स्वीकार

छवि श्रेय: सुघोष मिश्र









स्वीकार

सुन्दर मैं नहीं
यह जगह की सुन्दरता है
या है तुम्हारी दृष्टि –

प्रशंसा को इतनी तटस्थता से 
स्वीकार किया जाना चाहिए,

यह तुमसे सीखा मैंने
तुम्हें स्वीकार करते हुए।

सुन्दर मैं नहीं; यह जगह की सुन्दरता है या है तुम्हारी दृष्टि –

स्वतंत्रता

प्रात-गात से किरन एक
उछल आई खिड़की से
फुदकती शिशु चिड़िया-सी 
बढ़ा हहाकर, चाहकर भी
नहीं छू पाया उसे स्नेहवश 
बैठकर टटोलता रहा जहाँ-तहाँ 
नन्हीं उंगलियाँ उसकी, पकड़ नहीं आईं 
एक सीमा तक दौड़ी
फिर सिमट चली गई
वापस खिड़की से बाहर
भीतर दीप्ति रह गई


बहनें

बहनें जब हँसती हैं
खिल उठता है घर आँगन दिल 
गया वसंत लौट आता है बग़ीचे में 

बहनें जब रोती हैं
उदास फूल टूटते हैं रात भर 
सुबह चुनकर उन्हें वे चढ़ा देती हैं मंदिर में 

बहनें जब विदा हो जाती हैं
हँसना रोना भी चला जाता है साथ 
वे रह जाती हैं फूल कुमारियों वाली छवियों में 

"बहनें जब रोती हैं, उदास फूल टूटते हैं रात भर, सुबह चुनकर उन्हें वे चढ़ा देती हैं मंदिर में"

आमी नदी

कंधे पर बस्ता लटकाती थी 
आमी पार की साँवली लड़की 
पहनती थी 
नीला सूट और सफेद सलवार

कन्या विद्यालय से लौटते वक़्त 
अक्सर मिलती थी 
उससे पुलिया के पास 
वह भी 
साइकिल की घंटी बजाते आता था 
बस्ते में साथ लाता था 
भुनी मूँगफलियाँ 
किस-मी टॉफियाँ 
आमी में पैर डाल कर 
बैठते थे दोनों 
बुनते रहते थे ढेरों सपने 
पुलिया से आगे 
अलग हो जाते थे उनके गाँवों के रास्ते

एक दिन सुनने में आया
लड़की के पिता ने मारा-पीटा उसको  
क्योंकि उसने किया था प्रतिवाद 
उसे अभी और था पढ़ना 
नहीं करनी थी शादी-वादी किसी से
सिवाय उसके
कई दिनों तक सूना रहा आमी का किनारा

परीक्षाओं से कुछ पहले
स्कूल के अंतिम दिन 
दो गाँवों में दो घर तकते रहे राह
नहीं लौटे दो पंछी 
अपने नीड़ में 
सुबह लोगों ने देखा 
पुलिया के पास पड़े थे
दो बस्ते और दो जोड़ी चप्पल

आमी आज भी बहती है 
हमेशा की तरह शांत 
किंतु उसके किनारे हो रहे हैं 
और रेतीले
जल होता जा रहा 
और भी काला  
दिन प्रतिदिन 

आमी आज भी बहती है हमेशा की तरह शांत, किंतु उसके किनारे हो रहे हैं और रेतीले, जल होता जा रहा और भी काला  दिन प्रतिदिन 

अनुशासन

स्वतंत्रता की अधिकता से उपजती है उच्छृंखलता 
यांत्रिकता लील जाती है स्वाभाविकता को 
गतिशीलता क्षीण होकर जड़ता बन जाती है 
अश्लीलता से पुष्ट होती है कुरूपता 
जीवन सिर्फ़ आस्था और तर्क से नहीं चलता 
कोई सिद्ध मंत्र और गणितीय सूत्र भी नहीं 
जिससे हल हो जाएँ सारी समस्याएँ 

विचारों की बौंछार से सूख जाता है दर्शन 
स्थापनाओं में कहीं पीछे छूट जाता है सत्य 
दृष्टांतों के बोझ तले टूट जाती है प्रामाणिकता 
क़ानून से अधिकारों की रक्षा होती है 
क़ानून में ही उड़ाई जाती हैं उसकी धज्जियाँ 
निर्णय से न्याय की उम्मीद होती है 
निर्णय में ही होती है अन्याय की प्रबल संभावना 
अतियों से बर्बाद हो जाता है सुख 
अतियों में ही संगठित होते हैं दुःख 

अनुशासन एक दुर्लभ फूल है काँटों से घिरा 
मनुष्य मात्र धैर्यपूर्वक हो सकता है उसका संगी 
वह एक सौंदर्य है–जीवन के लिए–एक गुण 
आधिक्य से भटक जाती है उसकी यात्रा 
आधिक्य में ही रूपांतरित हो जाता है वह कट्टरता में 

