एक स्कर्ट की चाह और सपने खोदती स्त्री

छवि श्रेय: ऋतु त्यागी









एक स्कर्ट की चाह और सपने खोदती स्त्री

आईना सामने था और वह उसमें उतर कर खुद को देख रही थी। अरसे बाद…. 'कितना कुछ बदल गया था।' साठ साल इस देह और मन की पूरी यात्रा बेमानी हो गई थी। इस यात्रा के हर दृश्य में जैसे वह हमेशा ही बाहर प्लेटफार्म पर खड़े होकर हाथ हिलाती रह गई या फिर अभिनय में दक्ष कलाकार की तरह निर्देशक के हाथों खुद को सौंपकर मुक्त हो गई और ऐसी मुक्त हुई कि भूल गई कि कलाकार का भी एक अंतस होता है जहाँ वह पात्र के साथ न्याय करने के लिए अपनी दीठ का इस्तेमाल करता है पर ये हुआ क्या? वह कैसे देख नहीं पाई कुछ….परकाया प्रवेश के बाद वहां से निकलना भी होता है यार...ख़ुद को जैसे उसने एक हल्की चपत मारी हो..।

जब उसे पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है तब उसकी दुनिया भी घूमी थी। अतीत स्मृतियों की पोटली को अपनी काँख में दबाकर ठीक उसके सामने खड़े होकर प्रश्नों को एक-एक कर उसकी ओर उछाल रहा था और जीवन टकटकी बांधे उदासी से उसे देख रहा था। अभी तो  कुछ सुकून मिला था। एक आरामदायक जीवन क्या होता है? यह रहस्य भी पिछले कुछ वर्षों में उसके सामने खुला और अब फिर यह सब... कितनी उठापटक…. बिस्तर पर पड़े-पड़े रिश्तों की पपड़ी को उतरती हुई देख रही थी वह।

अड़तीस साल……. अड़तीस साल का वैवाहिक जीवन कम नहीं होता.... किसी को जानने के लिए.. पर वह जान ही कहाँ पाई?... जानने से पहले ही उसे बता दिया जाता था कि वह क्या चाहते हैं? जबकि उससे कभी पूछा ही नहीं गया कि वह क्या चाहती है या इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि एक अदद छत के लिए उसे दीवारों के बीच में रहना ही था वह रही और ख़ूब रही साथ ही छत के मालिक से वफादारी भी करती रही। अपनी गहरी हाँफती, थोड़ी फटी ज़िंदगी की जब वह तुरपाई करने बैठती तब लगता कोई छाया है जो लगातार अतीत के गहरे पानी में काँपती, ठिठुरती उसके पीछे-पीछे अनवरत चलती रहती है अपने ठौर से नितांत अपरिचित…...

रवि की छोटी सी कमाई और सास के किसी शिला-से सख़्त मिजाज के बीच अपने दोनों बच्चों के जीवन की असुविधाओं को काटते छाँटते पालने लगी थी वह। रवि को यह पसंद है और वह नहीं, उनका गुस्सा.,उनकी इच्छाएँ, सिगरेट, सफाई, पूजा पाठ, माँ की भक्ति सबको ख़ुद में उतारती चली गई पर कमबख़्त एक सपना रह-रह पीछा करता रहता उसका….।।।। जब वह बेदम होकर रात के ठीक ग्यारह बजे रवि के पास बिस्तर पर ढह जाती तो सपने में वह लाल स्कर्ट वाली लड़की बन जाती जो गिलहरी की तरह बादलों के ऊपर सरपट पांव रखती हुई चांद की छाती में दुबक कर खरगोश बन जाती है। गिलहरी से खरगोश बनते उसके सपने हर रात को उसे तब तक कुहनी मारते रहते जब तक सुबह चार बजे  का अलार्म घनघनाकर उसकी नींद पर डाका नहीं डाल देता और वह चिहुँककर अधूरी नींद के अधूरे सपने की गीली मिट्टी पर अपने पैरों के निशान छोड़ देती।

रवि को सुबह छह बजे की ट्रेन पकड़नी होती थी जिसके लिए वह चार बजे उठकर उसका टिफिन तैयार करती। रवि को भिंडी बहुत पसंद थी और राजमा भी पर वह कढ़ी बिल्कुल नहीं छूता था इसलिए घर में कढ़ी भूले से भी नहीं बनी कभी। उसे याद नहीं कभी बच्चों के लिए भी उसने कढ़ी बनाने की कोशिश की हो।

