पेडों के शहर में

छवि श्रेय: उज्ज्वल शुक्ला









पेड़ों के शहर में

नदी नहर पगडंडियाँ
ताल-तलैया साथी बने
मैं कोसों दूर पाया गया
मनुष्यों से सफ़र में

वर्षों बाद लौटा था मैं
पेड़ों के शहर में 

बूढ़ा पेड़ मानो प्रतीक्षा में था मेरे
मुझे आता देख अविलंब हीं बोल पड़ा-

लौटे बाबू तुम बहुत शीघ्र
बाबा लौटे अस्सी बरस बाद

बस दो पल रूके 
हाल पूछा भी न मेरा और लौट गये 
फिर कभी न लौटे।

माफ़ करना मुझे 
अब फल नहीं मेरे पास
न देने के लिए तुम्हें 
मुझमें साँस बाक़ी है
पर निवेदन है तुमसे-

तुम ठहरो!
आओ बैठो!

सालों से किसी ने 
दो बातें भी नहीं की...

आँधीयों के थपेडे़
बिजलियों का कहर 
बादलों ने भी सालों तरसाये रखा 
एक-एक कर मेरी भुजाएँ गयी 
पंछीयों ने भी मुझको अलविदा कह दिया 

हो चुका मैं ठूँठ
ध्रुव तारा भी अब तो दिखाई नहीं देता। 

कुछ हवाओं की लोरियाँ 
कुछ बादलों की अठखेलियाँ 
कुछ पर्वत पलाश पारिजात की रंगरेलिया
कुछ किनारों से नदियों के वार्तालाप 
कई क़िस्सोें की पोटली है इन बूढ़ी छालों में
जाने से पहले करना चाहता हूँ हवाले तुम्हारे।

सन्नाटे में था मैं या सन्नाटा मुझमें कौंध गया
मैं उभरी जड़ पर धम्म से बैठ पड़ा 
एक ठण्ड़ी-सी आह् भरी
एक दिखावटी-सी मुस्कान बिखेरी
इससे पहले कुछ कह पाता

सूखे पेड़ से सूखी एक पत्ती टूट गिरी
गोदी में मेरे जैसे आकर वो सिमट गयी...

मैं मौन था पर मौन न था
मोती आँखों में रूके नहीं 
उस रोज़ लिपटकर पेड़ से जाना

पथराई आँखों को बिछडे़ संतानों को 
देखने में मिला सुख है
इंसान का पेड़ों को गले लगाना और
पेड़ो का पड़ जाना अकेला 
है सबसे भयावह त्रासदी।


कविता

एक शब्द से भी उत्पन्न होती है कविता 
जैसे एक बीज से उगता है वृक्ष।

एक पंक्ति के लिए भी लिखी जाती है कविता
जैसे ईश्वर की एक झलक के लिए
तय की जाती है लम्बी यात्रा।

एक पंक्ति में भी सिमट सकती है सम्पूर्ण कविता
जैसे एक अंजुलि जल में भी तृप्त हो सकता है गला।

हथेली पर दूसरी टपकी 
बारिश के बूँद के छलकने पर
लिखी जाती है हाथ के रेखाओं-सी कविता।

कभी तो यूँ होता है

तितली आ कर आँचल में बैठे 
तो रंगों में उभर आती है कविता 
कभी बालक के होंठों से प्रस्फुटित हो जाए
तो कभी नदीयाँ किनारे पानी में लटके 
पाँव से आ गले लग जाए कविता। 

एक बार मैं रास्ते से गुज़रा
मुझे कविता मिल गयी
हाथ पकड़ बिठाया पास अपने और
कविता ने पूरी कहानी लिखवाई!
'कई बार कविताएँ ख़ुद चाहती हैं
कि उन्हें लिखा जाए।'

मेरी कविताओं के प्रतिबिम्ब 
मुझमें न मिले तो स्मरण रखना
मेरी कविताएँ मेरे ही समय का 
एक छायाचित्र हैं।


उलझन

भविष्य से अपरिचित
वर्तमान की अनसुलझी पहेलियों में उलझा इंसान
भावना से शून्य होता जाता है।

