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| छवि श्रेय: पूनम |
◆अष्टरंग
पहली बात जन्म ही नहीं
चाहिए था
मिला तो मिला
दूजी बात
तुमसे नहीं मिलना चाहिए था
तीसरी बात
तुम्हें जानना भी नहीं चाहिए था
जान लेने के बाद का कहर
बांध की तरह टूटता है
नदी का दर्द है कि
ख़र्च ही नहीं होता है
चौथी
पाँचवी
छठी या सातवीं बात
सप्तसदी, सप्तऋषि
सात सुर
सात चक्र, तारे, समुद्र
सात रंग
सात आश्चर्य की बातें
कबसे घायल पड़ी हैं
और रही..
नवीं बात की बात.....
एक बार अजनबी होने का मौका मिले
तो तुम्हें दस पल की मौहलत न दूँ
तुम्हारी आँखों में
शून्य ठहराकर वापस लौट आऊँ
छूट गया बीच में आठवां अंक
वो मेरा प्रिय अंग है और
तुम्हारे लिए आठवां आश्चर्य
जिसे तुम मेरा घमंड कह सकते हो
मैं अष्टरंग ही कहूँगी .......!!!
◆मुझे हर बार बारिशों ने रोका है
तुझसे अपना दुःख कहते हुए
सभ्यताओं के विकास के साथ
मुझे भी आ गया है जज़्ब करना जज़्बात को
प्रेम को विस्तार देते हुए सृष्टि के दुःख से मेरा लिपटना भी
इच्छित नहीं तुम्हारे लिए
खींच कर तोड़ देते हो बातों को इतना कि ...
ओज़ोन परत में हुए छेदों की
वजह भी मैं हुई
मेरे सुख बीजने की आदत से क्या तुम सुख में हो ?
शीतल हो क्या स्वम् की मनाग्नि के विस्फोटक से ?
सूरज को भी जला देने वाली ज्वाला से ?
अनुत्तरित कब तक रहोगे
प्रश्नवाचक चिन्ह बनकर सदियों खड़ी रहूँगी
शीत लहर हो या शीत युद्ध
हर ऋतु के भीतर का सन्नाटा अब मुझे प्रिय है
तुम्हारी दी गई अप्रियता की हिस्सेदारी
आज भी ..मेरी प्रियता पर की गई तीरंदाज़ी
तुम्हारे अपर्याप्त प्रीत का
निशान है
हँसते हुए तुम्हारे लिए रांधे हुए दूध-भात में
शक्कर के साथ कुछ नमक का स्वाद रहा
सच कहना, चखा है क्या कभी आँसुओं का स्वाद ?
मैंने चखा है मीठापन, खारापन, कड़वापन नशीले उद्दाम का
रूह की बात जाने दो
देह को जला दे
धूप की मजाल ही क्या ?
तुम्हारे प्रेम में गलने से भी
मुझे हर बार सिर्फ़ बारिशों ने ही रोका है......!!!
◆संकट हरेगी करेगी भली वृषभानु की लली
मन से बूढ़ा होना मुहाल था
तन से बूढ़ा होना ज़रूरत
केशमुक्त
शृंगारमुक्त
रागमुक्त होना मजबूरी
अनन्य सुख की रीत थी
कि निकाल कर
ठेल दिया जाए भक्तियुक्त गरिमा में
दो पाँवों की थकन में
घण्टों का गुंजारगान चलता है
मोक्ष का मयकश
संकटों का संकेत ही निकला
रुदन ठिठोली में नहीं बदला
कुन्ज गलियों ने छले सुख
अपना तो केवल दुःख था
अपनी जैसी हीं थीं
कोठरी में चिपक कर सोतीं
और गठरियाँ भी
वो गन्धबिरोज़ सी
विरह की तर्ज़ पर गाती रहीं
दो शाश्वत प्रेमियों के युगलगीत
रूह की आज़ादी तक
जमा करती रही दमड़ी
किसी हथेली पर
कि
उनकी मरदूद चमड़ी को
आग मिले
सफ़ेद धोती
चन्दन का लेप
तुलसी की कंठी
भटकती निर्वासित आत्माओं के
शरीर का संस्कार
बिना पिण्डदान
घटघाट से
गंगा-जमुना की हर धार में
बहा दिया जाता है
बाल-विधवाओं का शरीर
मोक्षधाम से
एक बार फिर
मोक्षमार्ग पर निकल पड़ता है ....!!!
◆पलायन
एक दिन
पढ़ी मैंने
श्मशान पर एक कविता
और... वशीभूत हो गई
उतार दिए उसी वक़्त
चेहरे से मुखौटे
ताकि .....दिख सकूँ
वैरागी
पर .....
कंधों पर लटके मुखौटे
जिन्हें मैंने उतारा तो था
फेंका नहीं था....
पीछे होने के बावजूद
मेरी आँखों में
उस नई पहचान की
लोलुपता को भांप कर
डर गए
मैं !
एक बार फिर ...
