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| छवि श्रेय: जसवीर |
◆याद
ख़ुशी हो या हो गम
दोनों ही समय
याद आते हैं वे
जो कभी
हमारे साथ थे
पर! अब
नहीं है दुनिया में
सवाल कचोटता है
अगर वे भी होते
तो खुशी या गम
कुछ अलहदा होते
वे चाहे
सशरीर हमारे साथ न हों
लेकिन! स्मृतियों के
कोई छतनार बनकर
हमारे इर्द-गिर्द ही होते हैं।
◆अनदेखी विदाई
पुरोहित ने कहा-
वह मृत है
उनसे जुड़ी हर चीज
अब बेजान और बेकार है
उन्हें अब घर में रखना
अमंगलकारी है
विधवा स्त्री
सिर झुकाये
सब सुनती रही खामोश
इस तरह
एक पुरुष के साथ-साथ
एक स्त्री भी विदा हुई संसार से
लेकिन ! उसका विदा होना
अनदेखा रहा।
◆नाटक
नाटक के अंत में
कलाकार को मरना था
वह इतने सहज स्वाभाविक
तरीके से मरा मंच पर
कि दर्शक-दीर्घा में बैठे लोगों ने
जोर-जोर से तालियाँ बजायीं
दर्शक उसे कलाकार के
अभिनय का अंग मानते थे
जबकि कलाकार कहता था
उसे कला की ईमानदारी
वह जानता था
नाटक मात्र मंच तक
सीमित नहीं होते
उनकी व्यापक व्याप्ति होती है
ज़िंदगी से जगत तक
और हर बार
कहीं-न-कहीं
किसी-न-किसी रूप में
मरता है कोई ईमानदार आदमी
और दूर खड़े हुए लोग
सिर्फ़ तालियाँ बजाते हैं
मृत्यु के दृश्य को देखकर।
◆मन
आज कुछ नये पौधे लगाये
उनमें खाद-पानी दिया
उन्हें निहारा,निराया
नयनों से सहलाया
उनके स्नेह-सान्निध्य में
खुद को संवारा
मन आज रह-रहकर
कभी तोते
कभी तितली-सा
उड़ता रहा
उमंगों के उद्यान में।
◆खरीदार
रेहड़ी वाले के
सारे बढ़िया-बढ़िया फल
हाथों हाथ बिक चुके हैं
उसके पास अब
सिर्फ कुछ दागी फल शेष हैं
उन्हीं को बेचने में आती है मुश्किल
लेकिन! इतनी बड़ी दुनिया में
उनका भी कोई-न-कोई
खरीदार होगा जरूर
जो फलों का दागीपन नहीं
बल्कि सोचेगा यह
दाग अलग करने के बाद
फल का कितना भाग
बचा सकते हैं हम।
◆खोना-पाना
कभी-कभी हम किसी चीज को
बहुत एहतियात से रखना चाहते हैं
उसे ऐसी जगह संभालकर रखते हैं
जिसे हम सर्वाधिक सुरक्षित समझते हैं
और निश्चिंत हो जाते हैं
कि अब उस तक
कोई दूसरा पहुँच नहीं पायेगा
फिर धीरे-धीरे
एहतियात से रखी हुई चीज
हम खुद ही रखकर भूल जाते हैं
किसी दिन
टोहते रहते हैं उसे देर तक
छानते हैं घर का
हर संभावनाशील कोना
लेकिन! विफलता ही हमारे हाथ आती है
थक हारकर हम
खुद पर ही बड़बड़ाते हुए
छानबीन करना छोड़ देते हैं
एक रोज
कोई दूसरा सामान टटोलते हुए
अचानक से पहले वाली चीज मिल जाती है
हम अनदेखी,अनुपम,
अनोखी उमंग से भर जाते हैं
पायी हुई चीज की ख़ुशी
किसी अपने से साझा करना चाहते हैं
लेकिन!हम देखते हैं
हमारे अपने भी कहीं गुम हैं
हम मिली हुई ख़ुशी संग
नितांत अकेले हैं
