वसंत

छवि श्रेय: वंदना







वसंत 

वसंत जब उतरता है, 
पीला अमलतास और भी दमकने लगता है. 
बोगनवेलिया नई दुल्हन -सी 
हवा के झोंके से 
मन ही मन लजाने लगती है . 
नीलगाय का झुंड परिसर में , 
चहलकदमी करने लगता है , 
मोर नाचने लगता है , 
और पूरे वातावरण में , 
पत्तियों की सरसराहट से 
संगीत गुंजायमान रहता है. 
पेड़ से झड़े पुराने पत्तों की जगह , 
नई कोपलें आकार लेने लगती है . 
आम बौराने लगता है , 
और नीम के पेड़ लद जाते हैं , 
छोटी - छोटी निबोलियों से . 
उस जादुई जगह पर , 
अपने मन को बांध कर , 
हम रतजगा कर पढ़ते रहे , 
अपने अपने भविष्य के लिए . 
उसी भविष्य के लिए , जिसे 
हमारे समाज में बेकार माना जाता है, 
टैक्स पेयर के पैसों को बर्बाद करते हम, 
अपनी - अपनी आंखों के नीचे , 
उभर आए काली परछाइयों से बेखबर . 
हमेशा 
ज्ञान अर्जन करते रहे . 
ज्ञान की देवी का जयकारा , 
हमने मंत्रों से नहीं 
किताब की काली अक्षरों के धुन के 
साथ लयबद्ध होकर लगाया. 
ठीक किसी ऐसे ही समय 
तुमने दस्तक दी थी मेरे जीवन में , 
हम वहीं मिले थे जहां विद्या की देवी का आराधन होता है . 
ना जाने कितने क्षण हम यूं ही मिलते रहे, 
कभी किताबों की शक्ल में , 
कभी चाय पीने की तलब में. 
तुम मुझसे गुज़रते रहे 
हर लम्हा , हर क्षण , 
भरते रहे मुझे 
हर बार पहले से कहीं और ज्यादा .


वसंत ने दस्तक दी है 

जब सारी दिशाएं अवरुद्ध हो गई थी , 
इन्द्रियों ने काम करना बंद कर दिया था  
और माथे का दर्द ठीक ललाट से रेंगता हुआ
पूरे अंतर्मन पर व्याप्त हो चला था ,
ठीक वैसे समय तुमने दस्तक दी .
हौले से खटखटाया ,
जंग लग चुकी खंडहर दीवार को .
अच्छा किया,
अगर तुम्हारे हाथ की छाप जोर से परी होती
तो हो सकता है यह खंडहर भरभरा के टूट जाता .
ऐसा तो नहीं है कि जंग लगने से पहले मैंने तुम्हें याद नहीं किया ,
खूब किया ,
इतना की कभी - कभी खुद को खुद से डर लगने लगता था .
हर उस स्मृति को खंगाला मैंने ,
जिससे मैं जिंदा बची रह सकूं .
स्मृतियां जब दंश देती है
तो वही आपको संवार भी सकती हैं. 
अजीब संयोग है तुम्हारे साथ की ,
दंश और प्यार दोनों उमग आते हैं एक साथ ! 


मौन की भाषा

जब बचा रह जाए  
हमारे दरम्यान 
एक नितांत मौन की भाषा . 
संकेत की भाषा , 
कुछ कहना 
मर्यादा को लांघता सा लगे ,
तो रुक जाओ जरा ,
थोड़ा थम जाओ .
सांस भर लो अपने उर में . 
जरूरी नहीं कि तुम जो कहना चाह रहे हो ,
कह ही दो उसे ,
मौन को अभिव्यंजित होने दो .
कहे से ज्यादा अनकहे को पकड़ता है हृदय .
हृदय की भाषा में बात करो ,
अपनी संवेदना को विस्तृत होने दो !


प्रेम 

एक शाश्वत दूरी है 
हमारे दरमियान प्रेम में 
जो ठहर जाती है कभी 
किसी ज़ख़्मी हृदय में 
किसी के सजल आँख 
से गिरते हुए आँसू में .
किसी बच्चे की प्यारी 
मुस्कुराहट भरी अधर पे 
तो कभी
किसी नवजात के ख़्वाब में
स्थित मंद -मंद मुस्कान पे .
अब इस दूरी से ही मुझे 
बेपनाह प्यार हो गया है .