बचपन में सबसे ज्यादा उसे कढ़ी चावल ही पसंद थे। धीमी आँच पर पकती कढ़ी का स्वाद आज भी उसे याद था। शादी के बाद जब तक सब इकट्ठे रहे कढ़ी बनती पर रवि के लिए कोई दूसरी सब्ज़ी बनानी पड़ती और जबसे रसोई अलग हुई  उसने रवि की पसंद का ध्यान और कढ़ी की महक से ही झुँझलाने की उसकी आदत का सम्मान करते हुए अपनी रसोई से इस व्यंजन को शांत भाव से विदा कर दिया था पर रवि…..उसके अस्तित्व से बिल्कुल बेखबर सा, एक रेखीय ज़िंदगी का अभ्यस्त जहाँ जड़वत निस्तब्धता थी और सामाजिक आत्मीयता जिसे वह प्रेम कहती रही। वह उसकी छुअन से अभिभूत होकर गृहस्थी में ठीक उस तरह दहकती रही जैसे जून की गर्मी में उसके घर के बाहर खड़ा गुलमोहर का वृक्ष।

उन दोनों के बीच का सलेटी पंखों वाला समय फड़फड़ाता हुआ उड़ रहा था और धीरे-धीरे बच्चे भी बड़े हो रहे थे। घर के खर्चे बढ़ने लगे थे। रवि हमेशा की तरह हर काम अपनी माँ से पूछकर करते। पिता नहीं थे रवि के। बचपन में ही गुजर गए थे।भाई बहनों में सबसे बड़े रवि अपनी झोली में अचानक से आये इस दुख को संभालने के लिए अपनी देह और मन को पूरी तरह निचोड़ने में लग गये थे। 

पिता के ना रहने से मां कठोर होती चली गई इतनी कठोर कि मन मुलायम होते ही चेहरे की रेखाओं को और अधिक कठोर बना लेती वर्ना घर कैसे चलेगा? पता नहीं कौन सा नियम था ये जिसमें कठोरता के साथ मुलायमियत को कोई जगह नहीं थी। 

"चार बेटे और दो बेटियों के घर में सबके अपने-अपने आलाप हो जाएंगे!" 

भय जब आसपास डोलने लगता है तो हर पुरानी छुअन से भी शंकाओं के तार निकालकर अपने ज़िस्म और रुह को कसकर लपेट लेता है। उजाले में भी अँधेरे को खींचना फिर उसकी राख पर बैठकर मातम मनाना बस कुछ इसी तरह था….

चारों बेटों की शादी होते ही सब को अलग अलग कर दिया उन्होंने

"अपना कमाओ और खाओ जो मुझे करना था कर दिया" ये एक घिसटता हुआ वाक्य नहीं था बल्कि इसमें कईं प्रतिध्वनियां थी जैसे कि

'मैं अब दूर से बैठकर तुम्हारी उठापटक देखती रहूँगी…'

जैसे कि

'देखूँगी तुम मेरे बिना कुछ कर पाते हो या नहीं…: ऐसा ही और भी कुछ..।।

घर में रिश्तों के सुराख़ सभी को दिख रहे थे। बस बाहर से एक चादर डालकर सुराखों को परिवार में ही कैद करने की कवायद चलती रहती। बीच में उड़ता कसैला धुआँ जो कभी भी आकर आँखों को जला देता। उर्मि अब तब तक ढल चुकी थी अपनी छोटी सी दुनिया में…. खो चुकी थी…. बच्चों की परवरिश में...पर आँखों में नींद के कूदते ही पलकें अपने किवाड़ बंद कर लेती और फिर वही सपना लाल स्कर्ट का…..खिड़की के पल्लों पर लगे काँच के टुकड़ों से टकराकर उठता एक अलौकिक तीक्ष्ण सा स्वर..।।।।

"उर्मि….।।

वह पसीने में भीगी चौककर उठ जाती और रवि की देह को टटोलने लगती। आश्वस्ति की धड़कनों को अपने भीतर समेटकर रवि से चिपककर वह फिर सो जाती।

वक़्त की हथेली थाम उम्र  छलांगें लगा रही थी। दोनों बच्चे सिर के ऊपर निकल आये थे और रवि माँ के ना रहने पर उनके व्यवहार की कठोरता और तंज करने की शैली को घसीटते हुए अपने साथ ले आये थे। वह कभी-कभी उसके व्यवहार से चौक जाती और उनके शांत होने पर हँसकर कह बैठती

