अपनी ही खुशबू से
मैं दौड़कर बंद कर देता हूँ टीवी
झिड़क देता हूँ बाज़ार की एक साज़िश को
और डूब जाता हूँ
अपनी उसी स्मृति में।
"मेरी स्मृतियों में जमी है तुम्हारे साथ तुम्हारी देहगंध भी, तुम्हें याद करते हुए मैं दरअसल महसूसता हूँ खुद में, तुम्हारी देहगंध को"
धरती का प्रेम
रुलाकर अपने प्रेमी बादलों को
फिर हरिया गई है पृथ्वी
पृथ्वी क्यों करती है ऐसा?
जानते हैं बखूबी
महीनों की उपेक्षा के बाद आए बादल।
प्रेम में
बारिश कुछ और नहीं
समुद्र का उपहार है
प्रेमिका पृथ्वी के लिये
जो भेजता है वह अमूमन परदेस से
प्रेयसी के हृदय तक
न पहुँच पाने की कसक का खारापन
अपने हृदय में जज़्ब किये
और सिर्फ़ प्रेम का एक अमर फूल तोड़ लाने की इच्छा लिए
वह चल देता है हमेशा धूप के साथ
एक लंबी यात्रा पर
पर उसकी आत्मा छूटी रहती है यहीं
अपनी रत्नगर्भा को पकड़े हुए
हज़ारों-लाखों साल से
किनारों को बेतहाशा चूमते उसके होंठ
पाना चाहते हैं धरती की मौलिक मिठास
आँखें निहारना चाहती हैं उसका हरियल सौंदर्य
पर दूर जाकर ही समुद्र को मिलता है धरा के प्रेम का अवदान
परदेश से समुद्र भेजता है बादलों की चिट्ठी
उसमें रखके कड़कती बिजलियों सा अपना मन
शब्द झरते हैं बूँदें बन
अपने हिस्से की आग बेच-बेचकर
वह भेजता रहता है तोहफा बर्फ़ का
तृप्त होता है धरती का पहाड़ मन
फूटते हैं उसमें भावनाओं के झरने
बह निकलती है तृष्णाओं की लबालब सिक्त नदियाँ
जो चल देती हैं उमड़ते-घुमड़ते
रास्ते भर हरियाली बिखेरते
फूल खिलाते
मिट्टी की तासीर खुद में घोले
मिलने अपने प्रेमी से-समंदर से
पर प्रेम में मिलन कितना दुर्लभ है न!
समुद्र के घर धरती की नदियों को मिलता है
बस उसका पसरा हुआ खारापन
अपनी मिठास लिए वह तो गया है बहुत दूर
उसके लिए ही लाने
प्रेम का अमर फूल
नदियाँ किस मुँह से वापिस लौटें
वे डूबकर उसी के खारेपन में
इंतजार कर रही है बरसों से
यही पृथ्वी के प्रेम का प्रत्युत्तर है
कुछ प्रेमियों के मिलने का
संयोग नहीं आता।
"प्रेयसी के हृदय तक न पहुँच पाने की कसक का खारापन, अपने हृदय में जज़्ब किये और सिर्फ़ प्रेम का एक अमर फूल तोड़ लाने की इच्छा लिए, वह चल देता है, हमेशा धूप के साथ,एक लंबी यात्रा पर। पर उसकी आत्मा छूटी रहती है यहीं, अपनी रत्नगर्भा को पकड़े हुए"
चिट्ठियां
(१)
चिट्ठियों ने सिखाया हमें
प्रेम की सबसे पवित्रतम अभिव्यक्ति का कायदा
इन्हीं से जाना हमने
प्रतीक्षा के फैले रेगिस्तान में छिपे शीतल कूप का ठिकाना
और ये समझे हम कि
सब कुछ नहीं होता महज लिखे में
बल्कि शब्दों की डोर पकड़ उड़ना होता है
अनकही भावनाओं के आसमान में
हमने सीखे चिट्ठियों से ही
उन्हें सहेजने के कई-कई सलीके
कुछ को छोटे-छोटे टुकड़े कर हम उन्हें बिखेर देते थे खेतों में
उनमें उग आईं फसलों को सहेजते थे
चिट्ठियों में लिखे संदेश की तरह ही
