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| छवि श्रेय: नित्या |
मैं हार नहीं मानूँगी
बाँध सको तो बाँध दो इन पैरों में
हज़ारों टन वजनी बेड़ियाँ ,
रोक सको तो रोक लो मेरे
इन आँखों में पलते सपनों को
कतर सको तो कतर दो
इरादों से बुने मेरे इन
आसमानी पंखों को ,
झुका सको तो झुका दो
स्वयं के समक्ष
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को ।
तोड़ सको तो तोड़ दो
मेरे हिम्मत और हौसले को
बुझा सको तो बुझा दो मेरे भीतर
भभकती ज़िद की चिंगारी को ।
रौंद सको तो रौंद दो
मेरे कोमल हृदय में
उफनते जज्बातों को ,
मिटा सको तो मिटा दो
मेरे नामोनिशान को भी ।
मैं फ़िर भी हार नहीं मानूँगी,
मैं फिर भी पूरी ताकत से लड़ूँगी,
मैं फिर भी तुम्हारे समक्ष
उसी जोश के साथ खड़ी मिलूँगी,
मैं फिर भी दैदीप्यमान
नक्षत्र की तरह चमकूँगी,
मैं फिर भी तुम्हें गर्व कर सकने
की वजह दूँगी,
मैं फिर भी हो जाऊंगी सदा के
लिए अमर
ताकि तुम फिर से इन व्यवहारों को
किसी और के साथ दुहराओ तो
मेरी आकृति उभर आये तुम्हारे समक्ष
और तुम्हारे कदम ठिठक जाएं खुद- ब-खुद ,
तुम्हारे कण्ठों से प्रोत्साहन के स्वर फूट पड़े
और तुम बन जाओ जरिया एक और मीरा,
एक और सिंधू को निर्मित करने का.........।
स्वार्थी संसार
टांग दिया है मैंने अपने घर के मटमैले रंग से पुती एक दीवार में उभरती हुई खूंटी पर चमकीले से चाँद को ,
दुनिया घुप्प ,स्याह अँधेरे में रहे तो रहे मेरी बला से ।
इस दुनिया ने मेरी फिक्र की है कभी जो मैं उसकी करूँ?
कभी मेरे घर की केरोसिन के खतम होने पर भभकती
ढ़िबरी को बुझने से बचाने के लिए कोई आगे आया ?
जब मेरा बच्चा काले घने अँधेरे में डरके काँप रहा था तो
कोई थपकी ,कोई उसे चुप कराने की आवाज सुनाई पड़ी?
जब गरीबी की कालिख ने मेरा मुँह काला करके मेरे जीवन में घर किये हुए अँधेरे को और सघन कर दिया था तब कोई हाथ उठा मेरी मदद के लिए ?
तो मैं अपने हिस्से की रोशनी लेके कौन सा पहाड़ तोड़ दे रही हूँ ?
जीवन आपदा
श्मशान में ठंडी न हो पाने वाली राख भी
बयान करती है एक ऐसी हकीकत को
जिसमें भयावह होता है जीवन का अंत ।
उस जीवन का जिसके लिए नौ महीनों तक गर्भ में
रहकर मनुष्य पीड़ा झेलता है ,
उस जीवन का जिसमें पैदा होने के बाद 20 सालों तक
गहन अधिगम के माध्यम से पूर्णतया मनुष्य बनने की
दिशा में अग्रसर हो पाता है ,
उस जीवन का जिसमें व्यक्ति एक हैसियत ,उच्च सामाजिक स्थिति पाने , परिवार बनाने में सालों- साल खपा देता है ,
उसी मनुष्य को अंत में मिलता है अपनो को देखे बिना
इस क्रूर संसार को अलविदा कहने का भयंकर दुःख ,
नगरपालिका की गाड़ियों में ठूस कर कब्र या श्मशान
जाने की सौगात ,
शरीर का ठीक से दाह संस्कार भी न हो सकने का सिला
या फिर कब्र में एक के ऊपर एक दफन होने का अंजाम
और तो और चिता की गर्म राख एवं अस्थियों को कलश में
बन्द कर दिए जाने का अभिशाप ,
एवं कभी -कभी अस्थियों के माध्यम से भी परिजनों से न
मिल सकने का दारुण दुःख भी....।
शिव-शिवी सा प्रेम
यूँ मेरे हर दुविधा में , हर असावधानी में तुम्हारा अचानक
आकर मुझे लड़खड़ाने से बचाने का प्रयास करना ,
द्वंद होता है मन में कि यह महज मेरी कोरी कल्पना है
या वास्तविक यथार्थ ?