अतीत की खिड़कियों की हवा का आदी
भविष्य के एयरकंडीशन की परवाह नहीं करता।

चेहरे की गम्भीरता बयां करती है 
अकेले इंजन के पीछे रेल के कई
डिब्बे जुडे़ हैं।

ऐसे लोग जन्मते नहीं कभी 
उगते हैं औरों के लिए
और हवा बन जाते हैं।
 
मोम से होते है ये लोग
जिनकी आत्मा करूणा और प्रेम से 
हमेशा गीली रहती है।

गीली चीजे़ नरम होती है
और नरमाहट चुभती नहीं कभी;

चुभता है दुःख
दुःख की तपिश आत्मा को नहीं सुखा सकती
देह को सुखा दे शायद परन्तु
दुःख ज़िन्दगी का सबसे बड़ा साथी है।

मनुष्य ठहर जाते हैं 
पर ठहरते नहीं
ठहरना अन्त भी नहीं है
जैसे थकना नहीं है संकेत
सफ़र के ख़त्म होने का

आगा़ज़ और अंजाम
अभी तक लिखा नहीं गया
काग़ज़ के पन्ने खाली है 
कलम की स्याही बाक़ी है

अभी अँधेरों की गिरफ़्त जारी है
असल की पहचान जारी है
कुछ पैरों का गुज़रना बाक़ी है
कुछ पद चिन्हों के निशान बाक़ी है
दिये का तेल बाक़ी है
अभी भी रात बाक़ी है

ठहरना भी कर्म है
चलना भी कर्म है
धर्म है सफ़र को 
जीते चले जाना।


कमीज का छेद

कमीज का वो छेद
जिससे झाँकती थी झुर्रीयाँ

दे रही थी कई दिन से संकेत
कुछ  कहना था शायद 
मैं समझ न पा रहा था।

छेद से सफेद रोवों ने
मुझे झाँक कर देखा 
मैं मुँह बाए तब भी
तकता ही रहा।

एक दिन
दो दिन
गुज़रा हफ्ता 
छेद अब भी था 

घर में सुई थी 
धागा था
कुछ तो नहीं था तो शायद
समय..... 

शाम को पूछूँगा हीं उनसे-
सिलाते क्यों नहीं कोई दूसरी कमीज?

वो आये और बैठे
मैं तकता ही रहा
आँखें फिर 
छेद पर अटकी रहीं। 

सहसा!
टपकी छेद से
पसीने की बूँद

बोली- मैं अन्तिम हूँ
अबकी कुछ टपका तो
खून समझना

प्रश्नों ने कौतूहल मचाया
उत्तर ने कर दिया अवाक्! 

नंगे पैरों ने काँपते हुए कहा-
जड़ें कमज़ोर हो चुकी हैं 
शाखाएँ हैं बहुत भारी

उठाया नहीं जाता
तने से अब बोझ।

आँखों तक उस छिद्र की
गहराई में मैं डूब गया
तब से लेकर अब तक
पेड़ होने की कोशिश में लगा हूँ। 


अन्तिम निवेदन

मुझे सुलगाओ मत
तेल छिड़को और आग लगा दो
मैं बरसों जलूँगा

मेरी लौ उन सभी लोगो की
लालटेन होगी जिन्हें अँधेरे से 
डर लगता है

लपटें दिशाओं को ऊष्णता देंगी
अलाव की आँच बनेंगी
बचायेगी उनको जो
ठण्ड में सिकुड़ कर
तकिया बन गये हैं

सुलगाओं नहीं
धुआँ बना
तो तुम्हारा 
नुकसान कर बैठूँगा

डरो मत!
तीली लगा दो;

जल भी गया तो कोयला बनूँगा
मुझ पर रोटियाँ सेंकना
अपनी भूख मिटाना,

राख हुआ तो
फ़सलो पर छिड़कना
और कीड़ो से बचा लेना

खेतो में डालना 
उपजाऊ मिट्टी बनाना
गोबर के साथ गड्ढ़़ो में
मिलाना और पौधे लगाना

बस...
मुझे जला दो
सुलगाओ मत!


