◆मिलन
तुम मिले
तो मैं मिला
खो गया था
◆वसंत
वे वसंत के दिन थे
जब हम पहली बार मिले
पहली बार
मैंने वसंत देखा
◆फूल
धरती आकाश को
लिख-लिखकर
भेजे जा रही प्रेमपत्र
अहर्निश
फूल
इन्हीं प्रेमपत्रों के
महकते हुए अक्षर हैं
◆पृथ्वी
चिड़िया उदास होती है
तो पृथ्वी के माथे पर पड़ती हैं लकीरें
एक पेड़ मरता है
तो सबसे ज्यादा चिंतित होती है
पृथ्वी
जब स्त्री रोती है
उस रात
पृथ्वी को नींद नहीं आती
◆उन्हीं दिनों जाना
प्रार्थना के दिन थे
क्योंकि प्रतीक्षा के दिन थे
प्रतीक्षा के दिन थे
क्योंकि प्रेम के दिन थे
प्रेम की प्रतीक्षा में
किस तरह उठते हैं प्रार्थना के स्वर
उन्हीं दिनों जाना
◆बाहर-भीतर : यह जीवन
मैंने फूल देखे
फिर उन्हीं फूलों को
मैंने अपने भीतर खिलते देखा
मैंने पेड़ देखे
और उन्हीं पेड़ों के हरेपन को
मैंने अपने भीतर उमगते देखा
मैं नदी में उतरा
अब नदी भी बहने लगी
मेरे भीतर
मैंने चिड़िया को गाते सुना
गीत अब मेरे भीतर उठ रहे थे
यूँ बाहर जो मैं जीया
उसने भीतर
कितना भर दिया
◆अंतिम शरणगाह
दुख की एक नदी थी
जिसमें हम दोनों को उतरना था
हम प्रेम करने लगे
सुख का एक आकाश था
जिसमें हम दोनों को उड़ना था
हम प्रेम करने लगे
अपने खारे आँसुओं से
हमने मीठे पानी की एक झील बनायी
और उम्र भर नहाते रहे
कोमल भरोसे से खड़ा किया
प्रेम का ऊँचा पहाड़
और शिखरों पर चढ़ इठलाते रहे
हमने उम्मीदों का
एक हरा-भरा जँगल लगाया
और भटकते रहे
बेपरवाह
बावजूद इसके
प्रेम को नहीं मिल पायी साबूत ठौर
कि हम आँख मूँद सुस्ता सकें
देह मिट जाने तक
हम सिर्फ़ सपनों में मिलते रहे
वहीं पूरी कीं सारी इच्छाएँ
हम प्रेम करते थे
सपने ही बने
हमारी अंतिम शरणगाह
◆समाधिस्थ
एक पत्ती काँपी
फिर थिर हो गई
कोयल कूकी
और लरज उठी अमराई
भौंरा गुनगुनाया
उसकी गुनगुन से थिरक उठे
कलियों के हृदय
हवा का झोंका आया
झर गईं पँखुड़ियाँ
सुकुमार
वह हम-तुम थे
प्रेम में समाधिस्थ
जहाँ वसंत आता तो है
जाता नहीं
◆पहली बार
प्रेम आया
तो वसंत आया
पहली बार
रँग
प्रेम करने वालों की ही ईज़ाद हैं
फूल
पहली बार प्रेमियों के सामने खिले
पहली बार
जब कोयल कूकी
पुकारा पपीहरा
निहारा चकोर
तब वे प्रेम में थे
रची गयी
जब पहली कथा
पहली कविता
जब धरती पर उतरी
बीज बना होगा प्रेम
भक्ति जगी होगी प्रेम में
प्रेम में ही उठे होंगे प्रार्थना के स्वर
पहली बार
किसी चेहरे पर
आयी होगी हँसी प्रेम में
प्रेम में ही
मुस्कराये होंगे किसी के ओठ
आँसू गिरे होंगे पहली बार
प्रेम के वियोग में
प्रेमियों ने ही गाया होगा
पहला गीत
◆अधूरा प्रेम
एक दिन
मैं नहीं रहूँगा
एक दिन
तुम खो जाओगे
बचा रह जायेगा प्रेम
जो हम कर नहीं पाये
अधूरा छूट गया प्रेम
प्रतीक्षा करेगा पूरे धैर्य के साथ
फिर से हमारे धरती पर लौटने की
अधूरा छूट गया प्रेम
भटकेगा इस सुनसान में
उसकी आत्मा जो अतृप्त रह गयी
मैं आऊँगा रूप बदलकर
तुम भी आना
