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| छवि श्रेय: मीनाक्षी |
जो बातें मुझे बेचैन करती हैं...
मुझे बेचैन करते हैं उदास गीत
जबरन हुआ विस्थापन
और कृत्रिम एकान्त...
मुझे बेचैन करती हैं
मंच के सुभीते के लिए लिखी गई कविताएँ,
उनका नीरस पाठ
और किसी प्रलोभन के चलते की गईं उनकी प्रशंसाएं...
पैरों तले रौंद दिये गये फूलों को देखती हूँ तो
गृहस्थी में निचुड़ चुकी एक स्त्री देह की स्मृति
बेचैन कर जाती है...
बेचैन करते हैं मुझे
अति महत्वकांक्षी स्वप्न,
नाबालिगों के कण्ठ में भरता आक्रोश ...
घृणित नहीं
घृणा बेचैन करती है...
बेचैन करती हैं
मौत की ख़बरें
और किसी का चले जाने के बाद भी
उतना ही बचे रह जाना...
बेचैन करती है एक शिशु की अकुलाहट
और उसके आस पास सख्त होतीं हथेलियाँ...
पृथ्वी पर निरंतर क्षतिग्रस्त होती मनुष्यता बेचैन करती है...
जब लोगों को कहते सुनती हूँ
इन तुच्छ बातों के लिए इतना सोचना निरर्थक है
तब शीर्ष पर होती है ये बेचैनी !
सबसे ज़हीन लोग
किसी की अंत्येष्टि में अर्पित पुष्पों की नियति में है
सबसे पहले मुरझा जाना...
सबसे अलग होते हैं वे गीत
अंतिम यात्रा में गाये जाते हैं जो किसी की...
सबसे तल्लीन व्यक्ति का
घास की सरसराहट भर से हो जाता है ध्यान भंग...
सबसे दीर्घायु होता है
प्रेमियों के विलग होने का क्षण...
सबसे पहले,
सबसे अलग,
सबसे तल्लीन,
सबसे विलग,
या सबसे दीर्घायु होने के झंझट में कभी नहीं पड़ते
सबसे ज़हीन लोग...
उम्मीद है कि...
उम्मीद है आने वाले दिनों में
थम जाएगा प्रलय
और उत्साह होगा
ऊबाऊ और थकाऊ दिनचर्या से परे...
तीर-बिंधे पक्षी न होंगे
जल का व्यय न होगा
और बेमौत नहीं मरेंगी मछलियाँ...
वैधानिकता अनिवार्य न होगी
दुश्चिंताओं का होगा क्षय
और उग्र मुहावरों के लिए
कविताओं में न होगा कोई स्थान...
पृथ्वी फिर से
हरी घास का एक मैदान होगी
पत्थर होते दिलों पर दूब की तरह
फिर फिर उग आएगी करुणा...
नीम रौशन रास्तों पर
फिर निकल पड़ेंगे किसान
कंधों पर कुदाल लेकर...
सूख चुकी नदियाँ फिर बहेंगी कल कल
फिर दिखेगी चाँद पर सूत कातती बुढ़िया...
प्रेम पर कोई प्रतिबंध न होगा...
उम्मीद है कि
हृदय की नींव पर फिर से
हम बुन लेंगे एक ऐतिहासिक फ़लक...
उम्मीद है...
क्यों नहीं!
यह विषम समय है
जंगलों से गुज़र रहें हैं हम...
पर क्यों चुनें हम क्रूरता को
मनुष्य के भीतर खीजती हुई पशुता को
दमित किया जाना चाहिए जिसे तत्काल।
कण्ठ को शुष्क बना देने वाले
उद्दण्डता के विषैले फल क्यों चखें...
क्यों बनें तमाशबीन
अनावश्यक रक्तपात के मूक दर्शक!
क्यों न चुनें हम
जंगल की प्राकृतिक लय को...
सौहार्द को अपना धर्म क्यों न कहें!
उदारता क्यों न रहे
हम सबके जीवन का
सूक्ति वाक्य!
