![]() |
| छवि श्रेय: आशु मिश्रा |
वो एक शख़्स अगर महव-ए-इंतज़ार न हो
वो एक शख़्स अगर महव-ए-इंतज़ार न हो
सफ़र से आए हुओं में मेरा शुमार न हो
क़ुबूल कर के इसे राब्ता बहाल करो
कहीं ये फूल मेरी आख़िरी पुकार न हो
तेरे जमाल ने सूरज को रौशनी दी है
सो कौन है जो यहाँ तेरा क़र्ज़दार न हो
वो तेग़-ए-चश्म मेरे सामने है और उसका
ख़ुदा करे कि कोई दूसरा शिकार न हो
तमाम रात की बेदारियों से लगता है
हमारा ख़्वाब किसी आँख पर उधार न हो
तो मान लीजिए वो दर उस अप्सरा का नहीं
जहाँ क़तार में शामिल ये ख़ाकसार न हो
"तेरे जमाल ने सूरज को रौशनी दी हैसो कौन है जो यहाँ तेरा क़र्ज़दार न हो"
दिलों में घाव दिये आँखों में बहाव दिया
दिलों में घाव दिये आँखों में बहाव दिया
हवा-ए-हिज्र ने हर शाख़ को झुकाव दिया
उस आफ़ताब ने इक रोज़ मेरी नज़्म पढ़ी
और उसके बाद बहुत आईने को भाव दिया
वो सर्द हिज्र मेरी जान पर बन आया तो
किसी ने धूप किसी दोस्त ने अलाव दिया
तुम्हारे बाद तुम्हारी कमी खली जब भी
तो मैंने आँख को तस्वीर का सुझाव दिया
ये बात ठीक है तन्हा हूँ मैं सर-ए-मंज़िल
मगर सफ़र में कई बाहों ने पड़ाव दिया
हवा-ए-सर्द है मैं भी हूँ और रात भी है
अब इंतज़ार है किसका चलो बुझाओ दिया
"तुम्हारे बाद तुम्हारी कमी खली जब भीतो मैंने आँख को तस्वीर का सुझाव दिया"
जहाँ सभी को ख़ुशी से गले लगाया गया
जहाँ सभी को ख़ुशी से गले लगाया गया
हमारा हाथ मिलाना हवस बताया गया
तुम्हारे आने से पहले खुला मकान था दिल
तुम्हारे बाद भी दरवाज़ा कब लगाया गया
भरोसा इश्क़ की पहली जवाबदारी है
गई जो धूप उधर तो इधर से साया गया
ज़ियादा रौशनी आँखें बुझा भी सकती थी
सो उसके आने से पहले दिया बुझाया गया
न एक पल को कभी दिल की राह सूनी हुई
तुम्हारे बाद तुम्हारा ख़याल आया-गया
हमारी नफ़रतें दो-फाड़ कर गईं घर को
मगर ये फैसला दीवार का बताया गया
"ज़ियादा रौशनी आँखें बुझा भी सकती थीसो उसके आने से पहले दिया बुझाया गया"
सुनती है मेरी बात तलबगार की तरह
सुनती है मेरी बात तलबगार की तरह
दीवार साथ दे रही है यार की तरह
इस बार टहनियों पे तेरे ग़म नहीं खिले
मैंने तो देख-रेख की हर बार की तरह
जिस इक सबब से रातें मेरी पुर-सुकूँ रहीं
वो तुम थे दोस्त सुब्ह के आसार की तरह
कहने को कोई इश्क़ यहाँ आख़िरी नहीं
पर पहला प्यार हमने किया प्यार की तरह
मिलता है तेरी दीद का तिनका कभी-कभी
हम डूबते दिलों को मदद-गार की तरह
जिसमें मैं ख़ुद नहीं हूँ उसी हाफ़िज़े में दोस्त
तुम रह गए हो मीर के अश'आर की तरह
"कहने को कोई इश्क़ यहाँ आख़िरी नहींपर पहला प्यार हमने किया प्यार की तरह"
सफ़र में लुत्फ़ के इमकान खींच लेती है
सफ़र में लुत्फ़ के इमकान खींच लेती है
सड़क की भीड़ मेरा ध्यान खींच लेती है
अगर जो दिन में उदासी से जी चुराऊँ तो
हवा-ए-शाम मेरे कान खींच लेती है
ऐ बे-तकुल्ल्फ़ी में हाथ खींचने वाले
ये खींच-तान मेरी जान खींच लेती है
मैं उससे गुफ़्तगू बे-रोक-टोक चाहता हूँ
वो जिसकी ख़ामुशी तक ध्यान खींच लेती है
तुम्हारी याद ब-ज़ाहिर तो रौनक़-ए-दिल है
मगर ये होंटों से मुस्कान खींच लेती है
"सफ़र में लुत्फ़ के इमकान खींच लेती हैसड़क की भीड़ मेरा ध्यान खींच लेती है"
दिल को पनाह चाहिए पर आपकी नहीं
दिल को पनाह चाहिए पर आपकी नहीं
मैं फूल बेचता हूँ मगर हर गली नहीं
उन आहुआन-ए-दश्त के दिल पर हमारा नाम
पहला अगरचे हो भी मगर आख़िरी नहीं
जिनको दिलों से पहले बदन की तलाश थी
उनको चराग़ मिल गए पर रौशनी नहीं
उसकी गली में जा तो रहे हो मगर सुनो
वो शोख़ खिड़कियों से कभी झांकती नहीं
सच ये भी है कि सारे मुसाफ़िर उतर गए
सच ये भी दिल की रेल कहीं पर रुकी नहीं
ये लफ़्ज़ मेरे बाद भी रह जाएंगे यहाँ
सो आख़िरी सफ़र भी मुझे आख़िरी नहीं
"उसकी गली में जा तो रहे हो मगर सुनोवो शोख़ खिड़कियों से कभी झांकती नहीं"
किसी से रोज़ का झगड़ा कसक भी लाता है
किसी से रोज़ का झगड़ा कसक भी लाता है
यही तनाव तअल्लुक़ में शक भी लाता है
चराग़ बुझने का शिकवा मैं इससे कैसे करूँ
ये झोंका बारहा तेरी महक भी लाता है
क़ुबूलियत की घड़ी हो तो मेरा दस्त-ए-दुआ
फ़लक से टूटते तारे लपक भी लाता है
किसी की याद में बे-वक़्त आँख में आँसू
अकेला मैं नहीं लाता फ़लक भी लाता है
जिसे बहार की आमद समझ रहे हैं दोस्त
वो इश्क़ क़ैस को सहराओं तक भी लाता है
"किसी की याद में बे-वक़्त आँख में आँसूअकेला मैं नहीं लाता फ़लक भी लाता है"
आशु मिश्रा
जन्मस्थान: बदायूँ, उत्तरप्रदेश
स्नातक: कंप्यूटर साइंस
परास्नातक: दर्शनशास्त्र
पी.एच.डी.: ज़ारी है
अदब की दुनिया मे आशु मिश्रा का नाम आज के दौर में किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। वह एक बेहतरीन शायर हैं। सभी मुद्दों और विषयों में शानदार लिखने और उसकी अभिव्यक्ति में माहिर हैं। उनकी शेर, गज़लें व नज़्म निरंतर विभिन्न पत्रिकाओं व ऑनलाइन पोर्टलों पर प्रकाशित होती रहती हैं।