"कभी-कभी तुम अपनी माँ से लगते हो…

"मेरी मां ने हमें बहुत मुश्किलों से पाला था अगर वैसी ना होती तो हम भूखे मर गए होते" रवि की तल्खी अचानक घर के स्याह कोनों से निकलकर उसके इर्दगिर्द मंडराने लगती और यह कहकर वे फिर अपनी मां के करीब हो जाते 

"एक औरत का त्याग और सहनशीलता ही घर को घर बनाती है" 

रवि अपना आखिरी जुमला कहकर बात को समाप्त कर देते और वह रवि को ध्यान से सुनकर त्याग और सहनशीलता के धागों में उलझकर घर के पैटर्न को सुलझाने लगती। 

'कितने अच्छे हैं रवि' वह मानती या मनवाती...पता नहीं... सब गड्डमड्ड सा था ….यह पहला अवसर नहीं था, हर बार ऐसा ही होता और वह उस समय…. सतर्कता से घर के कामों में ख़ुद को झोंक देती। मायके में भी पाँच भाई बहिनों के बीच सबसे बड़ी उर्मि..वक़्त से पहले ही बड़ी हो गई थी। माँ के गिरते स्वास्थ्य और चिड़चिड़ाहट ने उर्मि के उड़ते पृष्ठों को बंद रहना सिखा दिया। रात के घने अँधेरे में वो पृष्ठ जब जुगनू की रोशनी की तरह खुलते तो वह लाल स्कर्ट और दो चोटी वाली लड़की बन जाती..सलवार कुर्ता उसकी पसंद कभी नहीं रहा..ओर यहाँ ससुराल में साड़ी..दम घुटता था उसका..पर परिवार के तापमान का ख्याल भी तो रखना था पर फिर भी वह सपने में लाल स्कर्ट और सफेद टॉप पहनकर हवा के सुनहरे पंखों पर सवार हो जाती….।

रवि अपने ऑफिस के बाद का बचा खुचा समय पूजा पाठ में लगाते या संस्कार और आस्था चैनल पर  प्रवचन सुनते हुए। वह भी रवि की बातों के प्रवाह में शामिल हो उसके पीछे-पीछे किसी उकते हुए दरिया की तरह बहने लगी थी। अब दोनों नियम से पूजा पाठ में लगे रहते। सब कहते….।

"रवि देवता आदमी हैं" 

बेटे गौरव को भी यही लगता था पर बिटिया गरिमा पापा के ओवर कंट्रोल से परेशान हो जाती और पैसों की तंगी से भी। वह पढ़ना चाहती थी किसी अच्छे कॉलेज में पर शहर के सरकारी स्कूल कॉलेज ही उसके हिस्से आए और फिर वही पच्चीस की होते ही शादी की तैयारी...। गरिमा पापा के व्यवहार में तानाशाही प्रवृत्ति को भाँप रही थी।

गरिमा ने कहा भी था उर्मि से..।।

"मम्मी आप पापा की किसी भी बात का विरोध नहीं करती और ना कभी यह जानने का प्रयास करती कि आप ख़ुद क्या चाहती हैं?"

गरिमा की इस बात से उर्मि के भीतर हज़ारों काँच एक साथ चटके थे। बहुत कुछ विस्मृति के अँधेरे में जबरन ढकेला गया चिहुँककर बाहर आ गया था और तब उसे पहली बार लगा था कि रवि का रवैया गौरव और गरिमा के लिए अलग-अलग था पर बोल नहीं पाई थी।

"क्यों नहीं बोल पाई थी वह?"

वह ख़ुद से यह सवाल आज भी करती है पर जवाब इंच भर हिलकर अपनी जगह से वापस चला जाता।

शीघ्र ही गरिमा की शादी तय हो गई थी। गरिमा खुश नहीं थी इस रिश्ते से और वह  ख़ुद भी तो..।.देवांश गरिमा से उम्र में करीब दस साल बड़ा था जैसे रवि उससे पर कह नहीं पाई। रवि जो करते हैं उसमें किसी दूसरे के लिए जगह नहीं रखते।उसकी जगह भी तो..। गरिमा के सपनों की किरचें आज भी उसे यहाँ वहाँ चुभकर दर्द दे जाती हैं।