जलती चिताओं की
भस्म हटा
वापस लौट आई…..
कुछ क्षण का ही होता है सम्मोहन ...
कैसा भी हो
अपने आप से भागना
छुप जाना
सच का सामना करना
इतना आसान नहीं होता...!!!
◆शीर्षक विहीन
श्मशान हैं मेरी कविताएँ
मत देखिए,
करिए नज़रअंदाज़
वैसे भी
मेरी कविताओं का पाठक मैंने नहीं
कविताओं की भस्म ने चुना है
उस प्रेम के गर्भ ने चुना है जो
हथेली में कपूर जला कर
मृत देह से
रूह को आज़ाद करने का हुनर सीख रहा है
और ......यदि
आ ही गए हैं, तो.... सहमिए पाठक !
कविता के रहस्योद्घाटन करते-करते
कवि से बेहतर
उसके साथ खड़ा अदृश्य पिशाच दिखेगा
क्योंकि
पिशाच ने अभी तक
पिशाच होने का धर्म बनाए रखा है
और... उसको दबोच कर
कवि
हर बार की तरह
अपने धर्म से फिर चूक गया ....!!!
◆उल्टे पांव लौटना
दिखाई नहीं देगा
लेकिन वो
एक दिन लौट जाएगी
तुम नहीं जान पाओगे
समुंदर होने का ग़ुरूर
तुम्हारी आँखों में अट्टहास कर रहा है
ये मैंने उस वक़्त जाना जब तुम
उगते सूरज को दिखा कर बोले
ये देखो…..
मुझसे ही उगता है और मुझमें ही डूबेगा भी
मैं जानती हूँ कि तुम नहीं जानते
मेरी नज़र अब तुम को भेद कर
उस पार की तबाही के मंज़र का तर्जुमा करती है
तमाम घटनाओं और दुर्घटनाओं के वजूद की धार लिए
अदम्य साहस से भरी मैं
जब हज़ारों वर्षों से तुमसे मिलने
चलती चली आ रही हूँ तो….
एक दिन पलट कर भी चल दूँगी
देखो !
बिल्कुल भी अच्छा नहीं
कलयुग का भी अंत कर सकता हैं
नदी का उल्टे पाँव लौटना ……!!!
◆यात्रा
पुरुष एक दिन तुम
काठ की हाँडी बन
आग पर चढ़ जाना
जान जाओगे जो आग तुम्हें
सर्दी से बचाती है
वही आग उसके तन को
कैसे जलाती है
पुरुष एक दिन तुम
पानी बन जाना
जान जाना वो घर आंगन को
कैसे शीतल रखती है
गागर में सागर कैसे भरती है
पुरुष एक दिन तुम
आकाश बन जाना
और देखना एक काया कैसे
विशाल ह्रदय रखती है
पल्लू में बाँध दुख को
चमकता तारा करती है
पुरुष एक दिन तुम
वायु बन जाना
जान जाना
कैसे वो कचरा बुहारती है
और देखना
वो सबकी साँस कैसे बनती है
पुरुष एक दिन तुम
पृथ्वी बन जाना
जान जाना कैसे वो
बोझ अपनी पीठ पर रखती है
और
सूरज तुम तक पहुँचे
इसलिए वो धुरी पर घूमती है
पुरुष एक दिन तुम
बाती बन जाना
जान जाना
कि बाती कैसे जलती है
प्रकाश कैसे जनती है
पुरुष एक दिन तुम
माँ बन जाना
जान जाना
कि कैसे एक स्त्री
स्वम् के जन्म से पहले ही
गर्भनाल से अजन्मे को जोड़ती है
पिता बन
उस स्वप्न को पोषित करती है
पुरुष एक दिन तुम
नारी बन जाना
सहयात्री के साथ
यात्रा पर निकल जाना
और उसको बताना
कैसे वो .....तुम तक आती है
और
कैसे तुम ........उस तक
पहुँचने में प्रयासरत हो ...... !!!
पूनम भार्गव" ज़ाकिर
दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम
लिमिटेड (उ0 प्र0 पॉवर कारपोरेशन लिमिटेड) के अधीन कार्यरत
मूलरूप से चित्रकार::
नौ साझा काव्य संग्रह::
ई-पत्रिका अल्फ़ाज़, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, अमर उजाला काव्य, जीनियस अचीवर,सुवर्णा, यथावत,लोकस, कथादेश, कथाक्रम,माटी, अर्य सन्देश, कथाचली, हंस, स्वर्णवासी, पुरवाई, बहुमत एवं साहित्यिक पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में कविताओं का निरन्तर प्रकाशन।
आकाशवाणी आगरा से, विश्व पुस्तक मेला-2017 में ऑर्थर गिल्ड ऑफ इंडिया के मंच से, राष्ट्रीय साहित्य उत्सव एवं पुस्तक मेला एवं काव्यगोष्ठियों/ऑनलाइन लाइव कार्यक्रम में काव्यपाठ एवं लघुकथा वाचन

