स्त्री से बात
स्त्री से बात करने के लिए
निश्चित तौर पर
तुम में होना चाहिए सलीक़ा
फिर सीखो
उसे सुनते जाना
उसकी चुप्पी के आयाम तक
कभी आजमाओ
ख़ुद भी बातें बनाना
कभी चुप हो जाना
स्त्रियां परखती हैं
कभी-कभी सिरे तोड़कर
मध्य की सुदृढ़ता
तो साफ़ नीयत रख
तुम्हें आना चाहिए
समुद्री यात्रा में
तारे पहचान रास्ता निकालना
जैसे एक दिन
अच्छी-ख़ासी, आत्मीय बतकही के बाद
वह कहे
कि अब उसे चलानी है साइकिल, स्कूटी या कार
या जाना है कहीं पैदल या पंखों पर सवार
तो तुम अलविदा कहकर चुप रहोगे
कुछ दिन
या ख़ूब दिन
जब दोबारा करनी हो बात
तो शुरुआत कर सकते हो
यह पूछने से
कि उस दिन से अब तलक
कैसा चल रहा सफ़र !
नौसिखिया
जब मैंने एक पत्रिका के संपादक से पूछा
मेरी कविता छपने की सूरत में
क्या वे मुझे भी पत्रिका भेजेंगे
उन्होंने कहा-
"बिल्कुल ही नौसिखिए हो क्या?"
मुझे तब पता चला
कि मैं नौसिखिया था
मैं नया-नकोर (मासूम/बेवकूफ?) था
जब मैं लोगों के लिखे को
उनके चरित्र का आईना समझता था
नहीं जानता था हिसाब-किताब
जब मैं एक किताब लेने
किराया लगाकर प्रकाशक के दफ्तर पहुंचा
और ऐसी उम्मीद की उससे
कि वह मेरी ताज़ा छपी कविता पढ़ ले
मैं माथा खपाता था समझने में
बुरी कविताओं की रचना प्रक्रिया भी
नहीं मालूम कि इससे मुझे
फ़ायदा हुआ या नुक़सान
मैंने अपनी अच्छी कविताओं को
अपठित पत्रिकाओं में ज़ाया कर दिया
मैं दर्ज़ करता रहा
इस दुनिया से हुई शिकायतों को
यहीं का यहीं
और ग़लत समझा गया
आपको शायद यक़ीन ना हो
पर पहले-पहल
मुझे लगता था
कि हिंदी-उर्दू में
सबसे बड़ा लिक्खाड़
कोई 'ख़ाकसार' नाम का आदमी हुआ है।
क्राइम सीन
टीन शेड और उसकी बगल का रास्ता
लगता था सेना के ख़ुफ़िया ठिकाने सा
कुछ था नहीं वहाँ
पेड़ थे जो रचते थे मायाजाल
उन्होंने काट डाले सारे पेड़
टूटा मायाजाल और दिखने लगा आरपार मैदान
तब उन्होंने एक काला जाल डाल दिया मिट्टी पर
और आड़ लगा दी उन पीली पन्नियों से
जिन पर लिखा होता है -
"क्राइम सीन, डू नॉट एंटर! "
अँधेरे के असफल जिप्सी
लगभग सभी बच्चों की
कल्पनाओं में
शामिल रहती है
सितारों की फंतासी भरी दुनिया
ताज़ा जवान ख़ून
भावनाओं के फिसलन भरे मोड़ पर
हो जाना चाहता है एक जिप्सी
बच्चे में
कूट-कूट कर भरी होती है
जिज्ञासा
और कुछ इंकलाबी नारे
होते हैं युवाओं के पास-
कुछ कर गुजरना
या सिमटना बेफिक्री में
आसपास
इन बच्चोंं और युवाओं के
होते हैं
कुछ अड़ियल वयस्क, प्रौढ़ और बुज़ुर्ग
जिनकी ठसक और दखल से
खैरियत से आबाद रहते हैं
आजीविका के अधिक सुरक्षित विकल्प
जिज्ञासाएं रीत जाती हैं
जिप्सीपन भी कहाँ रह पाता है ज़िंदा
बूंद-बूंद रिसता
खाली होता है घड़ा
परियों की कहानियों
और जुनूनी गीतों का
एक 'सुरक्षित' काम में लट्टू की तरह नाचते
किसी दिन देखने लगते हैं ये
आँखें फाड़ तारे देख रहे आदमी को
और एक हूक सी उठती है
कहीं भीतर
जब कभी मिलते हैं ये
किसी अन्य असफल जिप्सी से
फुसफुसाते हैं-
"सब कुछ छोड़ हिमालय चले जाना है"
'हिमालय पर ..
