खेल

छवि श्रेय: हरदीप सबरवाल









खेल

(१)

कच्ची मिट्टियों को, 
अपनी मर्जी के सांचे में ढालने के लिए,
सांचे बनाने वाले भूल गए
कि सभी मिट्टियां सांचो के लिए नहीं बनी होती, 
कुछ हवाओं के साथ उड़ती है
और धूल बन कर पुत जाती हैं, 
सांचे बनाने वालो के चेहरे पर

(२)

विचारों को दफ़न करने के लिए, 
एक के बाद एक कब्रें खोदते वक़्त, 
उन्हें ध्यान ही नहीं रहा, 
कि जो विचार मिट्टी में पनपे और बढ़े, 
वह मिट्टी में दब कर दफ़न नहीं होते, 
बीज बन जाते हैं, 
पुनः अंकुरित होने को

(३)

उनके चेहरे पर तेज छाने लगा, 
जब अग्नि में भस्म करने को फेंके गए
आखिरी उपचार करने को,
जो ना सांचे में ढले, ना हो सके दफ़न ही, 
पर धुआं बन कर छा गए वो
उनकी कृत्रिम रोशनी के आसमान का 
असली काला चेहरा सामने लाने को।

"कच्ची मिट्टियों को, अपनी मर्जी के सांचे में ढालने के लिए, सांचे बनाने वाले भूल गए कि सभी मिट्टियां सांचो के लिए नहीं बनी होती, कुछ हवाओं के साथ उड़ती है और धूल बन कर पुत जाती हैं, सांचे बनाने वालो के चेहरे पर"

दीवार 

वो लोग जो दीवार के इस तरफ रह गए, 
उन्होंने कल्पना की, कि दूसरी ओर वाला क्या सोचता है, 

चीन की दीवार के इस पार बैठे लोग सोचते रहे, 
कि उस तरफ के लोग बस हमला करने ही वाले है, 

घर की दीवार के इस पार बैठा एक भाई सोचता है 
कि दूसरी तरफ उसके लिए ईर्ष्या और द्वेष भरा है, 

लिंगभेद दीवार की ओट में छुपी बैठी एक लड़की
वो भयभीत रही कि उस पार के सभी लड़के बलात्कारी है, 

अपनी विचारधारा की दीवार के इस पार बैठे लोगों को, 
उस पार के लोगो की सोच अंधेरे में डूबी दिखी, 

धर्म की दीवारों के अंदर मग्न लोगो को, 
दूसरी तरफ के सारे लोग पाप करते लगे, 
और इस सब के बीच 
दीवार के इस पार या उस पार बैठे लोग ये जान ही ना पाए, 
कि दीवारों में छुपे बैठे लोग कुछ सोच नहीं सकते, 
सिर्फ शक कर सकते है।

"लिंगभेद दीवार की ओट में छुपी बैठी एक लड़की वो भयभीत रही कि उस पार के सभी लड़के बलात्कारी है,"

मन

(१)

माचिस का एक पैकेट
कोने में पड़ा रहता है,
उसे पता नहीं होता, उसमें कितनी आग है,
जब तक की कोई आकर उसे हिलाए ना,
मन भी कहां जान पाता है अपने आप,
अपनी आग को

(२)

लोहार को पता होती है,
अपने हाथ और हथौड़े की ताकत,
एक धावक जानता है अपने पैरों के बल को,
लोहार पैरों के बल से अनजान है, 
और धावक हथौड़े की ताकत से,
मन को भी अभी बहुत कुछ जानना बाकी है।

"माचिस का एक पैकेट कोने में पड़ा रहता है, उसे पता नहीं होता, उसमें कितनी आग है, जब तक की कोई आकर उसे हिलाए ना। मन भी कहां जान पाता है अपने आप, अपनी आग को"