हम करेंगे प्रेम जी भर के
अधूरा जो छूट जाता है
पीछा करता है जन्मों-जन्मों
तुम्हीं ने कहा था
बरसों पहले
◆प्रेम संभाले हुए है
मैं कहीं भी जाऊँ
कुछ चीजें अनिवार्य रूप से साथ होती हैं
जैसे धूप, हवा, पानी और बादल
जैसे आग, धरती, पहाड़ और आसमान
जैसे खेत, नदी, बगीचे और पगडंडियाँ
जैसे रँग, फूल, पेड़ और चिड़िया
और आखिर में
जैसे प्रेम
क्योंकि ये सब रहें
और प्रेम न रहे
तो क्या भरोसा
मैं खो सकता हूँ सरेराह
भूल सकता हूँ अपना गंतव्य
भटक सकता हूँ रास्ता
ये सब रहें
और प्रेम न रहे
तो क्या ठिकाना
हो सकता है मुझे चक्कर आ जाये
और धड़ाम से गिर जाऊँ
किसी चौराहे पर
ये सब रहें
और प्रेम न रहे
तो कोई उम्मीद मत रखना मुझसे
यह भी हो सकता है
कि मैं गूँगा हो जाऊँ तब
कंठ हमेशा-हमेशा के लिए
हो जाये अवरुद्ध
शब्द न निकले
और रोने लगूँ
साथ में न रहे प्रेम
तो कुछ भी घट सकता है अनिष्ट
जीवन जा सकता है
क्या पता
यह प्रेम है
जो संभाले हुए है मुझे
नहीं तो इस क्षणभंगुर संसार में
बिखरते देर नहीं लगती
◆तुम्हारी हँसी
धुँधली पड़ती यादों के बीच
बहुत कुछ है जो बिल्कुल साफ है
जैसे तुम्हारी हँसी
मानो मोती के दाने बिखर गये हों
अचानक फर्श पर
याकि चिड़ियों के झुंड ने
चहचहाना शुरू कर दिया हो
एकबारगी
या फिर कई रंग-बिरंगी कलियाँ
चटक उठी हों सहसा
एकसाथ
तुम्हारी हँसी
जिसके सामने मेरी उदासी
कितनी बौनी पड़ जाती थी
क्या आज भी तुम
बिल्कुल वैसे ही हँसती हो
उल्टी हथेली मुँह पर रखके
क्या तुम्हारे गालों में
अब भी पड़ जाते हैं गड्ढे
हँसते-हँसते
कहीं मद्धिम तो नहीं हुई
तुम्हारी हँसी
सफ़र के थपेड़ों में
छीजते प्रेम और कमतर होते
भरोसे के बीच
कहीं कुम्हला तो नहीं गई
तुम्हारी हँसी, बताना
मुझे बताना
जिसके लिए कीमती थी
तुमसे ज्यादा
तुम्हारी हँसी
◆अकेला दुख
जहाँ है प्रेम
आँसू वही हैं
कभी आँखों से छलक आये
कभी जज़्ब कर लिये गये
भीतर ही भीतर
बावजूद इसके
न प्रेम समझा गया
न समझे गये आँसू
यह वही अकेला दुख है
जो ताउम्र मेरे साथ रहा
◆प्रेम के पक्ष में प्रार्थना
आँखों में नमी बनी रहे
इसी तरह
इसी तरह भर आते रहें कंठ
धड़कते रहें हृदय इसी तरह
इसी तरह गले रुँधते रहें
इसी नमी में
इसी नम एकांत में
एकांत के इसी सघन मौन में
अंकुरित होता रहेगा प्रेम
जीवित रहेगा
संरक्षित रहेगा
बीज बनकर
तुझमें
मुझमें
हमेशा के लिए
◆प्रेम मंदिर - यह देह
देह
जब तक खोजती है
देह में सुख
कच्ची रहती है
देह पहली बार पकती है
जब स्वयं से परे खोलती है
अपने सुख का वितान
देह में उलझी देह
मात्र देह रह जाती है
जैसेकि बिना प्राण-प्रतिष्ठा की मूर्ति
यह प्रेम है जो देह में फूँकता है प्राण
देह पहली बार साँस लेती है
प्रेम में
देह से देह तक की यात्रा में
देह पल-पल छीजती है
प्रेम में मंदिर बन जाती है देह
जिसमें बिराजे देवी-देवता का
कभी क्षरण नहीं होता
देह में जीवन का अभिषेक करता है प्रेम