द र अ स ल 
‘कहीं से कहीं तक होकर’ भी वह ‘नहीं है’ 
यह सृष्टि कितनी अनुशासित है 
और कितनी अनुशासनहीन 

धर्म बहुत अनुशासित होकर 
अधर्मियों का रक्षक बन जाता है 
भक्ति बहुत अनुशासित होकर 
बन जाती है करुणा की शत्रु 
ज्ञान बहुत अनुशासित होकर 
आतंकियों का संगी बन जाता है 
चिकित्सा बहुत अनुशासित होकर 
बन जाती है मरीज़ों के लिए विपदा 
नेतृत्व बहुत अनुशासित होकर 
हत्यारों का समूह बन जाता है 
राष्ट्र बहुत अनुशासित होकर 
बन जाता है असहमतों का वधस्थल 

ऐसे समय में 
जब संसार के सबसे ताक़तवर लोग 
दिन का अधिकांश समय 
बहुत अनुशासित होकर 
शासितों की अपूर्व सेवा में गुज़ारते हैं 
मैं तनिक अनुशासनहीनता करूँ 
और कविता में कहूँ तो– 

दुनिया बहुत अनुशासित होकर 
घड़ी बन जाती है 
और तंत्रों की आवाज़ें टिक-टिक 
दुनिया के तमाम लोग 
अपने-अपने देशों में 
अपनों से ही पीछे छूटते जाते हैं 
सड़कों पर पिटते हैं, भूख से लड़ते हैं 
गोलियों और बमों के छर्रों के बीच 
संयोगवश रह जाते हैं सकुशल 
नफ़रत, अन्याय, विश्वासघातों से 
यदि नष्ट नहीं होते हैं 
सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हमलों से भी 
बच निकलते हैं तो– 
घरों, अस्पतालों, तंबुओं या शरणार्थी शिविरों के 
अपने-अपने कमरों में क़ैद 
बहुत अनुशासित तरीक़े से 
मनुष्यता की रक्षा के लिए 
मरते 
जाते 
हैं 

"अनुशासन एक दुर्लभ फूल है काँटों से घिरा, मनुष्य मात्र धैर्यपूर्वक हो सकता है उसका संगी, वह एक सौंदर्य है–जीवन के लिए–एक गुण, आधिक्य से भटक जाती है उसकी यात्रा, आधिक्य में ही रूपांतरित हो जाता है वह कट्टरता में"

चौराहे पर लड़की

ठेले पर लादे कबाड़ 
चला जा रहा था एक कबाड़ी 
अनुत्सुक निर्विकार 
जैसे दुःख जीवन को ठेलता जाता है 
किसी गंतव्यहीन पथिक-सा गुमसुम 
वह सिर्फ़ चला जा रहा था 

पीछे कबाड़ पर लेटी थी एक लड़की 
बादलों के टुकड़ों पर चील ज्यों चिपकी 
या दुर्गा जैसे कालरथ पर सवार 
देखने निकली हो लीला जग की 
किंतु वह तो बेटी थी कबाड़ी की 
फटे सलवार से झाँकते 
अपने उघरे हुए नितंब से बेख़बर 

पूरे चौराहे से गुज़रती हुई वह 
कभी लंबी पीक बन बिखरी 
कभी कसैले धुएँ-सी उड़ी 
कभी मोटे हाथों तले आटे में गुँथी 
कभी दाल के तड़के में छौंक दी गई 
कभी समोसे-सी गई तली 
कभी सीरे में डूबी मिठाई बनकर 
कभी चाटी गई आइसक्रीम की तरह 
कभी चुइंगम-सी चबा ली गई 

वह छोटी-सी लड़की 
मैं उसका पिता नहीं पर मेरी वह बच्ची 
करुणाहीन आँखों में वासना-सी जली 
और सबसे विकृत हँसी से बुझाई गई 

वह इन्हीं अर्थों में नष्ट हो रही थी 
उसे इन्हीं अर्थों में विस्तार मिल रहा था 
कि वह आगे बढ़ गई 
और फिर इस दृश्य में 
पीछे किसी स्त्री का प्रवेश हुआ 

"ठेले पर लादे कबाड़ चला जा रहा था एक कबाड़ी, अनुत्सुक निर्विकार, जैसे दुःख जीवन को ठेलता जाता है, किसी गंतव्यहीन पथिक-सा गुमसुम, वह सिर्फ़ चला जा रहा था"

बहिष्करण

मैं बाधा की तरह नहीं आया 
किसी के पास 
न ही बना किसी के गले की फाँस, 
मैं भूखा भटकता था बदहवास 
शब्दों की राह पर नंगे पाँव 
तलाशता कोई रूप-रंग नंगी आँख। 

जब वे भाषा की इज़्ज़त उतारते दिखे 
मैंने उन्हें सिर्फ़ स्याही का मूल्य बताया— 
उन्होंने कहा उनके पास इतनी स्याही है 
जिससे शब्द क्या आदमी तक ऊब जाए! 
इतना कीचड़ कि भाषा तक डूब जाए! 
फिर शुभेच्छा क्या बधाई तक ख़ूब आए! 