वैसे ही जैसे कोई बेशकीमती चीज
अकेली होती है खो जाने के बाद।
◆आवाज
नव ब्याहता बेटा-बहू
के साथ ही रहते हैं
वृद्ध माता-पिता
बुजुर्ग पिता
अक्सर नींद में
उच्चारते हैं-हे राम,हे राम
बीच-बीच में कभी बत्ती
जलाते-बुझाते हैं
कभी बेंत ढूँढते हैं
कभी अपनी दवा-गोली
सिरहाने जल भरा लोटा रखते हैं
रात में कई बार
पेशाब की शिकायत होती हैं उन्हें
पिता जब भी जगते हैं रात को
आहट और आवाज भी जगती हैं
उनके साथ-साथ
पिता की आवाज सुनकर
आश्वस्ति की चादर ओढ़े
लेटी रहती हैं माँ
जबकि उसी आवाज को सुनकर
बेटा बहू करवट बदलते हैं बार-बार
और नींद में बड़बड़ाते हैं
एक दूसरे से कुछ कहते हुए ।
◆राज और राजा
जहाँ राज है
वहाँ राजा भी है
जहाँ राज और राजा है
वहाँ चरण भी हैं
और चारण भी हैं।
◆बेरोजगार
ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ लिए
बेरोज़गार युवक-युवतियों को
जब देखता हूँ
मन उदासी और दुःख की
दलदल में डूब जाता है
उनके सपने
किसका शाप भोग रहे हैं?
वे किस अपराध की
सजा काट रहे हैं?
वे कब तक
अपनी इच्छाओं के शिशुओं को
बिलखता हुआ लखते रहेंगे?
वे बेरोज़गार
कब तक अपने माता-पिता की बीमारियों का
घरेलू उपचार करते रहेंगे?
भाई अपनी बहनों को कब तक
राखी के त्योहार पर
झूठे आश्वासन देते रहेंगे?
बेरोज़गार युवक-युवतियाँ
कब तक हितैषियों के सवालों का
सामना करते रहेंगे?
क्या कर रहे हो आजकल?
कब उनकी जिंदगी की गाड़ी
पटरी पर प्रवेश पायेगी?
जब भी किसी बेरोज़गार को देखता हूँ
सोचता हूँ
कौन-सा दिन होगा वह
जब वे बेरोज़गार नहीं
बारोज़गार कहलाएंगे।
◆आज़ादी
आज़ादी मिले
सबको
अज्ञानता से
बेरोजगारी से
असमानता से
आतंक से
बीमारी से
सबको
मिले आज़ादी।
नाम : जसवीर त्यागी
शिक्षा : एम.ए, एम.फील,
पी.एच.डी (दिल्ली विश्वविद्यालय)
सम्प्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, राजधानी कॉलेज
राजा गार्डन नयी दिल्ली-110015
प्रकाशन : साप्ताहिक हिन्दुस्तान, पहल, समकालीन भारतीय साहित्य, नया पथ, आजकल, कादम्बिनी, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, कृति ओर, वसुधा, इन्द्रप्रस्थ भारती, शुक्रवार, नई दुनिया, नया जमाना, दैनिक ट्रिब्यून आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ व लेख प्रकाशित।
अभी भी दुनिया में: काव्य-संग्रह।
सचेतक और डॉ रामविलास शर्मा(तीन खण्ड)का संकलन-संपादन।
रामविलास शर्मा के पत्र- का संकलन-संपादन।
सम्मान : हिन्दी अकादमी दिल्ली के नवोदित लेखक पुरस्कार से सम्मानित।
संपर्क : WZ-12 A, गाँव बुढेला, विकास पुरी दिल्ली-110018
मोबाइल : 9818389571
ईमेल : drjasvirtyagi@gmail.com