यद्यपि मैं हूँ समर्थ स्वयं की रक्षा हेतु
किन्तु मैं देना चाहूँगी तुम्हें एक अवसर ,
मुझे गम्भीर संकट में देखकर विचलित हो उठने
से लेकर मेरे पैर में मामूली कंकड़ चुभने से पूर्व
अपनी हथेली आगे कर देने तक के लिए ......
मेरे सबसे निम्नतम क्षणों में मुझे अपने हृदय
के असीम आनंद से आह्लादित कर मेरी सारी
पीड़ा दूर कर देने के लिए ,
जब मैं अपने अश्रुप्रवाह में स्वयं को भी बहा देने
को उद्यत होऊं तो निरंतर अस्वीकृति देने के
बाद भी मेरे सिर को अपनी गोद में रखकर
धीमे-धीमे गुनगुनाते हुए अपने थपकियों के स्पर्श
से मुझे सुलाने के लिए ,
हाँ मैं देना चाहूँगी एक अवसर
तुम्हे मेरे प्रति अपने निस्वार्थ प्रेम को प्रकट करने के लिए......।
जीवन से हारती स्त्रियाँ
एक लड़की ,
जिसने मृत्यु से पूर्व भी अपने शौहर का नाम
स्वयं से अलग होने नहीं दिया ,
जिसने इस संसार से केवल और केवल प्रेम चाहा,
जिसने प्रेम के लिए दहेज का केस वापस लेने तक
का फैसला कर लिया ,
जिसने इस संसार से विदा लेते वक्त अपने चेहरे की हंसी
काफूर नहीं होने दी ,
किसी से कोई गिला शिकवा नहीं रखा ,
जाते जाते भी स्वयं में कमी ढूँढने की कोशिश की
दुर्भाग्यवश , उस लड़की को असमय इस संसार को
किसी के लालच और धूर्तता के कारण अलविदा कहना पड़ा ।
और जाते -जाते ये उसका कहना कि एकतरफा प्रेम जानलेवा है
इस नश्वर संसार में प्रेम के दूसरे पक्ष और असम्वेदनशीलता के
सबसे घृणित रूप को उजागर करने जैसा है ,
ऐसे में ही स्त्रियों के मन में सदियों से घर किये हुए
सवालों पर बिखरी धूल झड़ जाती हैं और फिर वो
एक-एक करके सामने आना शुरू करतें हैं ;
क्या हम स्त्रियाँ मानव नहीं ?
और कितनी हिंसा ,
कितनी शारीरिक ,मानसिक चोटें ,
कितने त्याग ,
कितने बलिदान ,
कितने अपमान ,
बाकी हैं ??
हालांकि जीवन की परिस्थितियों से हार न मानना
सीख गयीं हैं स्त्रियाँ , तभी इतने कष्टों
के बाद भी उनमें जिजीविषा विद्यमान रहती हैं ,
पर कभी-कभी कुछ स्त्रियाँ हार जातीं हैं इस लड़ाई में ,
काश वे भी न हारतीं.......।
नाम : नित्या सिंह
जन्मस्थान : नियामताबाद चन्दौली
वर्तमान निवास : नई दिल्ली
शिक्षण योग्यता : परास्नातक
रुचि : अध्ययन एवं लेखन
उपलब्धियां : मेरी कविताएँ , कहानियाँ , लेख कई समाचार पत्रों में यथा; हम हिंदुस्तानी (अमेरिकी हिंदी वीकली) , इंदौर समाचार , कोलफील्ड मिरर , अयोध्या टाइम्स ,दक्षिण समाचार ,वीमेन एक्सप्रेस, युगजागरण तथा कई पत्रिकाओं उदाहरणस्वरूप; दृष्टि करेंट अफेयर्स टुडे,न्यूज़ हीरोज़ इत्यादि में प्रकाशित हो चुके हैं । साथ ही गीतकार के रूप में ज़ी म्यूजिक कम्पनी प्लेटफार्म पर पदार्पण भी कर चुकी हूँ। इसके अतिरिक्त एक आधुनिक भारत नामक पुस्तक के लेखन का कार्य भी पूरा हो चुका है जिसका प्रकाशन वर्तमान में प्रतीक्षित है ।
संपर्क : nitafe4@gmail.com
Instagram : nitya7284

