नयनों को करती सजल

छवि श्रेय: सम्राट सुधा








नयनों को करती सजल 

नदिया से पूछना 
बादल से नाता क्या है 
तेरी प्यास का !

उठकर चलना सभी 
जानते है पग-पग मगर
बात तो ध्येय से जुड़ी 
चुनते हैं कैसी डगर 
पाखी से पूछना 
पवन से नाता है क्या 
तेरी उड़ान का !

रूह का कालापन 
हाथों में कब उज्ज्वल
मन की पावनता 
नयनों को करती सजल
सृजक से पूछना 
शब्दों से नाता है क्या
तेरी कमान का !

दीप के नाम लिखी 
बाती की सब रोशनी 
किसने स्नेह को कहा
श्वासें कितनी बची
ज्योति से पूछना 
तमस से नाता है क्या 
तेरी आस का !


मन में सावन

पेड़ की जड़ में हैं दीमकें 
और हम पत्तों में फल ढूंढते हैं !

छाँव का बैनामा उनके नाम सारा 
हम धरा को पूजने के अभिशप्त हैं
बेच वे चुके हैं खलियान-बाग सारा 
हम अभी उपासना में व्यस्त हैं
लद चुकी फसल गाड़ियों में उनकी
और हम भूसे में अन्न ढूंढते हैं !

व्यर्थ में बदनाम बुरा आदमी है
आग ये कई अच्छों से लगी है
आँख मूँदकर नहीं बैठा कोई है
पत्ती सबके नाम की खाता चढ़ी है
भर गयीं तिजोरियां चोरों की सारी
और हम गुल्लक में धन ढूंढते हैं !

झूठ की हर नाव कीचड़ में धंसी है
सच की एक पतवार काफ़ी तैरने को
तोड़ देगी चोट एक दिन ताज सारे 
शेष ना होगा कोई फिर डूबने को 
वे अभी बेमन सूखे डोलते हैं
और हम मन में  सावन झूलते हैं ! 


नव आराधन होता है

शीतल बहती गंगा में
ज्यों भक्त कोई स्नान करे  
तुमसे मिलकर तन में मेरे 
यूँ रक्त बहा मेरे साथी
टिम-टिम करते इस दीपक में
स्नेह-धार तुमने डाली  
बुझते-बुझते इस दीपक की 
जलने लगी नयी बाती !

युग-युग के संबंध है कहना 
मुझे ज़रा कम लगता है  
मुझको तो ऐसा लगता 
ये पंचतत्व के नाते हैं
जब ना थे हम तब भी ये 
इस धरती पर गूंजे थे  
जिनको अब हम अपने कहकर
महफ़िल-महफ़िल गाते हैं 
जैसे किसी गान को कोई 
धुन सुंदर-सी मिल जाती 
तुमसे मिलकर तन में मेरे 
यूँ रक्त बहा मेरे साथी !

जब होती है आस मिलन की 
तब बातें भी होती हैं 
जब मिलते हैं तब ना जाने 
बात कहाँ खो जाती हैं 
वो जो मौन घना होता है  
मौन कहाँ रह पाता है 
उस चुप्पी में दिल की सारी 
बातें तो हो जाती हैं 
जैसे किसी सीप को कोई  
बूँद स्वाति की मिल जाती
तुमसे मिलकर तन में मेरे 
यूँ रक्त बहा मेरे साथी !

गंगातट पर जो जाये
पल घड़ी मुहुर्त देखे है 
यहाँ तुम्हारी याद में हर पल 
एक तीर्थाटन होता है 
वहाँ स्तुति होती है  
सुबह-शाम के आने पर  
यहाँ तुम्हारी याद में क्षण-क्षण
नव आराधन होता है
जैसे सागर में कोई 
बूँद वारि की मिल  जाती 
तुमने मिलकर तन में मेरे 
यूँ रक्त बहा मेरे साथी !


कहीं तो आख़िर प्रात है

रात काली हो मगर 
रात फिर भी रात है 
है प्रभु की कृपा 
कहीं तो आख़िर प्रात है 
तू जो घिरते तिमिर से 
घबरा गया -सहम गया
रात काली बीतते 
महका हुआ प्रभात है ! 

ऊँचा कितना ही गगन में 
पाखी उड़े मगर उसे  
अपना नन्हा नीड़ तो
धरा पे गढ़ना होता है 
एक गोदी का सफ़र 
अपने पांवों गुज़र 
अंत में फिर भी मगर  
चार कांधों पे पूरा होता है 
हमने हर गुत्थी कहा  
सुलझ गयी- सुलझ गयी 
जिंदगी क्या मगर
ये राज़ फिर भी राज़ है !