पहली बार
◆मनुष्य की गरिमा
प्रेम करना
मनुष्य होने की यात्रा में
उठाया गया
पहला कदम है
प्रेम में लवलीन हो जाना
दूसरा कदम
मिट जाना
तीसरा कदम
फिर बचता ही नहीं कोई
अगला कदम उठाने वाला
शेष रह जाता है मनुष्य
इस पृथ्वी का सबसे सुंदर और नायाब फूल मनुष्य
जिस पर अब गर्व कर सकती है
पृथ्वी
◆..और मर गये
कुछ लोगों ने चिट्ठियों में प्रेम किया
शब्द जैसे खो जाते हैं आकाश में
खो गये
कुछ लोगों ने कविताओं में प्रेम किया
गंध जैसे बची रहती है फूल में
बचे रहे
कुछ लोगों ने ख़ालिस प्रेम किया
और सच में मर गये
◆कविता
कविता
जिंदा आदमी के सीने में सुलगती
उम्मीद की अंगीठी है
अंगीठी पर चढ़े पतीले में
मैंने रख धरे हैं
दुनिया भर के दुख, उदासी और चिंताएँ
वाष्पीभूत होने के लिए
प्रेम के धातु से
बनवाया है यह पतीला
जानता हूँ
है नहीं कोई दूसरा धातु
किसी काम का
एक सुंदर दुनिया की उम्मीद में
सुलगते सीने में भरोसे की आग जलाये
लिखता हूँ कविताएँ
क्योंकि मैं जिंदा आदमी हूँ
जिंदा आदमी
कविता न लिखे
मर जायेगा
◆छल
मेरी उदासी और चिंताओं में
दुनिया भर की अच्छी और सुंदर चीजों को
बचाने की जिद शामिल है
बुरी और असुंदर चीजों के साथ होने से
बेहतर है मर जाना
एक आश्वस्ति तो रहेगी
कि मैंने अपनी आत्मा के साथ
कभी छल नहीं किया
◆अमर्त्य
न जप, न तप
न कठोर ध्यान-साधनाएँ
न कुंभ-स्नान
न चारों धाम यात्रा
इनमें से कुछ भी नहीं करना मुझे
अमरत्व पाने के लिए
प्रेम की सँकरी गली में
है मेरा रहवास
चैन की नींद आती है
कविताओं की कुटिया में
यूँ मैं करता हूँ प्रेम
और लिखता हूँ कविताएँ
अब मैं कभी नहीं मरूँगा
नाम : कुंदन सिद्धार्थ
जन्मतिथि : 25 फरवरी, 1972
जन्म स्थान : बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के एक गाँव हरपुर में
साहित्यिक कृतित्व : 'अक्षरा', 'आवर्त', 'वागर्थ', 'पहल', 'दोआबा', 'बहुमत', 'आजकल', 'मुक्तांचल', 'नया पथ', 'समावर्तन', 'बिंब-प्रतिबिंब', 'समकालीन परिभाषा', 'समकालीन भारतीय साहित्य' पत्रिकाओं में तथा 'समकालीन जनमत' के वेबसाइट और अन्य ब्लॉगों पर एवं कुछ ऑनलाइन साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित; 'हंस', 'धर्मयुग', 'संडे ऑब्जर्वर' में वैचारिक आलेख प्रकाशित; मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के मंचों पर काव्य-पाठ; कवि, समालोचक व संपादक गणेश गनी के संपादन में संयुक्त कविता संकलन 'यह समय है लौटाने का' प्रकाशित, सुमन सिंह के संपादन में प्रेम कविताओं का साझा संग्रह 'सदानीरा है प्यार' प्रकाशित, कवि-संपादक दफ़ैरून श्रीवास्तव के संपादन में संयुक्त काव्य संग्रह प्रेस में, पहला काव्य संग्रह शीघ्र प्रकाश्य
सम्प्रति : आजीविका हेतु पश्चिम मध्य रेल, जबलपुर में कार्यरत
वर्तमान पता : आई सी 16, सैनिक सोसाइटी, शक्तिनगर, जबलपुर, मध्यप्रदेश 482001
मोबाइल नंबर: 7024218568