कविता के कुछ बीज हज़ार

जाने से पहले बो दूँगा मैं 
कविता के कुछ बीज हज़ार
सींचूँगा अपने अनुभव से

उग आएगें जिनसे 
पीपल के कुछ वृक्ष विशाल
जो बाद मेरे पीढ़ी दर पीढ़ी

ठहरने को छाया देंगे 
और श्वास देंगे जीने के लिए 

पत्तों पर कविताएँ
अवतरित होंगी 
अंधेरे का दिया बनेंगी
और बनेंगी पथिकों का पथ।

कुछ बीज पारिजात के होंगे
फूलों पर गुदी होंगी प्रेम कविताएँ 
जो कड़वाहट के तम को अपने 
प्रेमसौन्दर्य में समा लेंगी

जरूरत न होगी पानी की जिन्हें 
न होगा कीटों का भय

अकाल में वो रोटी बनेंगी 
कड़ाके की ठण्ड़ में 
'पहलवान की ढोलक'

मैं पानी भी बो दूँगा
जिनसे बादल बन जायेंगे
जा बरसेंगे वहीं जहाँ
मिट्टी के मानुष
मिट्टी को देख बिलखते हैं।

कुछ बीज नीम से कड़वे होंगे
कुछ चट्टानों से भी कठोर
कुछ तीक्ष्ण तीर-से चुभेंगे
कुछ नींदे भी उड़ा देंगे।

मैं बचपन भी बो जाऊँगा
जिसमें कोई बच्चा बड़ा नहीं होता
जहाँ कोई समझदार नहीं रहता

दुनिया के सुन्दरतम दृश्य 
दिखते है जहाँ
वहीं छोड़ जाऊँगा
बहुत सारी टाॅफियाँ
खेल खिलौने अपना जीवन

ढुँढ़ना हो तो बच्चों के बीच देखना
वहीं खेलता मिलूँगा मैं।


प्रेम

प्रेम प्राप्त नहीं जिन्हें
प्रेम हो जाते हैं
जिसे प्रेम नहीं होता वो
प्रेम बन जाते हैं

प्रेम से की गयी ईर्ष्या 
अपेक्षाओं की उत्पत्ति है
ईर्ष्या से भरा इंसान 
प्रेम के अतिरेक से उत्पन्न है

प्रेम की पत्तियों पर
कभी कीडे़ नहीं लगते
इन पत्तियों से छोटे जीव
अपनी भूख मिटाते हैं

प्रेम संदेह से नहींं 
भय और चिन्ता से
ग्रसित है
प्रेम में संलिप्त जोडे़
बिछड़ कर भी बिछड़ नहीं पाते
एक-दूजे की चिन्ता
देह के सिलवटों में
लिपटी रहती है आजीवन

प्रेम में अलग हुई स्त्रीयाँ
जूडे़ में फूल भी प्रेमी के 
नाम का लगाती हैं
पुरूष कपड़ो के रंग
उनकी पसन्द के चुनते हैं

प्रेम में डूबे इंसान सती
या फिर भक्त हो जाते हैं 

बिछुड़न के बाद जो
बन नहीं पाते
फिर दूसरे का प्रेम
फ़कीर हो जाते है
प्रेम रखते नहीं कभी
बाँट देते हैं

प्रेम खोकर लौटा मनुष्य
सबसे बड़ा सन्यासी है
जो दूसरा प्रेम भी 
पूर्ववत सम्मान से 
स्वीकार लेता है

प्रेम की कोई
शानी नहीं जग में

प्रेम वह वायु है
जिससे संसार जीवित है।


नाम: उज्ज्वल शुक्ला 

निवास स्थल: परसादीपुर(उमरवार), जौनपुर, उत्तरप्रदेश
अध्ययन: महाराजा महाविद्यालय जयपुर से बी.एस.सी. में स्नातक।
◆कालेज में अध्ययनरत रहते हुए रवीन्द्र मंच,जयपुर से थियेटर किया है।लेखन व अभिनय में अभिरूचि है। 

वर्तमान में भौतिकी से एम.एस.सी द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत हूँ। 

◆संपर्क -7985428981

◆इन्सटाग्राम- @ujjwalshukla__
◆फेसबुक -Ujjwal Shukla
◆twitter- actorujjwal_