मुश्किल

कुत्सित इच्छाएं
फ्लश सीट में गिरे हुए किसी मेंढक की भांति
बाहर आने को बेचैनी से उछलती,
बेशक असफल ही रहे,
पर जितना भी फ्लश करो,
बहती नहीं,
लटकती रहती, एक भयानक टर्राहट के साथ,
सचमुच इंसान बने रहना कितना मुश्किल है।


सार्वजनिक शौचालय 

सार्वजनिक शौचालयों की दीवारें इन दिनों, 
साफ सुथरी नजर आती हैं, 
उन पर नहीं दिखती, 
किसी का नाम लेकर लिखी गई, 
अभद्र शब्दों में की गई टिप्पणियां 
मन की निम्नतर ख्वाहिशों को पोषित करती 
गन्दी और अश्लील कहानियां 
पेंसिल और बाल पेन से बनाए गए, 
अधकचरे से कामोत्तेजक से चित्र, 
लेकिन फिर भी खत्म नहीं हुए हैं 
वो सारे चित्रकार और लेखक, 
उस सार्वजनिक शौचालय की भौतिक दीवार को छोड़कर 
वो सब आ गये है
एक आभासी शौचालय की दीवार के पास, 
छद्म नाम और छद्म पहचान के साथ, 
सोशल मीडिया के शौचालय में,
उसी तरह छुपे हुए ताला लगी प्रोफाइलों के पीछे, 
हमारे मनो के सारे निम्नतम विकारों ने, 
अपनी सारी नीचता की पराकाष्ठाओं का 
आधुनिक डिजिटलीकरण कर लिया है।

"मन की निम्नतर ख्वाहिशों को पोषित करती गन्दी और अश्लील कहानियां , पेंसिल और बाल पेन से बनाए गए, अधकचरे से कामोत्तेजक से चित्र, लेकिन फिर भी खत्म नहीं हुए हैं वो सारे चित्रकार और लेखक, उस सार्वजनिक शौचालय की भौतिक दीवार को छोड़कर वो सब आ गये है, एक आभासी शौचालय की दीवार के पास,"

एक कविता

छत से उतरते
सीढ़ी पर फिसलती
अठखेलियां करती
दोस्त बनती एक कविता,
दुकान पर बैठे
तराजू पे जैसे घटती बढ़ती
हिसाब लगाते ग्राहक जैसी
व्याकुल होती एक कविता,
गर्मी की दोपहर में
चिपचिपी उमस से चिढ़ती
गुल हुई बिजली में
गुस्सैल नकचड़ी
झगड़ा करने
पंखे को तकती एक कविता,
सांझ ढलते
खाली बैठी
चाय की चुस्कियों में
निठल्ले पन सी
डूबती जाती एक कविता,
रात उतरते
नींद के जैसी
आगोश में लेती
सपना बनती एक कविता,
भोर के पल में
रोशन होती,
आशा में डूबी
जिंदगी बनती एक कविता।


तस्वीर

(१)

सिर्फ चेहरा भर ही नहीं रखती अपने अंदर,
तस्वीर समेटे रखती है, अपने अंदर
वो अच्छा या बुरा पल और
सदैव आकर्षक,
दिखते रहने की चाह,

(२)

राजाओं की तस्वीर
राजाओं की तरह ही सबसे बड़ी होना चाहती है
वो तराशी जाती हैं
सिक्कों पर और स्मारकों सी पुरातत्व वस्तुओं से लेकर,
आधुनिक होर्डिंग्स और बैनरों के साथ ही,
जन कल्याणकारी योजनाओं के पोस्टर ब्वॉय छवि तक में,
युगों तक याद रखे जाने की चाह में,

(३)

राजाओं की तस्वीर में एक और इच्छा भी रहती है,
तमाम पिछले राजवंशों की तस्वीर मिटा देने की,
वर्तमान, भूत की तस्वीर मिटा देने को तत्पर जहां,

भविष्य योजनाबद्ध है, वर्तमान की तस्वीर के खिलाफ,
तस्वीरों का ये युद्ध, अलग बात है!
हमें इतिहास में नहीं पढ़ाया जाता।

(४)