मुट्ठियों में रेत-सी 
रिस रही है जिंदगी 
और लंबी उम्र की
 हो रही है बंदगी  
सांस-सांस थक गयी 
पर कदम चलते  रहे
आस्था के लाख सूरज
नित नये उगते रहे  
घोर मरुथल था 
खड़ा प्राण हरने के लिए
पर किसी को पाने की  
प्यास फिर भी प्यास है !

मरहमों का देवता 
हर नगर-डगर मिला 
माँ के दुलार-सा '
रफ़ूगर' पर नहीं मिला 
एक जुलाहा 'ढ़ाई आखर'  
कह के पंड़ित हो गया 
एक ज्ञानी उम्र- भर
प्यार ढ़ूढ़ता फिरा 
मरघटों पे जिंदगी  
कह रही मैं कुछ नहीं 
और इन्सां सोचता है 
 ये भी कोई बात  है !


और एक तुम

साँझ का नव क्षितिज
चाँद है 
और एक तुम !

जो निकट नहीं भला
नाता है 
नाता तो क्या 
एक है समूह चला
एक है व्यूह बहा 
चेतना का द्वार हो
रिक्त अनुपम भावों से
तो भला क्या अर्थ है 
बोल के  निबाह से 
जग का नव बन्ध है
बाँध है
और एक तुम !

अंजुरी - रेखाओं में
शुभत्व की हल्दी भरी 
मद्धम प्रति चरण पर 
उजास की परी उड़ी 
क्रीड़ाएं काल की अज्ञात हैं
क्या विचारना 
आत्मा की शुभ्रता ने 
दिशाओं की मांगें भरीं
दृष्टि के कोर में
अन्य कोई भी नहीं
हृदय है
और एक तुम !

आस के आँगन में
भावना के तुलसीदल 
पात्र का प्रत्येक जल
आचमन में गंगाजल
पर्वतों पर देव बैठे 
दे रहे हैं दृष्टि किरण 
अदृश्य नेह का 
यह हुआ अनुपम मिलन 
है समक्ष भ्रम
परन्तु पूर्णिमा का गगन
ज्योत्स्ना है 
और एक तुम !


तुझ-सी विराट ना मिली

धागे 
टटोले दूर तक 
कोई गाँठ ना मिली !

हथेली से 
हथेली मिलायी 
रेखाएं सब थीं अलग 
मिलन- मिलाना युक्ति कहाँ 
मिलते चाहता जिन्हें रब 
कहनी- सुननी  समेटी 
कोई बात ना मिली !

व्याकुलता 
मन विवशता भर है 
शेष पाना क्या है 
पोथी उठाये - उठाये 
जलती चिता  देखी 
सोचा 
जाना है क्या 
गुज़री  
ढूंढी बहुत 
कोई साँस ना मिली !

साधनाएं 
जो भी हैं 
तेरे- मेरे प्रेम से छोटी हैं सब 
तृप्ति
एक गोद तेरी 
शेष तृष्णाएँ हैं सब 
सत्ताएं सब देखीं 
तुझ-सी  विराट ना मिली !


प्यास देखता हूँ 

मछुवे ने मीन देखी जल में 
और मैं 
प्यास देखता हूँ !

नीर ना देख 
आया कहाँ से बहता 
वो बीज देख 
ओस की नन्हीं बूँद 
पथिक है कहाँ से तक 
अभ्यास देखता हूँ !

घटनाएं 
घटित हैं 
और घट घटने लगे हैं 
सागर की चाहतों के 
घन 
फिर घुमड़- घुमड़ 
जल भरने लगे हैं 
रीते मन का लगन से 
अडिग विश्वास देखता हूँ !

यूँ तो कटी , कट ही जाती 
तुम हो  तो 
जेठ  दोपहरी 
 पूरा चाँद महका- महका खिला 
अक्षत-रोली-दीप- घृत 
कुछ भी नहीं है 
कितनी बार आये तुम संग 
वो श्वास देखता हूँ !


◆डॉ. सम्राट् सुधा
◆जन्म : 6 जून, 1970
◆प्रकाशन : वर्ष 1985 से राष्ट्रीय पत्र- पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशित।
◆प्रसारण : आकाशवाणी व बी. बी. सी. लन्दन रेडियो। सृजन ऑस्ट्रेलिया         
  ई-पत्रिका द्वारा आयोजित ऑन लाइन अन्तर-राष्ट्रीय कविसम्मेलन में कविता प्रस्तुत ।
◆ पुस्तक :  (1) उत्तर आधुनिकता - भूमंडलीकरण तथा शशि- काव्य
                  (2) प्यास देखता हूँ ( काव्य- संग्रह )
                  (3) प्रतिबिंब काव्य संग्रह ( सम्पादित )

◆पुरस्कार:  संचेतना सम्मान-2002
                  शब्दश्री सम्मान -2021

◆सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ( हिन्दी)
● संपर्क : 94(नया - 130) पूर्वावली, गणेशपुर, रुड़की-247667, उत्तराखंड
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