कुछ को उड़ा देते थे हम हवा की दिशा में बिना पता-ठिकाना
छत पर चाँद आता था लेकर जवाबी चिट्ठी
जागती आँखें बांचती थी उसे तकिये पर टिकाये सारी रात
कुछ चिट्ठियां हमने रख ली संदूकों में संभालकर
कुछ मन की परतों में दबाकर
जो निकल आतीं हैं
हमारे अकेलेपन के अंधेरों में अभी भी
बनकर के रोशनी
(२)
कुछ चिट्ठियां कभी नहीं पहुँची अपने ठिकानों पर
कुछ लग गईं गलत हाथों में
कुछ के जवाब नहीं आए कभी
कुछ मन पर ही लिखीं गईं उतरी नहीं कागज़ पर
कुछ चिट्ठियों आईं अपने अंतिम होने की घोषणा के साथ
पर चिट्ठियां जहाँ भी रहीं जिस रूप में रहीं
जिंदगी की चाशनी से लिपटीं रहीं
चिट्ठियां जिंदगी के प्रेम में थीं
(३)
पिता परदेस रहते थे
अनपढ़ माँ गाँव में ही छूटी रही थी बरसों
पर मैंने देखा था कि
चिट्ठी बन कैसे जब-तब
पिता आ जाते थे गाँव
माँ चली जाती थी शहर
मैं छोटा था
लिखना-पढ़ना सीखा ही था
माँ मुझसे ही लिखवाती और पढ़वाती थी चिट्ठियां
बहुत सी बातें नहीं समझता था
पर पहचानता था
माँ की आँखों में उड़े जुगनुओं को
उनमें लहराती नदी को
चिट्ठी सुनते हुए थोड़ी देर रुक जाने और पंक्तियाँ दुहराने को उसका कहना
या लिखवाते हुए बोलते-बोलते चुप हो जाना खलता था मुझको
मैं इतना जानता था कि ये जुबान, कान या ध्यान का नहीं
कुछ और मामला है
आज तक याद है उसकी लिखवाई हर चिट्ठी की अंतिम पंक्ति-
'बाकी आप तो खुद समझदार हैं, थोड़ा लिखना बहुत समझना'
मैंने चिट्ठियों से ही जाना
कि कितना जरूरी है कुछ अनकहा रह जाना
चिट्ठियां मेरी पहली तालीम थीं
इस दुनिया और दूसरी दुनिया के बारे में।
(४)
इच्छाएं भी अजीब हैं
मोबाइल के इस दौर में भी मैं
अपने बच्चों को सिखाना चाहता हूँ चिट्ठी लिखना
जिसे लिखना सीखा था मैंने अपनी अनपढ़ माँ से
वो हर महीने लिखवाती थी चिट्ठी
परदेस गये पिता के लिए
मैं उन्हें बताना चाहता हूँ
प्रेम में शब्दों की कीमत
रोकना चाहता हूँ उनकी फिज़ूलखर्ची
और पैदा करना चाहता हूँ
थोड़े लिखे में ज्यादा समझने का माद्दा
मैं उन्हें देना चाहता हूँ
प्रेम में दूरी के गणित को सुलझाने का सूत्र
प्रतीक्षा की बागबानी को हरा रखने का सलीका
शब्दों को देर तक पकाने
उन्हें कागज़ पर परोसने
और दूर देश में अपनी प्रेमिका या प्रेमी तक पहुँचा पाने में लगे समय के कौतूहल को जीने का अवसर
जवाब आने की नाउम्मीदी में भी उम्मीद पालने का हुनर
चिट्ठियों के अलावा
कौन सिखाएगा उन्हें ये सब
क्या मोबाइल?
(५)
चिट्ठियां लौटती हैं 'हाँ' बनकर तो
प्रेमी खिल जाते हैं
प्रेमिका का पसंदीदा फूल बनकर
और यदि
वे आतीं हैं 'ना' बनकर
तो प्रेमी खाद बन जाते हैं
और घुल जाते हैं मिट्टी में
कि खिल सकें फुलवारियां।
(६)
सबसे ज़्यादा
परेशान होता हूँ ये सोचकर
कि चिट्ठियां लिखने और बांचने वाली
अंतिम पीढ़ी के लोग हैं हम
सोचता हूँ
चिट्ठियों के बिना ये दुनिया
कैसे रहेगी?
क्या प्रेम करने वाली अंतिम पीढ़ी हैं हम?