पहाड़ 

पहाड़ , नदी , झरना , 
ये पेड़ - पौधे बचपन से बुलाते लगते हैं मुझे .
और पहाड़ के लोभ में मैं 
मोह के वश खिंची चली जाती हूं 
उन अंधेरे बियावान साल के वन में ,
जहां से निकलने का रास्ता मुझे नहीं सूझता है .
बहुत आसान है पहाड़ को मन सौंप देना 
लेकिन उतना ही दुष्कर है 
उसके हृदय में बसना .
मेरे जैसे ना जाने कितने 
कब से प्रतीक्षारत हैं 
पहाड़ से मिलने के लिए .
हरी दूब , काई , फायकस 
सब तलछटी में फैले मिलते हैं 
जब भी चाहती हूं कि
मैं आज मिलूंगी पर्वतराज से 
ये मुझे उतने ही प्यार से सहलाते हैं 
और मुझे वापिस भेज देते हैं .
पहाड़ से मिलने के लिए मुझे
हवा , पानी , वाष्प बन जाना होगा 
कुछ पल ही सही 
मैं घुमड़ - गरज के 
गले लग के 
मिलूंगी पर्वतराज से 
और उनके कान में 
ढाई आखर का वह बीजमंत्र
दुहराकर बरस जाऊंगी वहां 
जहां बंजर पड़े हृदय में इसकी 
सख्त जरूरत है 
और धरती के सीने में 
उगा दूंगी उन शब्दों के बीज 
हर कण में.
कि जब भी पहाड़ खुद को अकेला पाए 
झुकाए कभी अपने गर्वोन्नत भाल को
तो वो मुझे हमेशा लहलहाता ही पाए !

 
प्रेम

ऐसा लगता है 
अचानक मुझमें आदिम भूख 
उठ आई है ,
चीजों को देखने के प्रति ,
उसे समझने के प्रति .
प्रेम अगर है तो क्यूं है ?
अब ही क्यूं आया मेरी जिंदगी में ?
यह खलल उस समय क्यूं नहीं हुआ 
जब मैं उसे पाना चाहती थी.
भागती थी मृग की तरह 
मृगतृष्णा के पीछे वन - वन , दर - बदर .
या फिर अभी भी जो दृश्य है ,
उसके पीछे जो असंख्य अदृश्य 
पांव पसारे खड़े हैं , वह क्या है ?
या फ़िर यह अतीत की कोई अतृप्त इच्छा है ,
जिसे समय की पिटारी में मैंने कर्ण की तरह बंद कर ,
गंगा में कभी बहा दिया था .
वही परित्यक्त प्रेम ,
क्या फ़िर से दस्तक दे रहा है ?
अब जबकि ,
कोयल की आवाज़ में 
कोई टीस मुझे नहीं लगता .
मोर का नाच 
जिसे घंटों निहारा करती थी ,
बस बारिश का संगसार लगता है .
मुझमें अब 
कुछ भी बहुत गहरे प्रवेश नहीं करता.
आता है ,
और एक डाकिया की भांति 
प्रेम - पत्र पकड़ा के चला जाता है .
जो भी चीज़ दिखती है मुझे ,
बस उसका बाह्य दिखता है ,
अंतर्वस्तु तक पहुंचने की सारी राहें ,
मैंने स्वयं काटी हैं इन्हीं हाथों से .
ठीक वैसे ही ,
जैसे कोई दाई ,
मां के नाल से ,
नवजात बच्चे को अलग करती है .
मैंने भी अपने सभी मार्ग अवरूद्ध कर दिए हैं,
किसी भी चिर- परिचित मुस्कान के लिए !

 
प्यार के बल आओ .

मैं रोज करती हूं तुमसे बातें ,
हर सांस का हिसाब देती हूं तुम्हे 
बिना मांगे .
मन के इशारों से बुलाती हूं तुम्हें ,
कि बस अब आ जाओ ,
चलो चलें हम ,गंगा के तट पर .
जब आंखों का पानी खारा होने लगे ,
उसे गंगा से ज्यादा सहारा कहां मिलेगा ?
जब मन की गति थमने लगती है,
उस समय भी मैं तुम्हें पुकारती हूं,
तुम शीतल हवा की बयार बन ,
हौले से मुझे छूकर,
मेरे माथे पर प्यार का बोसा रख देते हो .
फिर फुर्र से विलीन हो जाते हो .
मैं तुम्हें बुलाना चाहती हूं हमेशा के लिए,
ताकि इस बार जो तुम आओ ,
तो बस मेरे बनकर आओ ,
किसी भावावेग में नहीं 
बल्कि प्यार के बल आओ !!

