अनुभवों के गीत बुन कर

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अनुभवों के गीत बुन कर चित्त को शीतल किया है

अनुभवों के गीत बुन कर चित्त को शीतल किया है
मूक शब्दों के नियन्त्रण में समूची इन्द्रियाँ हैं 

हूँ सुबह की गोद में मैं, चाँद ओझल हो गया है
किन्तु पन्नों पर सुधाकर-रश्मियाँ मुस्का रही हैं
रौशनी में द्वार स्वप्नों के हुए हैं बन्द लेकिन 
भेद जीवन-चक्र का कुछ पङ्क्तियाँ समझा रही हैं 

मैं निशा के गीत में भी भोर दर्शाती रही हूँ
और मिश्रित ये कलाएँ अवसरों की सूचियाँ है

प्रेम की बाँहें कसी हैं किन्तु मन व्याकुल बड़ा हैं
हर दिशा में है अँधेरा दीप जागृत ढूँढ़ना है
उर किसी में लीन हो कर नष्ट होने को नहीं है 
प्रीति की छाया हटा कर पथ अलङ्कृत ढूँढना है 

आँजुरी के मध्य ठहरी ज्योत जलती तो रहेगी
पर सुरक्षा केन्द्र से बाहर बुझी सी दीप्तियाँ हैं 

क्या उचित है यह समर्पण यूँ किसी के बन्धनों में ?
जो कि रक्षा के नियम में इन परों को बाँधते हैं 
टूट जाना, चोट खाना, पङ्ख फिर से फड़फड़ाना 
क्या नहीं हम लक्ष्य पर ध्वज इस तरह ही गाड़ते हैं ?

बन्द कर दो बेड़ियों के पक्ष में यह गीत गाना 
नेह वश ही मोतियों पर कष्ट ढाती सीपियाँ है 

हम रुदन की आड़ ले कर सत्य ठुकराते रहे हैं 
दोष की स्वीकार्यता ही मार्गदर्शन है विजय का 
कब निवारण हो सका है कष्ट का मुँह फेरने से
शत्रु से निर्भीक भिड़ना मात्र सम्बल है अजय का 

स्वयं को स्वीकार करना शीश को ऊँचा उठाए 
सत्य है स्वीकार्यता में ही विभूषित शक्तियाँ हैं 

"क्या उचित है यह समर्पण यूँ किसी के बन्धनों में ?
जो कि रक्षा के नियम में इन परों को बाँधते हैं 
टूट जाना, चोट खाना, पङ्ख फिर से फड़फड़ाना 
क्या नहीं हम लक्ष्य पर ध्वज इस तरह ही गाड़ते हैं ?"

सुषुप्त है विहान आज सूर्य को पुकार लो

सुषुप्त है विहान आज सूर्य को पुकार लो

विभावरी ढली परन्तु स्वप्न में डुबा गई
असत्य के लुभावने प्रयोग से मिला गई
प्रयत्न-पूर्ण चित्त के प्रयास क्षीण हो गए
व्यथा यही कि सत्य के प्रमाण को भुला गई
उजाड़ व्यर्थ-चक्रव्यूह जन्म को सँवार लो

सुषुप्त है विहान आज सूर्य को पुकार लो

रहें तटस्थ पाँव क्यों विकल्प वेग का नहीं
प्रवाह रक्त का कहे कि चिह्न मृत्यु का नहीं 
उठो कि दिव्य ज्योति का विनाश एक शाप है 
बढ़ो कि रुद्र-शक्ति-पुञ्ज एक ठौर का नहीं
धकेल नाव तीर से समुद्र में उतार लो

सुषुप्त है विहान आज सूर्य को पुकार लो

"रहें तटस्थ पाँव क्यों विकल्प वेग का नहीं
प्रवाह रक्त का कहे कि चिह्न मृत्यु का नहीं 
उठो कि दिव्य ज्योति का विनाश एक शाप है 
बढ़ो कि रुद्र-शक्ति-पुञ्ज एक ठौर का नहीं"

नित्य ही प्रहार से, धैर्य टूटता सदा 

नित्य ही प्रहार से, धैर्य टूटता सदा 
जो कि लक्ष्य भेद दे, एक बाण चाहिए
मध्य में विनाश के, जी रहा मनुष्य है
और जीत का तुम्हें, क्या प्रमाण चाहिए?

चीरने उदासियाँ, श्वास को पुकार दो
दीन देह-अस्थियाँ, अग्नि में उतार दो
चित्त बुद्ध-ध्यान हो, खौल रक्त में उठे
ताप रोम-रोम में, दिव्य प्राण चाहिए

जन्म लो विरोध में, नित्य मृत्यु-काल के
जीव का प्रमाण दो, राख को उछाल के 
एक हो अनेक हों, शत्रु से भिदे नहीं 
पूज्य हो अभेद्य हो, योग्य त्राण चाहिए 

जो कि लक्ष्य भेद दे एक बाण चाहिए


भोर का दृष्य है चक्षुओं में निशा

भोर का दृष्य है चक्षुओं में निशा
वायु के स्पर्श में कण्टकों की कला 
व्योम में व्याप्त है अश्रुओं की नमी
श्वास के पाश को मृत्यु ने छू लिया

काल के कोप से त्रस्त हैं प्राण तो
शक्ति से हो रही नित्य ही प्रार्थना

पास में सूर्य है किन्तु धीमी प्रभा
हाय मस्तिष्क को घेरती है व्यथा
नीन्द में चेतना में नहीं भेद है 
है धुआँ ही धुआँ नष्ट होती सुधा

चित्त में क्षोभ है स्वप्न का सत्य का 
और शङ्का यही क्या रहेगा सदा?