क्यों न पक्षियों के जत्थे के साथ उड़ चलें उस ओर
जहाँ सभ्यता के मुहाने पर बैठी कविताएँ
किसी अबोध बच्चे की तरह
हमें देख मुस्कुराएं
स्वागत में अपनी बाहें फैलाएं
जंगल के उस पार!
भ्रमासक्ति एक रोग है!
जब चारों तरफ़ ये शोर है कि
प्रतिकूल समय में
प्रेम करने पर सख्त मनाही होगी...
नेपथ्य में गूँजते हर मुखर स्वर को
दबा दिया जाएगा तत्काल ही...
हर सुखद स्मृति को
विखण्डित कर दिए जाने की होगी अनिवार्यता...
स्त्री अस्मिता को रख दिया जाएगा ताक पर...
अबोधों के स्वप्नों पर कूच की जाएगी
और शिखर पर होगी कूढ़मगजी...
फिर यह प्रश्न भी उठेगा कि
कौन हैं ये शोर मचाने वाले लोग
उभरेंगी तस्वीरें तब
पुल पर खड़े कुछ लोगों की
जो तैयार खड़े हैं
एक अनाम दरिया में छलाँग मारने को...
जिनकी शिनाख़्त किए जाने पर पाया जाएगा कि
ये शोर मचाते वही लोग थे
जो जीवन भर आत्महत्या के बहानों की तलाश करते रहे...
जो निर्भीक और निर्द्वन्द नहीं थे..
जिन्हें यकीन न था किसी तंत्र पर
जो आईने में अपना चेहरा देखने भर से कतराते थे...
जिन्होंने सकारात्मकता का कभी कोई पाठ नहीं पढ़ा
पतनशील था जिन का दुनिया को देख पाने का नज़रिया...
जिन्होंने पहले कभी
इस तरह पलायन करने वालों को रोक लेने का
नहीं किया कोई प्रयास
जो किसी न किसी भ्रमासक्ति के चलते
जीवन भर रहे रुग्ण!
लौटना
भग्न और असार अवस्था में
किसी अज्ञात यात्रा पर निकल पड़ने का दुस्साहस करने के बाद
पढ़ लेना चाहती हूँ एक बार फिर
धूल गर्द में सनी हुई अपने प्रिय कवि की किताब...
वापस लौट आने से पहले
बदल देना चाहती हूँ
इस सृष्टि पर सम्वर्धन के कुछेक नियम...
खाली कर देना चाहती हूँ हर वो पात्र
जो अप्रत्याशित रूप से भरभरा कर छलके जा रहा है...
भयमुक्त हो जाना चाहती हूँ इतनी
कि हृदयाघात की आशंका न बने मेरी मृत्यु का कारण...
चाहती हूँ कि प्रयोजन स्पष्ट रहें मेरे
और आवेशों के लिए कोई स्थान न हो...
लौटूँ इतनी चैतन्य
कि सार्थक सिद्ध हो मेरा लौट आने का निर्णय...
स्वप्नों का ईश्वर
दर्पण में प्रतिबिंबित होने लगतीं हैं
निजी क्षुद्रताएं
दुराशाओं के ताप में जब
झुलस रहा होता है जीवन...
मेरे तेज को तब भी
निरस्त नहीं होने देता वह...
मेरी उद्दण्डताओं के प्रति उदार होकर
मेरी इच्छाओं के कपोतों को दे देता है
समूचा आकाश...
मेरी अंतर्ध्वनियों के अनुवाद में
निरंतर निपुण होते हुए
जीवन के रंगों को मेरे,
नहीं होने देता मलिन...
संवेदनाओं के निवेश और विनिवेश के
जटिल अर्थशास्त्र में
नहीं उलझाता मुझे...
जिसके लिए उपयुक्त नहीं संभवत:
कोई भी स्तुति गीत,
वह किसी देवस्थली पर नहीं विद्यमान...
निद्रा की ओट में मिलता है मुझसे
मेरे स्वप्नों का ईश्वर!
नाम : मीनाक्षी मिश्र
शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में परास्नातक
सम्प्रति : दिल्ली के सरकारी विद्यालय में शिक्षिका के पद पर कार्यरत
ईमेल : meenakshi.misra84@gmail.com
संपर्क : 9560224132

