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| भानु प्रकाश |
मनुष्य हूँ मैं
धारा के विपरीत चलने की
धृष्टता कैसे कर सकता हूँ
मछली नहीं हूँ
मनुष्य हूँ मैं,
मृतप्राय पड़ा रहूंगा
चिपका रहूंगा किनारे से
या बह जाऊंगा तेज़ बहाव में
अधकचरा जीवन जीना
ख़ूब रास आता है मुझे
मैं कोई परिंदा भी नहीं
कि अंधड़ में फैलाये अपने पंख
नापता फ़िरू आसमान,
अपने छत से टीनसेड की तरह
उठूंगा और गिरूंगा ज़मीन पर
या किसी के सिर पर
और कर दूंगा लहुलुहान
उसकी आत्मा तक को
कागज पन्नी की तरह लहराता
जा गिरूंगा कचरे के ढेर पर
मैं मनुष्य हूँ
इन बाहों में पंखों सा दम नहीं
फूलों की तरह कैसे खिलूं
बग़ैर रस-गंध के
महकना- द़हकना मुझे नहीं आता साहब
अपनी दुर्गंध छोड़ ही देता हूँ
जहाँ भी जाऊँ
जल, जंगल या स्पेस में
मैं मनुष्य, एक वाहन की तरह हूँ
रखता सभी की सुविधाओं का ख़्याल
जैसे चलाना हो चलाइए
ले जाना हो जहाँ
शौक़ से ले जाइए।
"मैं मनुष्य, एक वाहन की तरह हूँ, रखता सभी की सुविधाओं का ख़्याल; जैसे चलाना हो चलाइए, ले जाना हो जहाँ, शौक़ से ले जाइए।"
साईकिल
दो पहियों पर
अपने भार को नियंत्रित करना
जीवन की सबसे सुखद
दूसरी घटना थी
जैसे पहली घटना थी
पिता की ऊंगली छोड़
गिरते-उठते
अपने पैरों चल पाना
हमने पैरों से साईकिल
चलाना सीखा
अब साईकिल से
पैर चलाना सिखाया जाता है
मुझे बच्चों के यांत्रिक हो जाने का
डर सताता है।
"हमने पैरों से साईकिल चलाना सीखा; अब साईकिल से पैर चलाना सिखाया जाता है;मुझे बच्चों के यांत्रिक हो जाने का डर सताता है।"
स्मृति शेष
स्मृति में कितने ही लोग हैं
जिनके असमय गुज़रने पर
मैंने दी हैं श्रद्धांजलि,
वे सब गड्ड-मड्ड हो गये
संख्याबल के दबाव में
साल से कम होते गए महीने
महीनों से दिन
अथक पीड़ा से गुजरता रहा मैं
कम होते मनुष्यों के लिए
मैं उन्हें नाम से याद करता हूँ
तो चेहरे भूल जाता हूँ
चेहरे याद करता हूँ तो नाम
जबकि भूल जाने की बीमारी भी नहीं है मुझे
इतने नामों के बीच
सिर्फ़ एक नाम
इतने चेहरों के बीच
सिर्फ़ एक चेहरा याद रहता है
'मौत का चेहरा।'
"मैं उन्हें नाम से याद करता हूँ तो चेहरे भूल जाता हूँ; चेहरे याद करता हूँ तो नाम जबकि भूल जाने की बीमारी भी नहीं है मुझे"
शब्द हथियारों की तरह होंगे
मैं अच्छे दिनों की कल्पना करता हूँ
जबकि मुझे पता है अच्छे दिन
अच्छी ख़बर की तरह कभी नहीं आते
यह जानते हुए कि उड़ने वालों के पंख
नहीं रहते ज़्यादा दिन तक साबुत
एक दिन सर्व सहमति से काट दिए जाते हैं,
मैं उड़ता हूँ खुले आकाश में
कडे़ पहरे के बीच घुसता हूँ उस किले में
जहाँ राजकुमारी को दीवार में चुना जाएगा,
यह जानते हुए भी कि मुझे चुना जाना है
उसके साथ
यह जानते हुए भी
कि शब्द ठंडे होते हैं बर्फ़ की तरह