'सोचते हुए
पुराने फिल्टर पेपर पर
उभरने लगता है भुतहा अतीत।
मसखरा
संदेह है मुझे
कि मेरे चश्मे का नंबर बढ़ाने में
गुनाहगार है चिलचिलाती धूप भी
नए नंबर वाले
एक अतिरिक्त चश्मे को
धूप का बनवाया है मैंने
जब तक वह नहीं आता बनकर
मैं पहनकर निकला हूं
दो चश्मे एक साथ
धूप के बिना नंबर के चश्मे के ऊपर चढ़ा कर
नज़र का चश्मा
कोई हंसेगा क्या
इस पर?
हंंसे फिर...
कवि होने के इतर
मेरी कामना थी सदा से
छू सकने की
क्रियात्मकता का दूसरा आयाम भी।
वे संख्या भर नहीं है
(अमिता सिंह जैसे पाठकों के लिए)
वे पढ़ते हैं
जैसे किसी और ने तुम्हें पढ़ा नहीं
वे लेखक हैं नहीं और किसी तिकड़म में शामिल नहीं
उन्हें साहित्य में कोई भविष्य भी चाहिए नहीं
वे जिनकी प्रोफाइल पर आप कभी नहीं जाते
वे जिनकी प्रोफाइल पर कोई कभी नहीं जाता
वे जिन्हें लोग फेसबुक पर जोड़ते ही अनफॉलो कर देते हैं
वे जो किसी को बुलाने के लिए पुकारते भी नहीं
वे जाते हैं हस्बे मामूल
सब छोटे-बड़े लेखकों की प्रोफाइल पर
पढ़ते हैं बिना किसी पूर्वाग्रह के रचनाएं
और करते हैं बड़ी सार्थक विवेचनाएं
उनकी सक्रियता से छोटे लेखक बड़े बनते हैं
और बड़े अपना शिखर बचाए रखते हैं
मन-ही-मन आपसे जलने वाले प्रतिद्वंद्वी के बरअक्स
वही आपके बगलगीर बनने के क़ाबिल हैं
अपनी रचना या किताब प्रकाशित होने पर
आप जाते हैं याचक की तरह उनके द्वार
और ठेल देते हैं ख़रीदने या पढ़ने की लिंक
जिनका अस्तित्व
एक संख्या भर है आपके लिए
वे हैं तो बचा है पढ़ा जाना निस्वार्थ
हम-आप, लेखक 'साहब'
उनके उत्तरोत्तर ऋणी हुए जाते हैं।
नाम : देवेश पथ सारिया (हिन्दी कवि और कथेतर गद्य लेखक)
सम्प्रति : ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध।
पुस्तकें : 'हक़ीक़त के बीच दरार' : वरिष्ठ ताइवानी कवि ली मिन-युंग की कविताओं के मेरे द्वारा किये गए अनुवाद की पुस्तक प्रकाशित। प्रथम कविता संकलन एवं ताइवान के अनुभवों पर आधारित गद्य की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य।
साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन : हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, बनास जन, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन, जनपथ, नया पथ, कथा, साखी, अकार, आधारशिला, बया, उद्भावना, दोआबा, बहुमत, परिंदे, प्रगतिशील वसुधा, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, कविता बिहान, साहित्य अमृत, शिवना साहित्यिकी, गाँव के लोग, कृति ओर, ककसाड़, अक्षर पर्व, निकट, मंतव्य, गगनांचल, मुक्तांचल, उदिता, उम्मीद, विश्वगाथा, रेतपथ, अनुगूँज, प्राची, कला समय, पुष्पगंधा आदि।
समाचार पत्रों में प्रकाशन : राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, प्रभात ख़बर, दि सन्डे पोस्ट।
वेब प्रकाशन : सदानीरा, जानकीपुल, पोषम पा, लल्लनटॉप, हिन्दीनेस्ट, हिंदवी, कविता कोश, इंद्रधनुष, अनुनाद, बिजूका, पहली बार, समकालीन जनमत, मीमांसा, शब्दांकन, अविसद, कारवां, हमारा मोर्चा, साहित्यिकी, द साहित्यग्राम, लिटरेचर पॉइंट, अथाई, हिन्दीनामा।
विशिष्ट : देवेश की कविताओं का अनुवाद मंदारिन चायनीज़, अंग्रेज़ी, स्पेनिश, पंजाबी, बांग्ला और राजस्थानी भाषा-बोलियों में हो चुका है।
देवेश पथ सारिया
नेशनल चिंग हुआ यूनिवर्सिटी
शिन्चू, ताइवान, 30013