 
तथागत 

हे सिद्धार्थ, 
किस युग में तुम आए 
तुमने बीमार , बुढ़ापा , और मृत्यु 
को देखा और अंदर तक हिल गए . 
और देखो तो आज के युग में , 
आओ तो ज़रा बैठो मेरे पास .
मैं तुम्हें बताती हूँ क्या घट रहा मेरे आस -पास . 
दुःख देखना चाहते हो सिद्धि , 
देखो जरा उस बूढ़ी अम्मा को 
कोई नहीं है अब उसका , 
जवान बेटा कल ही धराशायी हो गया .
आँखें पथरा गई है उसकी . 
अच्छा इधर आओ , चलो छत पर चलते हैं , 
मैं दिखाती हूँ तुम्हें उस सावित्री को . 
वो देखो आँगन में एक दुखियारी को 
कल ही उसके बाबू ने दम तोड़ दिया 
अस्पताल में , वहीं जहां उसके अस्मत पर भी बन आयी थी . 
और भी देखना है तुम्हें दुःख क्या होता है ?
देखो जरा उस वीरान परे आँगन को , 
एक महीना में पूरा का पूरा आँगन सूना हो गया . 
बहुत सारी घटनाएँ हुई हैं सिद्धि .
लेकिन मुझे डर है अगर मैंने तुमसे यह 
सब कहा तो राजा कहीं मुझे प्राणदंड ना दे दे . 
ख़ैर मर तो ऐसे भी जाऊँगी .
और जानना चाहते हो तो
दबे पैर चलो मेरे संग गंगा तट पर , 
कभी हम दोनो जाते थे अपनी आत्मा को भिगोने वहाँ , 
याद है या सब विस्मृत कर बैठे .
आओ देखो जरा , शुभ्रा ने कभी राजा के सातों पुत्रों को 
अपनी कोख में रख लिया था , 
और आठवें के लिए बेचैन हो उठे थे राजन .
याद है या सब भूल गए सिद्धि,
देखो तो गंगा के घाट को युवराज ,
माता ने इन बच्चों को शरण देने से मना कर दिया है . 
गंगा थक चुकी है या बूढ़ी हो गई है !
हे तथागत , 
दुःख की इस नगरी में तुम औचक ही बुद्ध बन जाते !
तुम्हें हिमालय ना जाना होता और 
ना ही किसी बोधि वृक्ष के नीचे महा मौन धारण करना पड़ता !


अभिशप्त है सारा जीवन 

सब जा रहे हैं 
बारी - बारी .
पड़ोस का चचेरा भाई 
जिसे उँगली पकड़ 
कभी बारह खड़ी 
लिखना सिखाई थी,
कल अचानक चला गया 
बहुत दूर , वहाँ जहां से 
आना अब संभव नहीं.
सदमे में दूसरे ही दिन 
उसकी माँ ने त्याग दिया
अपना जीवन.
लगता है सौर गृह में 
दाई भूल गई थी 
काटना उनका नाल !
सच ही कह रहे हो 
बचा ही कौन है 
इन धृतराष्ट्र के सिवा .
कोई भी नहीं 
सब जा ही रहे हैं ,
कुछ देह त्याग रहें तो ,
तो कुछ मन 
अभिशप्त है सारा जीवन ।


प्यार के बीच ज़िंदगी का नाच 

जिंदगी की तल्खियों को 
मिटाने हम प्यार के दर गए .
लगा जितनी नाकामियां , बेचैनियां 
रतजगा और उदासियां हैं
सब वो स्पंज की भांति सोखकर 
हमें मुक्त कर देगी .
लेकिन इस बीच 
हमसे छूटता ही रहा 
अपने आस - पास का दुःख . 
हम नहीं देख सके ठीक से
जिनके पास खाने को भी नहीं कुछ,
जो पिछली साल दर - बदर भटक रहे थे 
इस साल वे सब कहां हैं ?
किस हाल में हैं ?
उनका परिवार कैसा है ?
हमारी गृहस्थी , प्यार , पैसा , पद 
और आगे बढ़ने की होड़ ने 
हमसे हमारी मानवता छीन ली .
हम चैन से प्रेम की मधुर तान पे 
थिरकते रहे
और
ममता , दया , करुणा , लाचारी 
जिंदगी की तंग गलियों में 
करुण धुन पर नाचती रही 
अपना नंगा और वीभत्स नाच . 


नाम : डॉ. वंदना भारती (सहायक प्राध्यापिका, पूर्णियाँ विश्वविद्यालय ,पूर्णियाँ )

निवास : बिहार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मैंने हिन्दी साहित्य में  एम.ए व हिन्दी साहित्य और अनुवाद में एम.फिल, एवं पी.एच.डी किया है । (2004-2012 )

मेरे शोध : निर्देशक क्रमशः प्रो. वीर भारत तलवार एवं प्रो. चमन लाल सर रहे हैं। 
शोध विषय :  “ गोदान के अंग्रेजी अनुवादों का भाषिक एवं सामाजिक अध्ययन “ है। 

मिज़ोरम विश्वविद्यालय, मिजोरम में सात वर्षों तक हिन्दी अधिकारी के रूप में कार्य का अनुभव; (2012-2019.)

फिलहाल पूर्णियाँ विश्वविद्यालय, पूर्णियाँ में पी.जी.हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापिका के रूप में कार्यरत। (नवंबर 2019 से वर्तमान तक ).  

ईमेल : bbharti.jnu20@gmail.com 

 मोबाइल : 9558016187