मैं लिखता हूँ कविता
मुझे विश्वास है कि एक दिन
शब्द हथियारों की तरह होंगे
हमारी सुरक्षा में तैनात।
"मैं उड़ता हूँ खुले आकाश में, कडे़ पहरे के बीच घुसता हूँ उस किले में, जहाँ राजकुमारी को दीवार में चुना जाएगा, यह जानते हुए भी कि मुझे चुना जाना है उसके साथ"
तुम्हारी उदासी
तुम्हारी उदासी से अन्जान चांद
धीरे-धीरे उतर आया है
खिड़कीे पर
मंद-मंद हवा
सहला रही है तुम्हारे केश
रातरानी ने अपनी महक से
ढक दिया है चांदनी रात को
टूटते तारे से मांगकर एक मुराद
उदासी को अभी-अभी
पलायन वेग से
उछाल फ़ेंका है मैंने
व्योम में
उन्मुक्त हंसी के ठहाकों से
फ़िर गूंज उठेगी
तुम्हारे मन की चारदीवारी।
माँ के लिए
गाय को पंचायती गौशाला
छोड़ने जाते देख
माँ झपट पड़ी पड़ोसी 'रघुवीर' पर
इस ख़बर से बेख़बर
कि बुढ़ऊ माँ-बाप भी
भेजे जा रहे हैं वृद्धाश्रम।
चौंकाने वाली यह ख़बर
लाख छुपाने के बाद भी
माँ को पता चल गई एक दिन
धार्मिक चैनल पर कथा सुनते हुए
जबकि मैं अफ़वाह बताकर टाल देता
जब भी पूछती थी वह
माँ उस दिन से गुमसम सी
उदास रहती है
मैं बच्चों को डांटता हूँ
डपटता हूँ पालतू कुत्ते को
या गाय को ललकारता हूँ
अपने स्वभाव के विपरीत
माँ सहम जाती है
दहलीज़ के बाहर दूर तक
देखती है डबडबाई आंखों से
आंसू पोंछते हुए
जा पड़ती है बिस्तर पर चुपचाप
माँ की निडरता को इतना बेबस
मैंने कभी नहीं देखा
पिता के गुज़र जाने के बाद भी नहीं।
जवान होते हुए
वह लड़की
दिनभर खिड़की से देखती है
सड़क पर चहलपहल
ज़ैसे क़ैदी सलाख़ों के पीछे से
गिनता है रिहाई के दिन
वह गिनती लगाती है
सड़क चलती औरतों की
वह देखती है पसीने से भरे
लोहा पीटते लुहार को
सामने की गुमटी पर
सिगरेट पीते लड़के को
जो भीड़ में खो जाता है
सिगरेट पीते-पीते
उसे धूप नहीं लगती
पर झुलस जाता है उसका चेहरा
शाम तक यूँ ही खड़े-खड़े
ओंठ पपड़ा जाते हैं
बच्चे को खिलाते हुए
उंगली के इशारे से करती है बात
चूमती है उसके गाल
झिंझोड़ देती है नन्हा शरीर
शाम को छत पर जा
थकी आंखों से देखती है पूरा क़स्बा
उड़ान भरते क़बूतरों के जोड़े
और पेड़ों पर उतरते चिड़ियों के झुंड
रात को देखती है सपना
और चौककर उठती है
उसे अंधेरे में भी दीखता है
गुमटी पर खड़ा
वह सिगरेट पीता हुआ लड़का।
"शाम को छत पर जा, थकी आंखों से देखती है पूरा क़स्बा, उड़ान भरते क़बूतरों के जोड़े और पेड़ों पर उतरते चिड़ियों के झुंड; रात को देखती है सपना और चौककर उठती है; उसे अंधेरे में भी दीखता है, गुमटी पर खड़ा, वह सिगरेट पीता हुआ लड़का।"
नाम- भानु प्रकाश रघुवंशी
शिक्षा- कला स्नातक, स्नातकोत्तर (हिन्दी)
प्रकाशन- विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
संप्रति- कृषि कार्य
फ़ोन-9893886181