उसे गरिमा के लिए बोलना चाहिए था  पर रवि..उसके गुस्से और नाराज़गी का सर्पिला भय उसकी छाती पर कुंडली मारकर बैठा हुआ था जिसे वह लाख कोशिशों के बाद भी हटा नहीं पाई थी।

गरिमा की शादी के बाद भी लाल स्कर्ट का उसका सपना अक्सर धमक जाता पर अब छाती चांद की ना होती….चेहरा देखने की कोशिश करती तो आँख खुल जाती या फिर अँधेरा छा जाता। वह फिर से आँखें बंदकर उस सपने को अपनी आँखों की कोटर में बंद करना चाहती पर सपना पानी की तरह काँप उठता।

रवि का अधिकांश समय अब पूजा पाठ में ही जाता। समय के साथ गौरव की भी शादी हो गई बहू आ गई। गौरव अच्छी नौकरी पर था और बहू अर्पिता भी। पैसों का अभाव टलने लगा। रवि रिटायर होकर पूरी तरह पूजा पाठ के हो गये पर व्यवहार की कठोरता और तंज करने का प्रभाव नहीं गया। वह सुख में थी ऐसा वह सोचती थी शांति में भी पर मन की भीत को कभी-कभी कोई सुईं जैसी स्मृति बींध देती फिर वह गृहस्थी का एक लंबा गहरा कश लेती और कुछ देर आँखें मूँदकर करीने से ख़ुद को अपने इर्दगिर्द लपेट लेती।

सब कुछ चल रहा था ज़िंदगी में... अच्छा था यह तो नहीं कहेगी... पर ठीक चल रहा था कि अचानक ब्रेक लगा...।

अभी कुछ महीने पहले ही उसकी पीठ में दर्द उठा कड़वा, कसैला मटमैला दर्द वह अचकचाकर बिस्तर पर टिक गई। कितने ही टेस्ट और आखिर में यह रोग….। गौरव को दौड़ते-भागते देख रही थी पर रवि... हां कर रहे थे वह भी पर जब वह कहती। जिस दिन उसे पता चला अपनी बीमारी का... सिरहाने पर रवि नहीं थे। सामने गौरव था अच्छे बेटे की तरह….

जब उसके हाथ कांप रहे थे पानी के गिलास को पकड़े तब भी गौरव…. रवि कहां थे वह अपने आसपास देखती है... काले गड्ढों से घिरी आंखों में अभी इतनी रोशनी थी कि आसपास की आकृतियों को पहचान ले, स्पर्श को समझ ले पर रवि नहीं थे,कभी थे तो पर बहुत दूर महसूस हो रहे थे, जब उसका गला खाने का एक कौर भी अपने नीचे नहीं उतार पाता तब रवि उसके सामने ही खाने की प्लेट पर हमेशा की तरह तृप्त होकर भोजन कर रहे होते और हँस कर कहते..

"सब ऊपर वाले का खेल है" और तब भी जब वह दारुण दर्द की पछाड़ को अपने शरीर के हर हिस्से पर खा रही होती तब रवि का हाथ उससे कोसों दूर होता। पिछले एक महीने में अड़तीस साल एक एक कर दरक रहे थे। जीवन चिंदी-चिंदी बिखर रहा था। लास्ट स्टेज पर थी कैंसर की। उसके पास तीन चार महीने से ज्यादा का समय नहीं था ।

आईने की तरह देखकर वह ना जाने आज कैसे मुस्कुरा दी। बहुत समय बाद आज फिर उसे वही सपना दिखा था लाल स्कर्ट...सफेद टॉप.. पर अब चाँद की छाती नहीं थी। करीब चालीस साल पहली कुछ कठोर कुछ मुलायम छाती जिस पर सिर रखकर उसने अपनी दुनिया का एक नक्शा बनाया था और जो उसके जन्मदिन पर लाल डिब्बे में लाल स्कर्ट और सफेद टॉप लाया था….।।


◆नाम: ऋतु त्यागी

◆जन्म: १ फरवरी

◆सम्प्रति: पी.जी.टी हिंदी केंद्रीयविद्यालय सिख लाईंस मेरठ

◆रचनाएँ: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ तथा कहानियाँ प्रकाशित

◆पुस्तक: कुछ लापता ख़्वाबों की वापसी, समय की धुन पर(काव्य संग्रह)

◆पता: 45, ग्रेटर गंगा, गंगानगर, मेरठ

◆मो: 9411904088