व्यापारिक तस्वीरें, किसी वेश्या सरीखी,
उनका इस्तेमाल कहां होगा
और ग्राहक कौन होगा,
जैसे प्रश्नों में ना उलझ
उन्हें सिर्फ बिकने तक से मतलब,

(५)

कुछ तस्वीरें
ना पत्थरों पर तराशी गई,
ना कागज पर उतरी और ना ही आधुनिक डिजिटल रूप में आई,
वे छुपी रही किसी एक अकेले मन में,
किसी घोर निराशा, पीड़ा और दर्द का पल लिए,
सालती रहती उम्र भर,
एकाकी टीस और एकाकी पल लिए
सिर्फ एक दिल के लिए.

(६)

तस्वीरें हमें जितना दिखाती है,
उस से कहीं अधिक
उनका काम छिपाना होता है,
लगभग उतनी ही चालबाज
जितना इंसान का मन,
जिसमें होता कुछ और है
और दिखता कुछ और।

"राजाओं की तस्वीर, राजाओं की तरह ही सबसे बड़ी होना चाहती है, वो तराशी जाती हैं, सिक्कों पर और स्मारकों सी पुरातत्व वस्तुओं से लेकर, आधुनिक होर्डिंग्स और बैनरों के साथ ही,"

निरपेक्ष

भेड़िए को आस है
मेमने के मांस की,
मेमने को
हरी ताजी घास के स्वाद की,
घास रखती उम्मीद
चमकती धूप से,
धूप निरपेक्ष सी बढ़ती जाती
चारों तरफ
जीवन दायिनी पर निर्जीव धूप नहीं रखती अपेक्षा
कि आस रखना ही जीवित होने का चिन्ह है।

"धूप निरपेक्ष सी बढ़ती जाती, चारों तरफ जीवन दायिनी पर निर्जीव धूप नहीं रखती अपेक्षा कि आस रखना ही जीवित होने का चिन्ह है।"


◆नाम - हरदीप सबरवाल 
◆शिक्षा - MA (English) पंजाबी यूनीवर्सिटी पटियाला से
◆लेखन विधा- कविता और कहानी
◆लेखन भाषा - हिंदी, इंग्लिश और पंजाबी

◆प्रकाशन:

 उनकी रचनाऐं विभिन्न ऑनलाइन और प्रिंट पत्रिकाओं में जैसे The Larcenist , Zaira Journal, PIN Quarterly Journal, Literature Online, The Writers Drawer, Quail Bells, NY Literary Magazine, In-flight literary Magazine, Toplogy magazine, Amomancies Magazine, Literary Yard, Alive, The Taj Mehal Review, जनकृति इंटरनैशनल मैगजीन, हस्ताक्षर वैब पत्रिका, सेतू मैगजीन, दिल्ली पत्रिका, हस्तक्षेप मैगजीन, साहित्य सुधा, नवपल्लव मैगजीन, साहित्य एक्सप्रेस, परिकल्पना समय, साहित्य कलश, जयदीप पत्रिका, सुखनवर पत्रिका, पुरवाई पत्रिका, प्रतिमान और कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है. 

Spectrum publishing house UK published a poetry book Faceless( English) 

◆अब तक ६ सांझा संग्रहों में रचनाएं प्रकाशित 

◆सम्मान और उपलब्धियां 

◆२०१४ में उनकी कविता HIV Positive को Yoalfaaz best poetry competition में प्रथम स्थान मिला। 

◆2015 में उनकी कविता The Refugee's Roots को The Writers Drawer International poetry contest में दूसरा स्थान मिला. 

◆2016 मे उनकी कहानी "The Swing" ने The Writers Drawer short story contest 2016 में तीसरा स्थान जीता . 

◆प्रतिलिपी लघुकथा सम्मान 2017 में इनकी में तृतीय स्थान मिला.

◆Two times winner of 10 days poetry challange by poets in Nigeria

◆प्रतिलिपि कविता सम्मान 2019 से सम्मानित