"हमने सीखे चिट्ठियों से ही उन्हें सहेजने के कई-कई सलीके। कुछ को छोटे-छोटे टुकड़े कर हम उन्हें बिखेर देते थे खेतों में। उनमें उग आईं फसलों को सहेजते थे चिट्ठियों में लिखे संदेश की तरह ही। कुछ को उड़ा देते थे हम हवा की दिशा में बिना पता-ठिकाना। छत पर चाँद आता था लेकर जवाबी चिट्ठी, जागती आँखें बांचती थी उसे तकिये पर टिकाये सारी रात।"
इत्र
उदासियों को उबालकर
पीने जा ही रहा था
कि तुम आ गईं
फिर मैंने समेटा
तुम्हारे आने से
हवा में बिंधी खुशबुओं को
उसे घोला
उबलती उदासियों में
इस तैयार इत्र से
महकूंगा उम्र भर।
सौंदर्य
दुनिया का समस्त सौंदर्य
उसकी आँखों में था
उसे जो भी दिखा
सुंदर दिखा।
तुम्हें बस खुद को उबारना है
मत बताना किसी लकड़हारे को
जंगल का महत्व,
उसकी आत्मा ने चखा है जंगलों का स्वाद
वह सखा है जंगल का।
हो सके तो लाकर देना उसे
नई कुल्हाड़ी।
नये जंगल उगाना तुम्हारा काम है।
किसी मछुवारे को मत देना
जीव-हत्या के पाप पर प्रवचन,
दे सकना तो देना लाकर उसे
फटते जाल के बदले कोई नया जाल।
छटपटाता है समंदर तड़पती हैं मछलियाँ
एक दिन भी न पाकर उसे,
उस दिन संमदर आ बसता है उसकी आँखों में
और मछलियाँ तैरने लगती हैं सपनों में।
तुम्हारे धर्म की जद से बाहर हैं कई सभ्यताएं।
उन्हें बाहर ही रहने दो।
किसी बच्चे से मत लेना
उसे दिये दस रूपये जेब खर्च का हिसाब।
तुम्हारी जोड़-तोड़ की मंशा से परे
खर्चा होगा उसने उसे,
दुनिया खूबसूरत बनाने में ही।
उसने खाई होंगी मीठी गोलियाँ
दोस्तों के साथ,
उछाला होगा एक सिक्का गली के मुहाने पर बैठी बुढ़िया की ओर,
खरीद कर अर्पित किये होंगे कुछ कंचे
धरती माँ को भी।
ध्यान रहे
तुम्हें दूसरों को नहीं
बस खुद को उबारना है।
"किसी मछुवारे को मत देना जीव-हत्या के पाप पर प्रवचन, दे सकना तो देना लाकर उसे फटते जाल के बदले कोई नया जाल। छटपटाता है समंदर तड़पती हैं मछलियाँ एक दिन भी न पाकर उसे, उस दिन संमदर आ बसता है उसकी आँखों में और मछलियाँ तैरने लगती हैं सपनों में।"
कुल्फ़ी वाला
खड़ी दुपहरी
ऊंघते घरों से घिरी
एकाकी गली में
तपती धरती पर
गर्म हवा को चीरते
आया है कुल्फ़ी वाला
कुल्फ़ी वाले के बड़े मटके में
कैद है पूरे का पूरा हिमालय
जिसमें भिनी हैं कई रंगों की मीठी नदियाँ
उन्हें देखते ही टपक रही है
खिड़कियों की लार
उसके आने की मुनादी करते बज रही है
उसकी रेहड़ी पर लटकी हुई घंटी
पर रेहड़ी पर नहीं
सबसे पहले बज रही है वो
बच्चों के कान में
खुल रहे हैं दरवाज़े
गली में बढ़ रही है रौनक
कुछ देर धड़ेकेंगी जिंदगियां यूं ही बाहर
बड़े तो हो जाएँगे जल्दी भीतर
पर बच्चे नहीं
चूसते और चुभलाते
कुल्फ़ियों में बची सूखी पतली लकड़ी
सूरज को दिखाते
वो भिड़ेंगे देर तलक लू से
एक कुल्फ़ी वाला
गुजर रहा है यूँ ही
तपते सूरज और गर्मी के खिलाफ़
क्रांति का बिगुल बजाते
बच्चों की बहादुर सेना लुहाते।
हिम्मत की लाठी
आया था एक दौर ऐसा भी
मेरी जिंदगी में
जब छूट गये थे उम्मीद के सारे सिरे
बुझ गये थे भविष्य के सभी जुगनू
ढह गये थे संकल्प के पहाड़
जो दे सके आश्रय
नहीं बचे थे ऐसे एक टुकड़ा भी
धरती और आसमान
उन दिनों रोजी-रोटी और जिंदगी की चिंता
चिपक गई थी मुझसे
मेरी अपनी ही चमड़ी बनकर
पर इन सबमें भी मैं टूटा नहीं
जूझता ही रहा था भांजते हुए हिम्मत की लाठी
हाँ एक बार हुई थी यह लाठी टूटने को