रङ्ग कैसे भरें चित्र मैला हुआ
स्याह ने श्वेत को वेदना से भरा
रोशनी की दिशा मौन है रिक्त है
ज्ञात है ही नहीं पन्थ की स्पष्टता

प्राणियों का यही मात्र प्रारब्ध है
पाप के पुण्य के कर्म को भोगना 

धैर्य की डोर को साथ विश्वास का
भाग्य की ठेस से भाग्य ही तारता
व्यर्थ ही रुष्ट होते रहे मूढ़ थे 
नव्य आरम्भ है अन्त की साधना

यत्न से राख को छान लो ढूँढ लो
आपदा में छुपी एक सम्भावना

"रङ्ग कैसे भरें चित्र मैला हुआ
स्याह ने श्वेत को वेदना से भरा
रोशनी की दिशा मौन है रिक्त है
ज्ञात है ही नहीं पन्थ की स्पष्टता"

रथ समय का निरन्तर चला जा रहा

रथ समय का निरन्तर चला जा रहा
वृक्ष सम्बन्ध के छूटते जा रहे 
चक्षुओं में क्षणों की गिरह बाँध कर
नव-क्षणों का निमन्त्रण लिए जा रहे

वेग ने अश्रुओं की नमी छीन ली
मुख मुखौटा बना भाग्य की मार से
भाव में पुष्प जीवित लिए नेह के
दान में अर्घ्य अपना दिए जा रहे 

दिख रहा जो अभी चूर्ण हो कर गिरे
छूट कर हाथ जाने मिलें ना मिलें  
नीन्द टूटे कभी सत्य प्रत्यक्ष हो
स्वप्न सा एक जीवन जिए जा रहे

स्वेद मस्तक भिगा वाष्प बन उड़ रहा
रक्त को साँस भरने घड़ी भर नहीं 
हैं विवश पाँव आदेश है शक्ति का 
अन्त पर ही ठहरने चले जा रहे

"रथ समय का निरन्तर चला जा रहा
वृक्ष सम्बन्ध के छूटते जा रहे 
चक्षुओं में क्षणों की गिरह बाँध कर
नव-क्षणों का निमन्त्रण लिए जा रहे"

दीप की रौशनी भी लगे सूर्य सी.

दीप की रौशनी भी लगे सूर्य सी.
रात इतनी अँधेरी मिले तो सही 

वेदना से भरे मेघ छाएँ कभी
एक पन्ना दुखों से हमारा भरे 
पुष्प इतने मिले पाँव शङ्कित हुए 
तीक्ष्ण काँटा कभी पृष्ठ चीरा करे 
स्वप्न के लोक के सत्य को जानने
सत्य-जीवन उभर कर दिखे तो सही 

हर समय प्रेम की एक चादर रहे
प्रेम को फिर वही मान कैसे मिले ?
साथ पग-पग चले कोई निस्स्वार्थ तो
साथ को नित्य सम्मान कैसे मिले ?
मूल्य पहचानने बन्धनों का सभी 
पन्थ कोई अकेला मिले तो सही 

हाथ इतने बढ़े गिर न पाए कभी 
ठोकरों से मिला चिह्न दिखता नहीं
लक्ष्य पर जय-ध्वजा गाड़ आए सहज
किन्तु सङ्घर्ष उसमें झलकता नहीं 
देख कर गर्व मुख पर दमकने लगे 
चित्त पर घाव एसा लगे तो सही 

भावनाएँ उमड़ती रहीं हर घड़ी 
शून्यता का नहीं तुच्छ आभास था
अश्रु-गागर भरी किन्तु छलकी नहीं
मेढ़ पर प्रेम की पूर्ण विश्वास था
तृप्ति के अर्थ को पुष्प अर्पण करें 
रिक्त खाँचे किसी दिन खलें तो सही

दीप की रौशनी भी लगे सूर्य सी
रात इतनी अँधेरी मिले तो सही

"भावनाएँ उमड़ती रहीं हर घड़ी 
शून्यता का नहीं तुच्छ आभास था
अश्रु-गागर भरी किन्तु छलकी नहीं
मेढ़ पर प्रेम की पूर्ण विश्वास था"


नाम : आरोही श्रीवास्तव 

जन्मतिथि : २२ जुलाई १९९०

निवास स्थल : जबलपुर (म.प्र)

अध्ययन : बी कॉम (टाक्सेशन)
प्रैक्टिसिंग टैक्स कंसलटेंट पुणे

-पुणे में कई मंचों से कविता पाठ,
-उड़ने को आकाश तो दो (कविता संग्रह)

संपर्क : 9028179309
 ई मेल : aroshrivastava@gmail.com