मैं उनसे डरा नहीं इस अर्थ में पहचाना गया 
सिरफिरा शराबी हूँ ऐसे तो जाना गया 
शब्दों की राह पर पहचान भी एक पड़ाव है : 
अक्षरों के साथ वस्त्र तक छीन लेने वाले 
लुटेरों ने मुझे यह हँसते हुए बताया— 
वंचित के लिए रेखांकित होना भी एक उपलब्धि है, 
मेरी देह पर पड़ी खरोंचे देखकर 
कह उठे किनारे पड़े हुए अंधे और भिखारी दीन— 
सिर्फ़ आँखों और हाथ के साथ ज़िंदा रहना है कठिन। 

मैंने उनसे तमाशे दिखाने को नहीं कहा 
फिर भी क्रांतिकारियों की कलाबाज़ियाँ 
और कलावादियों की किलकारियाँ देख हैरान रह गया, 
उनसे और न जाने किनसे भरसक बचता हुआ भागता रहा 
एक गड्ढे के मटमैले पानी में अपना ही चेहरा न पहचान सका 
फिर वे इस भ्रम में रहे कि मुझे मार दिया गया 
मैं इस भ्रम में रहा कि मैं बाल-बाल बच गया 
किंतु एक जासूस था मेरे पीछे धूल पर पदचिह्न तलाशता हुआ 
एक सरकार थी जिसने मुझे पाँव काट लेने का सुझाव दिया। 

मैं बच जाने के बाद भी सुरक्षित न रह सका 
आदर्शों और श्रेष्ठताओं से सनी गंदगियों में 
पक्षधरता न तय करने से 
मुझे संदिग्ध बताया गया 
दिशाहीन क्रांतियों और खोखली नारेबाज़ियों के शोर में 
चुप रहने के अपराध में 
मुझे नज़रबंद कर दिया गया, 
एक मुरझाया फूल उठा कर सूँघ लेने पर 
मेरी नाक काट दी गई 
एक सूखे पत्ते को जेब में रख लेने पर 
मुझ पर चोरी का आरोप तय हुआ 
बेख़ुदी में प्रेम की गई एक स्त्री का नाम पुकार लेने पर 
मुझे चरित्रहीन कहा गया— 
किंतु मेरे हृदय से उसका तीन अक्षरों का नाम न मिट सका 
उतने ही अक्षरों की क़लम और उँगली भी रह गई सही-सलामत, 
मेरे तीन अक्षरों के इस व्यर्थ नाम के लिए 
दूर कुछ अकादमियों, संस्थाओं, और विश्वविद्यालयों में 
पर्याप्त स्याही पहले ही मौजूद थी… 

अफ़साने ज़रूरी हैं या अफ़सानानिगार 
पत्रिकाएँ ज़रूरी हैं या पत्रकार 
रास्ते ज़रूरी हैं या रोज़गार 
यह मैं भटकते हुए खो जाने पर समझ पाया 

जिन्होंने मुझे नफ़रत करना सिखाया 
उन्हें मैंने कोई क्षति नहीं पहुँचाई 
वे सिर्फ़ मेरे प्रेम से वंचित रहे। 

"अक्षरों के साथ वस्त्र तक छीन लेने वाले लुटेरों ने मुझे यह हँसते हुए बताया- वंचित के लिए रेखांकित होना भी एक उपलब्धि है, मेरी देह पर पड़ी खरोंचे देखकर, कह उठे किनारे पड़े हुए अंधे और भिखारी दीन- सिर्फ़ आँखों और हाथ के साथ ज़िंदा रहना है कठिन।"


सुघोष मिश्र
जन्मस्थान: मगहर, संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश)
स्नातक और परास्नातक: इलाहाबाद विश्वविद्यालय
एम.फिल.: हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
पीएच.डी.: हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय 
ईमेल: sughosh0990@gmail.com

सुघोष मिश्र हिंदी की नई पीढ़ी के सुपरिचित कवि-लेखक, अनुवादक व आलोचक हैं, नाटक लेखन में भी सक्रिय। पत्रिकाओं और ऑनलाइन वेब पोर्टलों पर कविताएँ और लेख प्रकाशित। विभिन्न स्थानों पर कविता पाठ एवं युवा आयोजनों में सहभागिता।