जब महसूस किया था मैंने एकाएक
अपने बच्चों के बड़े बन जाने को
भांप लिया था उनकी कुछ भी
नया पाने या खाने की इच्छा के लोप हो जाने को
उन दिनों को सोचकर
आज बदले हुए दिनों में भी
मैं पिलाता हूँ तेल
अपनी हिम्मत की लाठी को।
"उन दिनों रोजी-रोटी और जिंदगी की चिंता चिपक गई थी मुझसे, मेरी अपनी ही चमड़ी बनकर, पर इन सबमें भी मैं टूटा नहीं, जूझता ही रहा था भांजते हुए हिम्मत की लाठी"
कविता
(१)
कविता आती है अक्सर
आधी रात की बिल्ली बनकर
शब्द गिराती चली जाती है
अंतस के कोनों में जहाँ-तहाँ
हड़बड़ाया अधजगा अधसोया
शब्दों को बीनता
मैं भागता हूँ उसके पीछे
सुबह होने तक।
(२)
खेलते हैं लुकाछिपी
सारी रात सरे आसमान
कविता और चाँद
एकाएक लगती है कविता को भूख
ढूंढते हुए रोटी
वह सरक आती है
धरती पर
घर की मुंडेर तक आता है
पीछे-पीछे चाँद।
(३)
लड़की और कविता
दोनों होतीं हैं एक जैसी
उन्हें बांचते सब हैं
समझते बहुत कम हैं।
(४)
गिलहरी की तरह
सरसराती, फरफराती
मेरे आसपास से
निकल-निकल जाती रही कविता
और जब आई उसकी
नरम गुदगुदी काया मेरे हाथ
मेरी आत्मा में भर गया उजास
फिर मैंने उसे विलीन होते देखा
हरियल पेड़ की फुनगी बन।
"लड़की और कविता दोनों होतीं हैं एक जैसी, उन्हें बांचते सब हैं समझते बहुत कम हैं।"
सवाल
दूर रहते हुए स्मृतियों में जब भी माँ आई
मन मैं कौंध गया-
बचपन का घर
घर का एक-एक कोना
चौरे पर लगाई उसकी तुलसी
सहेज कर रखी हुई पुरातन से भरी लोहे की संदूक
उसकी गंध से गमकता वह पुराना चौका
हथेली छपी सोंधी-सोंधी रोटियाँ
आसमान जैसी ही लाल गोटे वाली उसकी आसमानी साड़ी
बंधुवा सी बीतती उसकी पूरी दिहाड़ी
और न जाने क्या-क्या
मुझे हैरानी है कि
माँ के नाम पर ये सब चले आए स्मृतियों में
पर माँ कभी क्यों नहीं आई
'स्मृतियों में माँ क्यों नहीं आती?
माँ के नाम पर हमारी सहूलियतें ही क्यों आतीं हैं याद हमें?'
ये सवाल है एक सभ्यता का खुद से ही।
"'स्मृतियों में माँ क्यों नहीं आती? माँ के नाम पर हमारी सहूलियतें ही क्यों आतीं हैं याद हमें?' ये सवाल है एक सभ्यता का खुद से ही।"
◆आलोक कुमार मिश्रा
◆जन्म तिथि:- 10 अगस्त 1984
◆जन्म स्थान:- ग्राम- लोहटा, पोस्ट- चौखड़ा, जिला- सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश में एक गरीब किसान परिवार में
◆शिक्षा:- दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए (राजनीति विज्ञान), एम एड, एम फिल (शिक्षाशास्त्र)
◆वर्तमान निवास स्थान:- मकान नंबर 280, ग्राउंड फ्लोर, पॉकेट 9, सेक्टर 21, रोहिणी, दिल्ली 110086
◆व्यवसाय:- दिल्ली के सरकारी विद्यालय में शिक्षक (पी जी टी, राजनीतिक विज्ञान) के पद पर कार्यरत।
◆रुचि:- समसामयिक और शैक्षिक मुद्दों पर लेखन, कविता-कहानी लेखन, कुछ पत्र- पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं जैसे-जनसत्ता, निवाण टाइम्स, शिक्षा विमर्श, कदम, कर्माबक्श, किस्सा कोताह, परिकथा, मगहर, परिंदे, अनौपचारिका, वागर्थ, हंस, इन्द्रप्रस्थ भारती आदि में।
◆बोधि प्रकाशन से कविता संग्रह 'मैं सीखता हूँ बच्चों से जीवन की भाषा' (2019) कविता संग्रह प्रकाशित।
हाल ही में प्रलेक प्रकाशन से बाल कविता संग्रह 'क्यों तुम सा हो जाऊँ मैं' प्रकाशित।
मोबाइल नंबर- 9818455879
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